तियानजिन से वॉशिंगटन तक, भारत का चीन-अमेरिका से कैसा बिजनेस, जानें क्या खरीदता और क्या बेचता है
भारत की विदेश नीति इस समय बड़े मोड़ पर खड़ी है. एक तरफ अमेरिकी टैरिफ भारतीय उद्योगों को दबाव में डाल रहे हैं, तो दूसरी तरफ एशिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच रिश्तों में नया मोड़ आया है. सवाल ये है कि इन बदलते हालात में भारत की अगली रणनीति क्या होगी?
तियानजिन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ऐतिहासिक मुलाकात ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति और अर्थव्यवस्था में नए संकेत दिए हैं. वैश्विक व्यापारिक परिदृश्य इस समय बड़ी उथल-पुथल से गुजर रहा है. अमेरिका भारतीय उत्पादों पर 50 फीसदी टैरिफ लगाकर दबाव बना रहा है, वहीं चीन और भारत एक-दूसरे के करीब आते दिख रहे हैं. यह मुलाकात SCO Summit के इर्द-गिर्द हुई, और संदेश साफ है कि एशिया की दो सबसे बड़ी ताकतवर अर्थव्यवस्थाएं बदलते जियो-पॉलिटिकल माहौल में अपने रिश्तों को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश कर रही हैं.
भारत-चीन व्यापारिक समीकरण
भारत और चीन के बीच वित्त वर्ष 2024-25 में कुल द्विपक्षीय व्यापार 127.7 अरब डॉलर का रहा. इसमें भारत का निर्यात महज 14.25 अरब डॉलर रहा जबकि आयात 113.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया. इस असंतुलन ने भारत का व्यापारिक घाटा रिकॉर्ड 99.2 अरब डॉलर तक पहुंचा दिया, जिसमें आयात का बड़ा हिस्सा इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरियां और सोलर पैनल जैसे उत्पाद रहे. यह वही देश है जिसके साथ भारत का 2003-04 में सिर्फ 1.1 अरब डॉलर का घाटा हुआ करता था.
भारत चीन को मुख्यतः आयरन ओर (3.63 अरब डॉलर), इंजीनियरिंग गुड्स (2.65 अरब डॉलर), समुद्री उत्पाद (1.37 अरब डॉलर), केमिकल (1.23 अरब डॉलर) और पेट्रोलियम प्रोडक्ट (1.16 अरब डॉलर) निर्यात करता है. यानी भारत का निर्यात अभी भी कच्चे माल और कमोडिटी पर टिका हुआ है. इसके उलट भारत चीन से तैयार माल और हाई-वैल्यू प्रोडक्ट आयात करता है, जिसमें इलेक्ट्रिकल मशीनरी (31.35 अरब डॉलर), न्यूक्लियर रिएक्टर्स (22.47 अरब डॉलर), ऑर्गेनिक केमिकल्स (11.49 अरब डॉलर), प्लास्टिक (5.66 अरब डॉलर) और फर्टिलाइजर (2.25 अरब डॉलर) शामिल हैं.
ट्रेड डिफिसिट क्यों बढ़ा?
भारत चीन को अभी भी ज्यादातर कच्चा माल और कमोडिटी जैसे लौह अयस्क, समुद्री उत्पाद, रसायन और पेट्रोलियम प्रोडक्ट निर्यात करता है, जबकि चीन से भारत में इलेक्ट्रिकल मशीनरी, न्यूक्लियर रिएक्टर्स और ऑर्गेनिक केमिकल्स जैसे हाई-वैल्यू तैयार माल आता है. यही असंतुलन व्यापार घाटे को लगातार बढ़ा रहा है.
असल वजह यह है कि इलेक्ट्रॉनिक्स और कैपिटल गुड्स में भारत की बाहरी निर्भरता बहुत ज्यादा है, खासकर उन घटकों और मॉड्यूल्स पर जो चीन की बड़े स्केल-इकोनॉमी से सस्ते दाम पर बनते हैं. घरेलू मैन्युफैक्चरिंग में सुधार के बावजूद इंटरमीडिएट इंपुट्स का आयात भी बढ़ रहा है, जिससे निकट भविष्य में आयात-गहनता घटने की संभावना कम है. इस बीच सरकार ने संकेत दिए हैं कि अनियमित आयात, डम्पिंग और रीरूटिंग जैसी प्रवृत्तियों पर सख्त निगरानी रखी जाएगी और उद्योग से संवाद बढ़ाया जाएगा, ताकि घाटे पर कुछ हद तक नियंत्रण पाया जा सके.
भारत-अमेरिका के विपरीत तस्वीर
चीन के साथ घाटे के बिल्कुल उलट, अमेरिका के साथ भारत को ट्रेड सरप्लस हासिल है. वित्त वर्ष 2024-25 में भारत–अमेरिका वस्तु-व्यापार 131.8 अरब डॉलर का रहा, जिसमें भारत का अधिशेष 44 अरब डॉलर से अधिक रहा. भारत अमेरिका को स्मार्टफोन व इलेक्ट्रॉनिक्स (15.46 अरब डॉलर), फार्मास्यूटिकल्स (10.67 अरब डॉलर), हीरे व जवाहरात (10.17 अरब डॉलर), पेट्रोलियम उत्पाद (6.52 अरब डॉलर) और मशीनरी (5.99 अरब डॉलर) निर्यात करता है. वहीं अमेरिका से भारत में क्रूड ऑयल व पेट्रोलियम (12.60 अरब डॉलर), कीमती धातुएं (5.31 अरब डॉलर), मशीनरी (3.29 अरब डॉलर), एयरक्राफ्ट (3.00 अरब डॉलर) और इलेक्ट्रिकल उपकरण (2.21 अरब डॉलर) आयात होते हैं.
हालांकि, हाल के महीनों में अमेरिकी प्रशासन द्वारा भारतीय सामानों पर प्रभावी रूप से 50 फीसदी टैरिफ से भारत के टेक्सटाइल, जेम्स-एंड-ज्वैलरी, फुटवियर और केमिकल्स जैसे सेक्टर पर दबाव बढ़ा है. यही वजह है कि भारत के लिए एशिया के भीतर नए साझेदार ढूंढना रणनीतिक जरूरत बनता जा रहा है.
अमेरिकी दबाव और भारत-चीन नजदीकी
विश्लेषकों का मानना है कि मोदी-शी की मुलाकात सिर्फ एक औपचारिक शिखर वार्ता नहीं, बल्कि पश्चिमी दबावों के खिलाफ एक साझा मोर्चे की तैयारी भी हो सकती है. खासकर तब जब अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध और रूस-यूक्रेन संघर्ष ने सप्लाई चेन को पहले से ही अस्थिर कर रखा है.
मुलाकात के बाद भारत-चीन रिश्तों में कुछ ठोस पहलें सामने आई हैं. दोनों देशों के बीच डायरेक्ट फ्लाइट्स शुरू हुई हैं, कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से बहाल हुई है और बॉर्डर ट्रेड के रास्ते भी खुले हैं. हालांकि, चुनौतियां अब भी कम नहीं हैं. सीमा विवाद, चीन की बेल्ट एंड रोड पहल पर भारत का विरोध और इंडो-पैसिफिक में अमेरिका के साथ भारत की साझेदारी जटिल मुद्दे बने हुए हैं. लेकिन मौजूदा व्यापारिक समीकरण यह संकेत दे रहे हैं कि भारत अपनी रणनीति में संतुलन तलाशने की कोशिश कर रहा है.
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दोनों देशों के बीच डायरेक्ट फ्लाइट्स शुरू हुई हैं, कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से बहाल हुई है और बॉर्डर ट्रेड के रास्ते भी खुले हैं. हालांकि चुनौतियां अब भी कम नहीं हैं. सीमा विवाद, चीन की बेल्ट एंड रोड पहल पर भारत का विरोध और इंडो-पैसिफिक में अमेरिका के साथ भारत की साझेदारी जटिल मुद्दे बने हुए हैं. लेकिन मौजूदा व्यापारिक समीकरण यह संकेत दे रहे हैं कि भारत अपनी रणनीति में संतुलन खोजने की कोशिश कर रहा है.