दुनिया के लिए इतना जरूरी कैसे बन गया तेल, कहानी क्रूड के उद्योग में बदलने की और वेनेजुएला के दबदबे की
शनिवार की सुबह अमेरिका ने जब वेनेजुएला की राजधानी कराकास पर बम बरसाए, तो दुनिया के तेल बाजार में आशंका फैल गई है कि कीमतें खौल सकती हैं. तो चलिए इस नई घटना के बीच उस पन्ने को पलटते हैं और समझते हैं कि कैसे तेल दुनिया के लिए इतना जरूरी बन गया कि देशों की सरकारें इसपर फिसल जाती हैं.
दशक 1960 का था और साल 1959 का. अप्रैल का महीना था. इजिप्ट की राजधानी काहिरा (कैरो) की एक गर्म रात में अरब पेट्रोलियम कांग्रेस की बैठक बुलाई गई थी. लेकिन उससे दूर एक गुप्त मुलाकात चल रही थी. इस मुलाकात से निकलने वाले नतीजे आने वाले समय में दुनिया में तेल के बाजार की कहानी को बदल देने वाले थे. दरअसल, 1960 के दशक में तेल के कारोबारी जगत में सात कंपनियों का दबदबा था. ये तेल बाजार पर राज करती थीं और इन्हें सेवन सिस्टर्स कहा जाता था. इनके खिलाफ ही अरब पेट्रोलियम कांग्रेस की बैठक बुलाई गई थी और इस बार फैसला खुलकर होना था. इस बीच काहिरा में चल रही अरब पेट्रोलियम कांग्रेस की बैठक से थोड़ी दूर पर दो देशों के तेल मंत्री इतिहास की नींव रखने जा रहे थे. एक थे वेनेजुएला के तेल मंत्री जुआन पाब्लो पेरेज अल्फोंजो और दूसरे थे सऊदी अरब के पेट्रोलियम मंत्री शेख अब्दुल्ला तारीकी. काहिरा की उस गुप्त बैठक में यह तय हुआ कि अब सेवन सिस्टर्स को मध्य पूर्व और वेनेजुएला से खदेड़ दिया जाएगा. यही वह बैठक थी जहां से ओपेक की शुरुआत हुई.
शनिवार की सुबह अमेरिका ने जब वेनेजुएला की राजधानी कराकास पर बम बरसाए, तो दुनिया के तेल बाजार में आशंका फैल गई है कि कीमतें खौल सकती हैं. तो चलिए इस नई घटना के बीच उस पन्ने को पलटते हैं और समझते हैं कि कैसे तेल दुनिया के लिए इतना जरूरी बन गया कि देशों की सरकारें इसपर फिसल जाती हैं.
तेल की क्षमता को समझने में वक्त लगा
दरअसल, हम इतिहास में तेल को एक संसाधन के तौर पर इस्तेमाल करने वाले पहले लोग नहीं हैं. कुछ शुरुआती सभ्यताएं तेल पर बहुत ज्यादा निर्भर थीं. कच्चा तेल जो सतह पर बुलबुले के रूप में आता था, उसे मिडिल ईस्ट के पुराने लोग इस्तेमाल करते थे. बेबीलोनियन- आज के इराकी, अपनी नावों को वॉटरप्रूफ बनाने और बिल्डिंग बनाने में मोर्टार के तौर पर तेल का इस्तेमाल करते थे. मिस्र के लोग भी लाशों को सुरक्षित रखने के लिए ममी बनाने में तेल का इस्तेमाल करते थे. हालांकि, इस रहस्यमयी काले पदार्थ की पूरी क्षमता को समझने या इस्तेमाल करने में काफी समय लगा.

आधुनिक तेल उद्योग का जन्म
साल 1859 को आधुनिक तेल उद्योग के जन्म के साल के रूप में माना जाता है. 19वीं सदी के मध्य में अमेरिका में दुनिया के पहले कमर्शियल रूप से फायदेमंद तेल के कुएं की खोज के साथ तेल उद्योग की शुरुआत हुई.
यह ऐसे समय में हुआ जब उभरती हुई टेक्नोलॉजी ने तेल से नए प्रोडक्ट बनाए. एक प्रोडक्ट बना, केरोसिन, जो घरों में रोशनी के लिए सस्ते और साफ ईंधन के रूप में पॉपुलर हुआ. कुछ साल बाद, अमेरिका का पहला कमर्शियल तेल का कुआं टाइटसविले, पेन्सिलवेनिया में बनाया गया. इसके लिए नई तकनीक का इस्तेमाल हुआ, जिसमें बोर होल को लाइन करने के लिए पाइपलाइन का इस्तेमाल किया गया ताकि गहरी ड्रिलिंग की जा सके. कुएं की सफलता, साथ ही केरोसिन की मांग ने तेल की होड़ शुरू कर दी और एक बड़ा नया उद्योग शुरू हुआ.
एक बार फिर दशक बीते और एक क्रांतिकारी आविष्कार हुआ. जर्मन इंजीनियर कार्ल बेंज ने 1885 में पहली मोटर कार का आविष्कार किया. यह नया वाहन केरोसिन बनाने की प्रक्रिया के एक सस्ते बाय-प्रोडक्ट, जिसे गैसोलीन कहते हैं, से चलता था. 1908 में हेनरी फोर्ड ने मॉडल T बनाकर एक ऐसी कार बनाने का अपना वादा पूरा किया जिसे कोई भी खरीद सकता था, जिसके बाद गैसोलीन की मांग में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई.
अरब तेल की खोज
दशक बीते और नई सदी का आगाज हुआ, जिसमें तेल ने एक नया रूप धर लिया. जैसे-जैसे कारों की संख्या बढ़ी, वैसे-वैसे फ्यूल के तौर पर इस्तेमाल होने वाले गैसोलीन बनाने के लिए तेल की मांग भी बढ़ी, इसी समय मिडिल ईस्ट में भी तेल की खोज हुई. साल 1908 में एक अरब देश में पहली बार तेल मिला. फिर जल्द ही इस पूरे इलाके में और भी भंडार मिले. मिडिल ईस्ट के देशों के पास तेल निकालने के लिए टेक्नोलॉजी और जानकारी की कमी थी. इस वजह से पश्चिमी कंपनियों ने बहुत कम कीमत पर तेल खोजने और निकालने के अधिकार हासिल कर लिए.
तेल की रणनीतिक अहमियत
तेल की रणनीतिक अहमियत विश्व युद्ध के दौरान पता चली. प्रथम विश्व युद्ध से पहले दुनिया की महाशक्तियों ने अपनी नौसेनाओं को अपडेट किया और उनका विस्तार किया, जिससे नौसैनिक हथियारों की होड़ शुरू हो गई. आधुनिक जंगी जहाजों को कोयले से चलने वाले जहाजों से तेल पर चलने वाले जहाजों में बदला गया, क्योंकि इससे वे तेजी से चल सकते थे और अधिक समय तक समुद्र में रह सकते थे. तेल उन कुछ संसाधनों में से एक था जिसका उत्पादन ब्रिटिश साम्राज्य नहीं करता था और मध्य पूर्वी तेल तक पहुंच एक रणनीतिक प्राथमिकता बन गई थी. ऐसे में दुश्मन देश भी तेल के अपने स्रोत सुरक्षित करने के लिए दौड़ पड़े.
दूसरे विश्व युद्ध खत्म होने के बाद नेताओं को पता था कि तेल एक जरूरी चीज है. तेल पर कंट्रोल इस बात का एक अहम फैक्टर था कि युद्ध कौन जीतेगा. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भी, अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट और ब्रिटिश प्रधानमंत्री विन्सटन चर्चिल मिडिल ईस्ट के बढ़ते तेल भंडार पर नजर गड़ाए हुए थे. इसी दौरान 8 अगस्त 1944 को एंग्लो-अमेरिकन पेट्रोलियम एग्रीमेंट साइन किया गया, जिसमें मिडिल ईस्ट के तेल को अमेरिका और ब्रिटेन के बीच बांट दिया गया. रूजवेल्ट ने कहा, ‘फारसी तेल तुम्हारा है. हम इराक और कुवैत के तेल को शेयर करेंगे’. जहां तक सऊदी अरब के तेल की बात है, वह हमारा है. हालांकि, इस समझौते में संबंधित देशों के लोगों को शामिल नहीं किया गया था.
बदल गया शक्ति का संतुलन
1950 के दशक में शक्ति का संतुलन बदल गया, क्योंकि मध्य पूर्व ने अपनी ताकत को समझना शुरू कर दिया था. यह बदलाव स्वेज संकट के दौरान ब्रिटेन को साफ नजर आ गया. ब्रिटेन मध्य पूर्वी तेल के लिए स्वेज नहर का इस्तेमाल इंपोर्ट रूट के तौर पर करता था. जब मिस्र ने नहर पर दोबारा कब्जा कर लिया, तो यह न सिर्फ ब्रिटिश गर्व और ताकत के लिए एक झटका था, बल्कि इससे ब्रिटेन को तेल के लिए ज्यादा कीमत भी चुकानी पड़ी. दरअसल, 1956 में इजिप्ट के राष्ट्रपति नासिर ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया. इसके बाद दूसरे तेल उत्पादक देशों ने अपना प्रभाव डालना शुरू कर दिया. जैसे-जैसे पश्चिमी देशों की तेल पर निर्भरता बढ़ी, मध्य पूर्वी देशों को अपनी मोलभाव की स्थिति की ताकत का एहसास हुआ और उन्होंने तेल मुनाफे में ज्यादा हिस्सेदारी के लिए पश्चिमी तेल कंपनियों के साथ मौजूदा सौदों पर फिर से बातचीत की.
सात कंपनियों का तेल पर कब्जा
दरअसल, 1950 के दशक से सात कंपनियों ने दुनिया के 85 फीसदी तेल भंडारों पर कब्जा जमाया था. पहली कंपनी थी एंग्लो ईरानियन ऑयल, जो ब्रिटिश पेट्रोलियम (BP) है. दूसरी कंपनी थी रॉयल शेल जो आज की शेल है. तीसरी थी स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ कैलिफोर्निया जिसे आज शेवरॉन के नाम से जाना जाता है. यह अमेरिका की बड़ी कंपनी है. चौथी गल्फ ऑयल थी, जो अब अब शेवरॉन समूह का हिस्सा है. पांचवी थी टेक्सको, इसका भी शेवरॉन में मर्जर हो गया था. छठी कंपनी थी स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ न्यूजर्सी या एसओ जो अब एग्जॉन मोबिल समूह का हिस्सा है सातवीं कंपनी थी स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ न्यूयॉर्क जिसे बाद में एग्जॉन मोबिल में मिला दिया गया था. यह सात कंपनियां आज की तीन बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों में बदल गई हैं.
उथल-पुथल के बीच बदला तेल का बाजार
तेल को अपनी जमीन के नीचे संजोए मध्य पूर्व के देश इन चतुर सात बहनों के किरायेदार जैसे थे, क्योंकि उनका बजट इन कंपनियों के भरोसे ही था. लेकिन फिर खेल बदला और ईरान ने साल 1951 में अपने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया. ईरान के इस फैसले से ब्रिटिश तेल कंपनियों को जोरदार झटका लगा. झटका इतना बड़ा था कि ब्रिटेन और ईरान के कूटनीतिक रिश्ते तक खराब हो गए. साल आगे बढ़ा और 1956 में इजिप्ट के राष्ट्रपति मिस्र के राष्ट्रपति नासिर ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया. स्वेज नहर पहले ब्रिटेन और और यूरोप की कंपनियां चलाती थीं. यह औपनिवेशिक ताकतों के लिए एक और बड़ा झटका था.
इसी उथल-पुथल के बीच मध्य पूर्व के तेल उत्पादक देशों में सेवन सिस्टर्स यानी सातों तेल कंपनियों के खिलाफ सुलगते गुस्से को हवा मिली और ये भड़क उठा. इस बीच निकिता ख्रुश्चेव अगुवाई में रूस का सस्ता तेल बाजार में आ धमका, जिससे कीमतें टूटने लगीं. रूस ने पूरे तेल बाजार के गणित को बदलकर रख दिया. नतीजतन सेवन सिस्टर्स को भारी घाटा हुआ. बाजार में बने रहने के लिए कीमतों में कटौती की गई, लेकिन इस वजह से सऊदी-अरब और वेनेजुएला को मिलने वाला रेवेन्यू घट गया. इसके बाद तो फिर सेवन सिस्टर्स के खिलाफ गुस्सा भड़क उठा. वेनेजुएला उस समय प्रमुख तेल उत्पादक था उसका भी नुकसान काफी बढ़ गया. इसी उथल-पुथल के बीच काहिरा में अरब पेट्रोलियम कांग्रेस बुलाई गई और पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन (ओपेक) की नींव पड़ी.
ताकतवर हुआ ओपेक
अल्फांजो और तारीकी ने बगदाद में 10 से 14 सितंबर 1960 के बीच सऊदी अरब, कुवैत, वेनेजुएला, इराक और ईरान की एक बैठक बुलाई और यहीं तत्काल चार दिनों के भीतर ओपेक का जन्म हुआ. ओपेक आज दुनिया का सबसे बड़ा ऑयल कार्टल है. 1961 में कराकस में एक और बैठक हुई जहां ओपेक के गठन की औपचारिकताएं पूरी हो गई और 1970 तक सिर्फ 10 साल के भीतर ओपेक ने दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनियों को अपने-अपने इलाके से भगा दिया. तेल कंपनियों की सत्ता पर और तेल के उत्पादन पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया.
अरब तेल उत्पादकों ने अपनी ताकत का और भी ज्यादा इस्तेमाल किया. उन्होंने तेल पर अपने कंट्रोल का इस्तेमाल करके पॉलिटिकल एजेंडा को प्रभावित किया. 1973 में ऑर्गनाइजेशन ऑफ अरब पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज ने मिस्र और सीरिया के खिलाफ योम किप्पुर युद्ध में इजराइल को अमेरिकी समर्थन के बाद पश्चिमी देशों पर ऑयल बैन लगा दिया. तेल की सप्लाई कम हो गई और कीमतें लगभग चार गुना बढ़ गईं. दुनिया भर में अर्थव्यवस्थाएं खराब हो गईं और पश्चिमी सरकारों ने जरूरी सप्लाई पर मिडिल ईस्ट की पकड़ को तोड़ने के लिए तेल के दूसरे सोर्स खोजना शुरू कर दिया.
नॉर्थ सी का तेल पहली बार बहा
एक दशक तक तेल की खोज और बड़े निवेश के बाद, 3 नवंबर 1975 को नॉर्थ सी का तेल पहली बार बहना शुरू हुआ. फोर्टिज फील्ड को सर्विस देने वाली एक पाइपलाइन स्कॉटलैंड के उत्तर-पूर्व में क्रूडन बे से ग्रेंजमाउथ तक जाती थी. तेल की बढ़ती कीमतों ने महंगे नॉर्थ सी कच्चे तेल को निकालना फायदेमंद बना दिया. इससे यूके सरकार के खजाने में बढ़ोतरी हुई, लेकिन इससे देश मिडिल ईस्ट के तेल पर अपनी निर्भरता से आजाद नहीं हो पाया.
1990 के दशक में भी पश्चिमी देश मध्य पूर्वी तेल पर बहुत अधिक निर्भर थे. यह तब सबसे ज्यादा साफ हुआ जब इराक ने कुवैत पर हमला किया और उसके तेल क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया. इराक और कुवैत के बीच जमीन और तेल क्षेत्रों के मालिकाना हक को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद के कारण अगस्त 1990 में इराक ने कुवैत पर हमला कर दिया. कब्जा करने वाली इराकी सेना ने 700 से ज्यादा कुवैती तेल क्षेत्रों में आग लगा दी. इराकी नेताओं के साथ कूटनीतिक बातचीत फेल होने के बाद, अमेरिका के नेतृत्व वाले देशों के गठबंधन ने कुवैत को आजाद कराया और इराक पर कब्जा कर लिया. क्योंकि उनके लिए तेल की सप्लाई जारी रखना एक बड़ा रणनीतिक मकसद था.
फ्रैकिंग तकनीक
इस बीच पश्चिमी देशों ने तेल निकालने के नए तरीकों की तलाश जारी रखी. फिर आई फ्रैकिंग तकनीक. दरअसल, जमीन में ज्यादा प्रेशर वाले फ्लूइड्स को पंप करने से तेल वाली चट्टानें टूट जाती हैं – या ‘फ्रैक’ हो जाती हैं – जिससे तेल निकाला जा सकता है. सरकार के पैसे और तेल की ज्यादा कीमतों से बढ़ावा मिलने पर, फ्रैकिंग फायदेमंद हो गई. अमेरिका में तेल का प्रोडक्शन बढ़ा और मिडिल ईस्ट से तेल इंपोर्ट में तेजी से गिरावट आई.
अमेरिका ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन दिए. अमेरिका के लिए तेल की क्रांति 2000 का दशक लेकर आया और फिर दुनिया के तेल के ऑर्डर बदलने लगे. 2000 के दशक में अमेरिका की चट्टानों से यानी शेल से तेल निकाला गया. शेल का तेल हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग या फ्रैकिंग तकनीक से निकाला जाता था और इसने शेल इसने तेल के उत्पादन को और तेल की कीमत को अमेरिका के लिए किफायती बना दिया. 2010 के बाद अमेरिका में कच्चे तेल का उत्पादन तेजी से बढ़ा. 2023 तक अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक बन गया. करीब 13.55 मिलियन बैरल तेल प्रतिदिन उत्पादन करता था.
US और OPEC+ का तेल उत्पादन और एक्सपोर्ट
| वर्ष | US उत्पादन (mb/d) | US एक्सपोर्ट (mb/d) | OPEC+ उत्पादन (mb/d) | OPEC+ एक्सपोर्ट हिस्सेदारी | अहम प्वाइंट्स |
| 2015 | 9.4 | 0.5 | 43–44 | 60% वैश्विक | US में एक्सपोर्ट प्रतिबंध हटा, OPEC+ औपचारिक नहीं |
| 2018 | 11 | 2 | 48 | 59% वैश्विक | OPEC+ ने कीमतें स्थिर करने के लिए कटौती शुरू की |
| 2019 | 12.3 | 3 | 48 | 59% वैश्विक | US ने नया उत्पादन रिकॉर्ड बनाया |
| 2020 | 11.3 | 3.2 | 47 | 59% वैश्विक | कोविड-19 से मांग घटी, OPEC+ की ऐतिहासिक कटौती |
| 2021 | 11.2 | 3 | 47 | 59% वैश्विक | धीमी रिकवरी, OPEC+ ने कटौती बनाए रखी |
क्या एक बार फिर बदलेगा तेल का बाजार?
अब एक बार शायद फिर से तेल का बाजार बदल सकता है, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति ने साफ कर दिया है कि वे वेनेजुएला के ऑयल रिजर्व को फिर से रिवाइव करेंगे. यानी वेनेजुएला का तेल बड़े पैमाने पर ग्लोबल मार्केट में पहुंचेगा. हाल के वर्षों में वेनेजुएला को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा है, जिसमें प्रोडक्शन में काफी कमी आई. सरकारी कुप्रबंधन और अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण तेल उत्पादन में भारी गिरावट आई है और इस सेक्टर में गंभीर रूप से कम निवेश हुआ है.
वेनेजुएला में मिस्टर ट्रंप के दखल से तेल बाजारों में हलचल मचनी तय है, लेकिन एनालिस्ट्स का कहना है कि कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी होने की संभावना नहीं है. वेनेजुएला एक छोटा तेल उत्पादक देश है और कई एनालिस्ट्स का मानना है कि तेल बाजार में अभी सप्लाई ज्यादा है. इंटरनेशनल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड शुक्रवार को $60.80 प्रति बैरल पर ट्रेड कर रहा था, जो इस साल के निचले स्तर के करीब है.
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