इंडिका कार का इंजन… 200 करोड़ रुपये और 5 साल का वक्त, ऐसे बना था टाटा का ‘छोटा हाथी’
Tata ACE Story: टाटा ऐस ने पूरे कमर्शियल वाहन के मार्केट को बदल दिया. मार्केट में आते ही इसने धमाल मचा दिया और जमकर बिक्री हुई. लेकिन इसे बनाने के पीछे एक लंबा वक्त और करोड़ों रुपये खर्च हुए थे और इसका नाम खुद रतन टाटा ने रखा था. कंपनी ने इसकी ब्रॉन्डिंग 'छोटा हाथी' के नाम से की.
How Tata Developed ACE Mini Truck: टाटा मोटर्स और ट्रक… दोनों का रिश्ता कुछ ऐसा है कि किसी दूसरी मोटर कंपनी के ट्रक के पीछे भी आपको लाल या काले अक्षरों में OK के साथ TATA लिखा हुआ नजर आ जाएगा. मार्केटिंग और ब्रॉन्ड के कुशल जानकार कहते हैं कि ब्रॉन्डिंग हो तो ऐसी.
आमतौर पर हमारी स्मृतियों में सड़कों पर दौड़ते टाटा के भारी-भरकम ट्रक बसे हैं. लेकिन नए दौर में टाटा की कहानी किसी और ट्रक ने बदली, जो हर किसी के दरवाजे पर भारी भरकम सामान लेकर पहुंचा. खेतों से हरी सब्जियों को झट से बाजार पहुंचाया. नई दुल्हन के मायके से अलमीरा, पलंग और सोफे को उसके ससुराल के दरवाजे तक पहुंचाया. यहां तक की जब मेले से गाय खरीदकर घर आई, तो उसी पर सवार होकर आई. चावल का व्यापार करने वाले गुप्ता जी का तो सायकिल पर बोरी ढोना भी इसने छुड़वा दिया, क्योंकि ये उनके दरवाजे तक पहुंच जाती थी. और तो और शहरों में जब बैचलर लड़के या लड़कियां किराये के घर बदलते हैं, तो सामान का बोझ उठाने के लिए इसे ही बुलाते हैं. कुल मिलाकर बात ये कि इसने हर उस काम को संभव किया, जो टाटा के भारी-भरकम ट्रक नहीं कर सकते थे. आज भी सड़कों पर ये खूब दौड़ती है और ये एक मिनी ट्रक है, जिसकी ब्रॉन्डिंग ‘छोटा हाथी’ के नाम से हुई… तो चलिए इसकी कहानी पढ़ते हैं…
मंदी से निपटने लिए बना प्लान
बात करीब 25 साल पहले की है. सदी का अंत टाटा मोटर्स के लिए खास तौर पर मुश्किल भरा रहा था. 1998/99 में शुरू हुई कमर्शियल वाहन के सेक्टर में की मंदी लंबी और गहरी थी. सुधार दूर की कौड़ी लग रहा था. टाटा मोटर्स के पास मार्केट में करीब 60 फीसदी हिस्सेदारी थी और मैन्युफैक्चरिंग की बड़ी कैपेसिटी तो थी ही. लेकिन लगातार बढ़ती हुई मंदी कंपनी के लिए सिरदर्द बनी हुई थी. ऐसे में कंपनी के टॉप मैनेजमेंट ने गहरी हो चुकी मंदी से निपटने के प्लान पर नए सिरे से सोचना शुरू कर दिया.
मार्केट में पहुंचीं टीमें
बिजनेस टुडे के अनुसार, टाटा मोटर्स के कमर्शियल वाहन कारोबार का नेतृत्व तब रवि कांत कर रहे थे. उन्होंने साल 2000 के अंत तक मार्केट को समझने के लिए चार क्रॉस-फंक्शनल टीमें गठित कीं और उन्हें सड़क पर उतार दिया. टीमों का काम बाजार और ग्राहकों की नई जरूरतों को समझने का था. टीमों ने मुख्य रूप से चार सेगमेंट का सर्वे किया, जिसमें इंटरमीडिएट कमर्शियल वाहन, हल्के कमर्शियल वाहन, मिडियम कमर्शियल वाहन और उससे ऊपर और सब-फोर-टन मार्केट शामिल था.
सब-फोर-टन मार्केट
रवि कांत ने 29 वर्षीय मैकेनिकल इंजीनियर गिरीश वाघ को सब-फोर-टन मार्केट की स्टडी के लिए चुना. इस सेगमेंट में बजाज ऑटो, महिंद्रा एंड महिंद्रा और पियाजियो के बनाए गए तिपहिया वाहनों का दबदबा था. उस समय, उद्योग में किसी ने भी वास्तव में नहीं सोचा था कि चार पहिया वाला ट्रक इस सेगमेंट में फिट हो सकते हैं. हालांकि, वाघ और उनकी टीम ने जल्द ही इस धारणा को बदल डाला. साल 2001 की शुरुआत में वाघ की मुलाकात कोयंबटूर में एक बजाज मिनीडोर के मालिक-चालक से हुई. उस व्यक्ति के लिए सबसे अच्छा विकल्प एक हल्का लाइट वाहन था, जो लगभग चार टन भार ले जा सकता था. लेकिन 5 लाख रुपये से अधिक कीमत वाला यह वाहन उसकी क्षमता से बाहर था.
कैसे आया आइडिया?
अहमदाबाद में टाटा 407 के ट्रक चालक के साथ ऐसी ही एक मीटिंग के दौरान, वाघ के दिमाग में एक छोटा ट्रक लॉन्च करने का आइडिया आया. टाटा 407 के ट्रक चालक ने गिरीश वाघ को बताया था कि कैसे तिपहिया कमर्शियल वाहन उनके व्यवसाय को खत्म कर रहे हैं. क्योंकि वे कम किराया में तेजी से माल पहुंचा रहे हैं. वाघ को समझ में आ गया कि उसकी जरूरत टाटा 407 के आधे साइज का यानी 2.25 टन का ट्रक चाहता है. बाजार से मिली प्रतिक्रिया से साफ था कि छोटे ट्रकों की मांग बढ़ रही है. लेकिन टाटा मोटर्स का टॉप मैनेजमेंट छोटे ट्रक को लेकर कुछ खास आश्वस्त नहीं था. इसके बजाय तिपहिया कमर्शियल वाहन लॉन्च करने पर सवाल उठाए गए.
स्टडी में सामने आए दिलचस्प नतीजे
वाघ और उनकी टीम को दो समानांतर डेवलपमेंट से मदद मिली. टाटा मोटर्स ने कमर्शियल वाहन उद्योग का एक मैक्रो प्रोजेक्शन करवाया और इससे दिलचस्प नतीजे सामने आए. स्टडी में कहा गया कि मिडियम कमर्शियल वाहन का सेगमेंट भविष्य में खत्म हो जाएगा और यही टाटा मोटर्स का मुख्य आधार था. स्टडी से पता चला कि रोड ट्रांसपोर्टेशन में हब-एंड-स्पोक मॉडल उभर रहा है. इस वजह से सारा आकर्षण छोटे कमर्शियल वाहन की तरफ ट्रांसफर हो जाएगा. टाटा मोटर्स ने इस अंतर को पहचान लिया.
रतन टाटा ने 45 मिनट में दे दी मंजूरी
लगभग उसी समय तत्कालीन चेयरमैन रतन टाटा समूह को घरेलू बाजार में ग्रोथ के अवसरों की पहचान करने के लिए प्रेरित कर रहे थे. खासकर उनका फोकस मार्केट के निचले हिस्से पर था, जिनके लिए टाटा ऐस (Tata ACE) बिल्कुल उपयुक्त था. जब वाघ ने मार्च 2001 में एक प्रेजेंटेशन दिया, तो रतन टाटा बहुत उत्साहित थे. बिजनेस टुडे से वाघ ने कहा था कि जो 10 मिनट का प्रेजेंटेशन होना था, वह 45 मिनट तक चला. अंत में रतन टाटा ने कहा कि हमें ये प्रोडक्ट बनाना चाहिए. रतन टाटा की सहमति से प्रोजेक्ट की मंजूरी मिल गई.
इंजन बना सिरदर्द
प्रोजेक्ट शुरू हो गया, लेकिन मुश्किलें कम नहीं थी और इसकी शुरुआत इंजन से हुई. टीम ने इंजन के लिए एक निश्चित लागत, फ्यूल एफिशिएंसी और उत्सर्जन पैरामीटर तय किए थे. साथ ही रिफाइनमेंट का एक स्तर भी तय किया गया था. लेकिन टीम के लिए यह आश्चर्य की बात थी कि दुनिया भर में कोई भी इंजन इस पैरामीटर के हिसाब से उपलब्ध नहीं था. इंजन के बिना प्रोजेक्ट की शुरुआत नहीं हो सकती थी. फिर टीम ने अपने चार सिलेंडर वाली इंडिका के इंजन का दो सिलेंडर वाला वर्जन इन-हाउस डेवलप करने का फैसला किया.
डबल सिलेंडर वाला इंजन
यह एक बेहद साहसिक फैसला था, क्योंकि बाजार में या तो सिंगल-सिलेंडर इंजन था या फिर फोर-सिलेंडर इंजन. दो-सिलेंडर इंजन डेवलप करना एक चुनौती थी. इसका शुरुआती प्रदर्शन ( नॉइज लेवल , फ्यूल एफिशिएंसी और उत्सर्जन स्टैंडर्ड) सिंगल-सिलेंडर इंजन से बेहतर था, लेकिन फोर-सिलेंडर पावरट्रेन की तुलना में बहुत कम था. टीम ने प्रदर्शन को निखारना जारी रखा और आखिरकार 2002 के मध्य तक इंजन तैयार हो गया. यह एक बहुत बड़ा डेवपलमेंट था. क्योंकि कंपटीटर कंपनियों को उपयुक्त इंजन नहीं मिलने के चलते छोटे ट्रक के आइडिया को ड्रॉप करना पड़ा था. कुछ को महंगा कॉमन-रेल-डायरेक्ट-फ्यूल-इंजेक्शन इंजन लगाने के लिए मजबूर होना पड़ा. यह इंजन बाद में टाटा ऐस (Tata ACE) की यूएसपी बन गया.
टीम ने प्रोडक्ट को बनाने में नए फ्रंट को आजमाने में संकोच नहीं किया. आम तौर पर एक नए ट्रक के डेवलपमेंट (मूल्य के संदर्भ में) का लगभग 60 फीसदी आउटसोर्स किया जाता था. टाटा ऐस के लिए इसे बढ़ाकर 80 फीसदी कर दिया गया. टीम ने टाटा ऐस के लिए एक सेमी मोनोकॉक स्ट्रक्चर को आजमाने का विकल्प चुना. इसमें बॉडी को फ्रेम में वेल्डेड किया जाता है, जो वाहन को वजन एफिशिएंसी देता है. यह भारतीय ट्रक सेक्टर में नया था.
खर्च हुए 200 करोड़
पूरे डेवलपमेंट को सात चरणों में बांटा गया था और हर चरण में एक गेटवे था. ऐस एक से अधिक बार गेटवे पास करने में विफल रहा एक बार वाहन के पूरे कॉन्सेप्ट पर बड़े पैमाने पर दोबारा काम करना पड़ा. वाहन 2005 की शुरुआत में समय पर तैयार हो गया और इसने महंगाई दर के अनुरूप कॉस्ट टार्गेट को पूरा किया. ओवरऑल डेवलपमेंट की लागत कुल 200 करोड़ रुपये थी (पुणे में 30,000-यूनिट क्षमता स्थापित करने की लागत सहित).
बाजार में मच गई धूम
मई 2005 में जब ऐस को लॉन्च किया गया, तो इसने बाजार में धूम मचा दी. टाटा मोटर्स को इस सेगमेंट में पहले आने का फायदा मिला. ऐस की सफलता को देखते हुए अन्य कंपनियां भी आगे आई, लेकिन वे अभी भी इसका मुकाबला नहीं कर पा रही हैं. इसने इसने छोटे हल्के कमर्शियल वाहनों का एक नया सेगमेंट बनाया.
रतन टाटा ने रखा था ‘ऐस’ नाम
नवंबर 2012 में ऐस की बिक्री 10 लाख के आंकड़े को पार कर गई. इसकी सफलता ने टाटा मोटर्स को कई तरह से मदद की है. रतन टाटा ने वाहन का नाम ‘ऐस’ इसलिए रखा क्योंकि वे परीक्षण के दौरान इसके प्रदर्शन से वे प्रभावित थे. ऐस को आमतौर पर ‘इक्का’ कहा जाता है और इसने अपने नाम को सार्थक भी साबित किया है. पिछले 20 साल से टाटा ऐस सड़कों पर दौड़ रही है और टाटा मोटर्स की सफलता में अपने योगदान से चमक रही है. टाटा मोटर्स ने एक एड के जरिए ‘छोटा हाथी’ के नाम से ब्रान्डिंग की थी, तब इसे ‘छोटा हाथी’ कहा जाने लगा.
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