डिजिटल फ्रॉड के शिकार हुए तो मिलेगी ₹25000 तक की राहत, RBI ने तैयार किया मुआवजे का नया फॉर्मूला; जानें क्या है प्रक्रिया

डिजिटल फ्रॉड के बढ़ते मामलों के बीच आरबीआई ने मुआवजे का नया प्रस्ताव रखा है. इसके तहत छोटे डिजिटल फ्रॉड में ग्राहकों को नुकसान का 85 प्रतिशत तक मुआवजा मिल सकता है, जिसकी अधिकतम सीमा 25,000 रुपये होगी. यह सुविधा जीवन में एक बार मिलेगी और फ्रॉड की शिकायत बैंक व साइबर पोर्टल पर पांच दिन के भीतर करनी होगी.

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया Image Credit: Getty image

ऑनलाइन पेमेंट और डिजिटल बैंकिंग के बढ़ते इस्तेमाल के साथ फ्रॉड के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं. ऐसे मामलों में ग्राहकों को राहत देने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने एक नया प्रस्ताव तैयार किया है. इस प्रस्ताव के तहत छोटे डिजिटल फ्रॉड के शिकार लोगों को उनके नुकसान का 85 फीसदी तक मुआवजा मिल सकता है. हालांकि इसकी अधिकतम सीमा 25,000 रुपये तय की गई है और यह सुविधा किसी ग्राहक को पूरे जीवन में केवल एक बार मिलेगी.

दरअसल यह प्रस्ताव आरबीआई द्वारा डिजिटल लेनदेन में ग्राहकों की जिम्मेदारी से जुड़े नियमों की समीक्षा के तहत जारी मसौदा संशोधन का हिस्सा है. इस योजना की घोषणा 6 फरवरी की मौद्रिक नीति के दौरान आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने की थी.

कब से लागू हो सकता है नियम ?

आरबीआई के मसौदा दिशा-निर्देशों के मुताबिक यह नियम 1 जुलाई 2026 के बाद होने वाले इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग लेनदेन पर लागू हो सकता है. आरबीआई ने इस प्रस्ताव पर आम लोगों और संबंधित पक्षों से सुझाव भी मांगे हैं. इसके लिए 6 अप्रैल 2026 तक अपनी राय भेजी जा सकती है.

किन मामलों में मिलेगा मुआवजा?

प्रस्ताव के मुताबिक अगर किसी ग्राहक को डिजिटल बैंकिंग फ्रॉड में 50,000 रुपये तक का नुकसान होता है तो उसे मुआवजा मिल सकता है. ग्राहक को नुकसान का 85 प्रतिशत या 25,000 रुपये, जो भी कम होगा, उतनी रकम दी जाएगी. लेकिन इसके लिए जरूरी है कि ग्राहक धोखाधड़ी की जानकारी बैंक और राष्ट्रीय साइबर क्राइम पोर्टल या राष्ट्रीय साइबर क्राइम हेल्पलाइन पर पांच दिन के भीतर दर्ज कराए.

नुकसान के हिसाब से मुआवजा कैसे तय होगा?

अगर किसी ग्राहक का नुकसान 29,412 रुपये से कम है तो मुआवजा नुकसान के 85 प्रतिशत के आधार पर तय होगा.
इस स्थिति में मुआवजे का 65 प्रतिशत हिस्सा आरबीआई देगा, जबकि ग्राहक का बैंक और जिस बैंक खाते में पैसा गया है वह बैंक 10-10 प्रतिशत हिस्सा देंगे.

अगर नुकसान 29,412 रुपये से ज्यादा और 50,000 रुपये तक है तो मुआवजा 25,000 रुपये तक सीमित रहेगा.
इस स्थिति में मुआवजे में आरबीआई 19,118 रुपये देगा, जबकि ग्राहक का बैंक और लाभार्थी बैंक 2,941 रुपये-2,941 रुपये देंगे. आरबीआई के प्रस्ताव के मुताबिक बैंक को आवेदन मिलने के बाद पांच कैलेंडर दिनों के भीतर ग्राहक के खाते में मुआवजा जमा करना होगा. इसके बाद बैंक तिमाही आधार पर आरबीआई से उसका हिस्सा वापस ले सकते हैं.

डिजिटल ट्रांजैक्शन की नई परिभाषा

आरबीआई ने इस मसौदे में डिजिटल बैंकिंग लेनदेन की परिभाषा को भी और स्पष्ट किया है. अब ओटीपी, पिन, सीवीवी, पासवर्ड या दूसरे इलेक्ट्रॉनिक ऑथेंटिकेशन के जरिए स्वीकृत भुगतान को अधिकृत इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन माना जाएगा.
इसमें ऐसे मामले भी शामिल होंगे जहां ग्राहक को ठग किसी वैध व्यक्ति या संस्था बनकर पैसे ट्रांसफर करने के लिए धोखा देते हैं या दबाव डालकर भुगतान करवाते हैं.

आरबीआई ने “फ्रॉडुलेंट इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग ट्रांजैक्शन” नाम की नई कैटेगरी भी जोड़ी है. इसमें ग्राहक की अनुमति के बिना हुए लेनदेन के साथ-साथ धोखे से करवाए गए भुगतान भी शामिल होंगे.

बैंक और ग्राहक की जिम्मेदारी भी तय

आरबीआई ने यह भी साफ किया है कि फ्रॉड के मामलों में बैंक और ग्राहक की जिम्मेदारी कैसे तय होगी. अगर बैंक की लापरवाही से फ्रॉड होता है, जैसे जरूरी सुरक्षा सिस्टम न होना, ट्रांजैक्शन अलर्ट न भेजना, शिकायत दर्ज करने की व्यवस्था न होना या शिकायत पर समय से कार्रवाई न करना, तो ग्राहक की जिम्मेदारी शून्य होगी. अगर किसी तीसरे पक्ष की वजह से धोखाधड़ी होती है और ग्राहक पांच दिन के भीतर इसकी शिकायत कर देता है, तब भी ग्राहक पर कोई जिम्मेदारी नहीं होगी.

बैंकों को क्या करना होगा?

नए प्रस्ताव के तहत बैंकों को 500 रुपये से ज्यादा के हर डिजिटल लेनदेन पर तुरंत एसएमएस अलर्ट भेजना होगा.
इसके अलावा ग्राहकों के लिए चौबीसों घंटे फ्रॉड रिपोर्ट करने की सुविधा भी देनी होगी. बैंकों को शिकायत मिलने के बाद तय समय के भीतर जांच पूरी करनी होगी और यह अवधि 30 दिनों से ज्यादा नहीं हो सकती.

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