चावल बेचे, ट्रकों की मरम्मत की और फिर दुनिया भर में छा गया, घर से भागे लड़के ने कैसे खड़ी की हुंडई

पिता गरीब किसान थे और लड़के ने गरीबी की बेड़ियों को तोड़कर उड़ान भरने के सपना देख लिया था. आंखों में पनपे सपने को हकीकत में बदलने के लिए लड़का अपनी देश की राजधानी पहुंचा. जीवन गुजारने के लिए मजदूरी की.

कैसे हुई थी हुंडई की शुरुआत, जबरदस्त है कहानी. Image Credit: Hyundai Motor Company

बात साल 1933 की है. 18 साल का एक लड़का चौथी बार अपने घर से भागा था. इससे पहले वो तीन बार भागकर वापस घर लौट आया था, लेकिन इस बार उसने तय कर लिया था कि कुछ भी हो जाए लौटना नहीं है. घर से भागने के पीछे की वजह सिर्फ एक थी कि जीवन को कैसे बेहतर किया जाए. पिता गरीब किसान थे और लड़के ने गरीबी की बेड़ियों को तोड़कर उड़ान भरने के सपना देख लिया था. आंखों में पनपे सपने को हकीकत में बदलने के लिए लड़का अपनी देश की राजधानी पहुंचा. जीवन गुजारने के लिए मजदूरी की. रेलवे कंस्ट्रक्शन में काम किया, बहीखाता संभाला, चावल बेचा, आर्मी के ट्रकों की रेपेयरिंग भी की, फिर एक कंस्ट्रक्शन कंपनी बनाई, जिससे पैसा कमाया. फिर उस कंपनी की नींव रखी, जिसकी वजह से पूरी दुनिया में उसका डंका बजा. शख्स का नाम है चुंग जू-युंग और कंपनी है हुंडई मोटर, जिसकी कारें दुनिया भर में बिकती हैं. भारत में हुंडई अपना इनिशियल पब्लिक ऑफर (IPO) लेकर आ रही है और कहा जा रहा है कि यह अब तक के सबसे बड़े आईपीओ में से एक होगा.

चावल की दुकान का मालिक

चुंग जू-युंग का जन्म 1915 में कोरिया के (अब उत्तर कोरिया) में एक गरीब किसान परिवार के सबसे बड़े बेटे के रूप में हुआ था. 18 साल की उम्र में वो सियोल चले गए थे. सियोल में चुंग जू-युंग ने कई तरह के काम किए. लेकिन एंटरप्रेन्योर का पहला अनुभव चुंग जू-युंग को साल 1938 मिला. जिस दुकान पर युंग राइस सेल्समैन की नौकरी करते और बाद में अकाउंटेंट के पद तक पहुंचे थे, उसका मालिक बीमार हो गया. मालिक ने दुकान युंग के हवाले कर दिया. इस तरह से युंग चावल बेचने वाली दुकान के मालिक बन गए. हालांकि, जपानी कब्जे वाली सेना की नीतियों के कारण उन्हें एक साल बाद अपना व्यवसाय बंद करना पड़ा और वे वापस अपने गांव लौट आए.

जापान की औपनिवेशिक सरकार के कुछ उद्योगों में कोरियाई लोगों पर लगाए गए प्रतिबंधों पर विचार करने के बाद चुंग ने ऑटोमोबाइल रिपेयरिंग के बिजनेस में प्रवेश करने का फैसला किया. एक दोस्त से खरीदे गए सर्विस गैराज में काम कारोबार शुरू किया. गाड़ियों की मरम्मत का कारोबार चल निकला. गैराज में तीन वर्षों के भीतर, कर्मचारियों की संख्या 20 से बढ़कर 70 हो गई. दूसरे विश्व युद्ध में कोरिया की आजादी के बाद चुंग जू-युंग अमेरिकी सेना के लिए ट्रकों की मरम्मत के कारोबार में चले गए.

इंजीनियरिंग और कंस्ट्रक्शन बिजनेस

फिर वहां से युंग ने इंजीनियरिंग और कंस्ट्रक्शन के बिजनेस में कदम रखा. अपने इस कारोबार से उन्होंने दुनिया भर में अरबों डॉलर के मेगा-प्रोजेक्ट पर काम किया. अपने प्रयासों और रचनात्मकता के दम पर चुंग ने ऐसे कारोबार खड़े किए, जिन्होंने कोरिया को आज की आर्थिक महाशक्ति बनाने में मदद की. एक साधारण शुरुआत से चुंग जू-युंग सफलता के शिखर तक पहुंचे और उसे बरकरार भी रखा.

हुंडई मोटर कंपनी की शुरुआत

चुंग जू-युंग ने साल 1967 में हुंडई मोटर कंपनी की. कंपनी का पहला मॉडल कॉर्टिना 1968 में फोर्ड मोटर कंपनी के सहयोग से लॉन्च हुआ. हुंडई जब अपनी कार डेवलप करना चाहती थी, तो फरवरी 1974 में ब्रिटिश लेलैंड में ऑस्टिन मॉरिस के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर जॉर्ज टर्नबुल को अपनी कंपनी के साथ जोड़ा. हुंडई को 1982 में ब्रिटिश बाजार में एंट्री मिली और पहले ही साल कंपनी ने 2993 कारें बेच दीं. इसके बाद कंपनी ने दुनियाभर में अपने कारोबार फैला लिए.

भारत में हुंडई

साल 1996 में हुंडई की भारतीय मार्केट में एंट्री हुई. चेन्नई के निकट इरुंगट्टुकोट्टई प्लांट के लिए कंपनी ने भूमिपूजन समारोह आयोजित किया. भूमिपूजन के रिकॉर्ड 17 महीने के भीतर ही प्लांट में सैंट्रो कार का पायलट प्रोडक्शन शुरू हो गया. 23 सितंबर 1998 को हुंडई सैंट्रो (एटोस प्राइम) ने भारत में पहली बार अपनी चमक बिखेरी. 31 मार्च 1999 को हुंडई मोटर इंडिया देश की दूसरी सबसे बड़ी ऑटो निर्माता कंपनी बनकर उभरी. इसके बाद कंपनी ने एक के बाद एक कारें उतारीं और भारतीय मार्केट में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाते चली गई. अब कंपनी भारत में 3 अरब डॉलर (करीब 25000 करोड़ रुपये) के बराबर का आईपीओ लाने की तैयारी में है.