Nike, H&M, ZARA के लिए कपड़े सिलता है ये शहर, अमेरिका-यूरोप तक हैं खरीदार, टैरिफ वार ने हिलाया बिजनेस
दक्षिण भारत का एक औद्योगिक शहर, जिसने दशकों से भारत के निर्यात को वैश्विक पहचान दिलाई, आज बड़े संकट के मुहाने पर खड़ा है. अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़ा एक फैसला यहां लाखों परिवारों की रोजी-रोटी को प्रभावित कर सकता है. अब सबकी नजर आने वाले बजट पर है, जहां से राहत की उम्मीद बंधी है.
Tirupur knitwear hub: तमिलनाडु का तिरुपुर शहर भारत की उस मेहनतकश औद्योगिक ताकत की पहचान है जिसने बीते तीन दशकों में देश को ग्लोबल टेक्सटाइल मैप पर मजबूती से खड़ा किया. बुने हुए कपड़ों की इस राजधानी से दुनिया के नामी ब्रांड्स के लिए परिधान बनते हैं और यहीं से भारत को हर साल हजारों करोड़ रुपये का विदेशी मुद्रा लाभ होता है. लेकिन अब यही तिरुपुर एक गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है, जहां अमेरिका द्वारा लगाए गए भारी टैरिफ ने पूरी इंडस्ट्री की नींव हिला दी है.
तिरुपुर की ताकत
तिरुपुर भारत के कॉटन निटवेअर एक्सपोर्ट का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा अकेले संभालता है. ये ऑर्डर अमेरिका, कनाडा, जापान, यूरोप जैसे बड़े देशों में जाते हैं. तमिलनाडु का टेक्सटाइल सेक्टर देश के कुल टेक्सटाइल निर्यात में लगभग 28 फीसदी योगदान देता है और करीब 75 लाख लोगों को रोजगार देता है. अकेले तिरुपुर निटवेअर सेक्टर में 6 लाख लोग सीधे तौर पर काम करते हैं, जिनमें 65 प्रतिशत अर्ध-शिक्षित महिलाएं हैं जो ग्रामीण इलाकों से आती हैं. इसके अलावा करीब 2 लाख लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है.
यहां से Nike, Adidas, GAP, H&M, Zara, Tommy Hilfiger, US Polo, Decathlon, Walmart, Target जैसे ग्लोबल ब्रांड्स के लिए सप्लाई होती है, जो तिरुपुर की विश्वसनीयता और गुणवत्ता का प्रमाण है.
ट्रंप टैरिफ और गिरते ऑर्डर
समस्या तब गहराई जब अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक का टैरिफ लागू किया. इसका सीधा असर तिरुपुर के एक्सपोर्टर्स पर पड़ा. निर्यातकों के लगभग 15,000 करोड़ रुपये के कन्फर्म ऑर्डर रद्द हो चुके हैं और कई यूनिट्स में उत्पादन 30 फीसदी तक घट गया है.
तिरुपुर, कोयंबटूर, इरोड और करूर के एक्सपोर्टर्स को रोज़ाना करीब 60 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है. हालात ऐसे हैं कि छोटे और मझोले उद्योग बंदी के कगार पर पहुंच गए हैं, जबकि वेल्लोर, रानीपेट और तिरुपत्तूर जैसे फुटवेअर क्लस्टर्स पर भी दबाव बढ़ रहा है.
मुख्यमंत्री M K Stalin ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री Narendra Modi को पत्र लिखकर बीते महीने चेताया है कि ऑर्डर तेजी से वियतनाम, बांग्लादेश और कंबोडिया जैसे देशों की ओर जा रहे हैं, जहां टैरिफ कम है. एक बार सप्लाई चेन शिफ्ट हो गई तो बाजार वापस लाना बेहद मुश्किल हो जाता है.
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बजट से उम्मीदें और इंडस्ट्री की मांग
अब इंडस्ट्री की नजर 1 फरवरी के बजट पर टिकी है. एक्सपोर्टर्स की मांग है कि सरकार अमेरिका के साथ द्विपक्षीय समझौते पर तेजी से कदम बढ़ाए, निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं को मजबूत करे, ब्याज दरों में राहत दे और MSME सेक्टर के लिए सस्ता क्रेडिट उपलब्ध कराए.
मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर बजट में टेक्सटाइल सेक्टर के लिए ठोस घोषणाएं नहीं हुईं, तो यह संकट सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक रूप ले सकता है, खासकर उन लाखों महिलाओं और युवाओं के लिए जिनकी रोजी-रोटी इस इंडस्ट्री पर निर्भर है.
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