सिल्वर डिमांड ने बढ़ा दिया इंपोर्ट बिल, 129% बढ़कर 7.77 बिलियन डॉलर पहुंचा, सोना-पेट्रोलियम भी रह गए पीछे
चालू वित्त वर्ष में इंडिया के इंपोर्ट बिल में सिल्वर एक अहम ड्राइवर बनकर उभरा है. अप्रैल से दिसंबर की अवधि में सिल्वर इंपोर्ट 129 फीसदी बढ़कर 7.77 बिलियन डॉलर पहुंच गया है. ग्लोबल कीमतों में उछाल, सेफ हेवन बाइंग और चीन की सख्त एक्सपोर्ट पॉलिसी ने सप्लाई चिंताओं को बढ़ाया है. दिसंबर में सिल्वर इंपोर्ट में 79.7 फीसदी की तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई.
Silver imports India: चालू वित्त वर्ष में भारत के इंपोर्ट बिल में सिल्वर एक अहम फैक्टर के तौर पर उभरकर सामने आया है. ग्लोबल मार्केट में कीमतों में तेज उछाल और सप्लाई साइड पर बढ़ती अनिश्चितता के बीच सिल्वर इंपोर्ट में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है. अप्रैल से दिसंबर की अवधि में इंडिया का सिल्वर इंपोर्ट 129 फीसदी बढ़कर 7.77 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 3.39 बिलियन डॉलर था. यह बढ़त ऐसे समय में आई है, जब गोल्ड और पेट्रोलियम जैसे बड़े इंपोर्ट सेगमेंट में सीमित ग्रोथ देखने को मिली है.
दिसंबर में तेज उछाल, फेस्टिव सीजन के बाद भी बनी मांग
दिसंबर में सिल्वर इंपोर्ट में अचानक तेज उछाल देखा गया. अगर पिछले महीने के आधार पर देखा जाए तो सिल्वर इंपोर्ट 79.7 फीसदी बढ़कर 0.76 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया. आमतौर पर फेस्टिव सीजन खत्म होने के बाद इंपोर्ट में नरमी आती है, लेकिन इस बार मजबूत मांग और कीमतों में तेजी के कारण ट्रेंड उलटा रहा. यही वजह है कि चालू वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में सिल्वर इंपोर्ट का प्रदर्शन बाकी कमोडिटी से अलग नजर आया.
गोल्ड और पेट्रोलियम से अलग ट्रेंड
जहां सिल्वर इंपोर्ट में जबरदस्त तेजी दर्ज की गई, वहीं गोल्ड और पेट्रोलियम इंपोर्ट का रुख अलग रहा. दिसंबर में गोल्ड इंपोर्ट 12.1 फीसदी घटकर 4.13 बिलियन डॉलर रह गया. अप्रैल–दिसंबर की कुल अवधि में गोल्ड इंपोर्ट में सिर्फ 1.8 फीसदी की मामूली बढ़ोतरी हुई.
पेट्रोलियम इंपोर्ट दिसंबर में करीब 6 फीसदी बढ़कर 14.41 बिलियन डॉलर रहा, लेकिन कम्युलेटिव आधार पर इसमें 4.3 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई और यह 135.4 बिलियन डॉलर पर आ गया. इससे साफ है कि सिल्वर इंपोर्ट की तेजी व्यापक इंपोर्ट ट्रेंड से अलग रही है.
ग्लोबल कीमतों का असर
सिल्वर इंपोर्ट में उछाल की बड़ी वजह ग्लोबल प्राइस में तेजी मानी जा रही है. 15 जनवरी तक सिल्वर की कीमत करीब 91.6 डॉलर प्रति औंस पर ट्रेड कर रही थी, जबकि इससे एक दिन पहले यह लगभग रिकॉर्ड स्तर 93.7 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई थी. जियोपॉलिटिकल टेंशन, ग्लोबल मार्केट में अनिश्चितता और सेफ हेवन बाइंग ने सिल्वर को मजबूत सपोर्ट दिया है. एनालिस्ट्स का मानना है कि 2026 के दौरान भी सिल्वर की कीमतें ऐतिहासिक लेवल से ऊपर बनी रह सकती हैं, हालांकि शॉर्ट टर्म वोलैटिलिटी संभव है.
चीन की सख्त एक्सपोर्ट पॉलिसी से बढ़ी चिंता
सप्लाई साइड पर दबाव और बढ़ गया है. चीन सिल्वर का बड़ा प्रोड्यूसर और प्रोसेसर है, उसने 1 जनवरी 2026 से अप्रूवल बेस्ड एक्सपोर्ट रूल लागू कर दिए हैं. इसके तहत केवल अप्रूव्ड फर्म्स को ही सिल्वर एक्सपोर्ट की अनुमति दी जा रही है. इस कदम से ग्लोबल सप्लाई कंसंट्रेशन और प्राइस वोलैटिलिटी को लेकर चिंताएं और गहरी हो गई हैं.
इंडस्ट्रियल डिमांड ने बढ़ाई अहमियत
सिल्वर की मांग अब इन्वेस्टमेंट और ज्वेलरी तक सीमित नहीं है. इंडस्ट्रियल यूज में इसकी भूमिका लगातार बढ़ रही है. 2025 में ग्लोबल सिल्वर डिमांड का करीब 17 फीसदी हिस्सा सोलर मैन्युफैक्चरिंग से आया, जो एक दशक पहले 10 फीसदी से भी कम था. इसके अलावा इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स एप्लिकेशंस में भी सिल्वर की हिस्सेदारी करीब एक-चौथाई बनी हुई है. ग्रीन एनर्जी और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स से जुड़ी इंडस्ट्री के लिए सिल्वर एक स्ट्रैटेजिक मेटल बन चुका है.
सप्लाई डाइवर्सिफाई करने की रणनीति
चीन पर बढ़ती निर्भरता को कम करने के लिए इंडिया अब पेरू और चिली जैसे प्रमुख सिल्वर प्रोड्यूसिंग देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर बातचीत आगे बढ़ा रहा है. इन समझौतों का मकसद टैरिफ और कस्टम बैरियर कम करना, लागत घटाना और लॉन्ग टर्म में स्थिर सप्लाई सुनिश्चित करना है.
कुल मिलाकर, कीमतों में उछाल, चीन की सख्त एक्सपोर्ट पॉलिसी और इंडस्ट्रियल डिमांड में तेजी ने इंडिया के सिल्वर इंपोर्ट को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है. हालांकि, इसका असर ट्रेड डेफिसिट और इंपोर्ट बिल पर भी पड़ रहा है, जिससे आने वाले समय में पॉलिसी और ट्रेड स्ट्रैटेजी पर खास नजर रहने वाली है.
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