कौन ला सकता है IPO, कितना चाहिए पैसा, क्या फंड जुटाने की होती है लिमिट, जानें पूरा प्रोसेस और नियम

अगर आप अपनी कंपनी को तेजी से आगे बढ़ाना चाहते हैं, तो IPO एक बड़ा मौका बन सकता है. जानिए IPO का पूरा स्टेप बाय स्टेप प्रोसेस, SEBI के जरूरी नियम, और Mainboard व SME IPO के बीच का अंतर. साथ ही समझें कि कंपनी को पब्लिक होने से पहले किन शर्तों को पूरा करना होता है. यह आपको IPO से जुड़ी हर जरूरी जानकारी देगा, ताकि आप सही रणनीति के साथ अपने बिजनेस को अगले स्तर तक ले जा सकें.

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IPO Process India: अगर आपकी कंपनी तेजी से बढ़ रही है और आप इसे नेक्स्ट लेवल पर ले जाना चाहते हैं, तो IPO यानी Initial Public Offering एक बेहतर रणनीतिक कदम हो सकता है. यह रास्ता न सिर्फ पैसा जुटाने का मौका देता है, बल्कि कंपनी की ब्रांड वैल्यू, भरोसा और मार्केट में पहचान भी मजबूत करता है. हालांकि IPO लाने से पहले इसकी जरूरी जानकारी होना बहुत जरूरी है. पिछले कुछ वर्षों में भारतीय IPO मार्केट तेजी से बढ़ा है. 2024 में कुल 336 कंपनियां IPO लाई थीं और कुल 1.90 लाख करोड़ रुपये जुटाए थे. वहीं 2025 में 365 कंपनियां IPO लाई और कुल 1.95 लाख करोड़ रुपये जुटाए. ये आंकड़े बता रहे हैं कि इसमें साल-दर-साल बढ़ोतरी हो रही है. तो चलिए आपको बताते हैं कि अगर आप भी अपना IPO लाना चाहते हैं, तो इसके लिए क्या प्रोसेस है और कितने तरह के IPO लाए जा सकते हैं.

दो प्रकार के होते हैं IPO

भारत में IPO मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं जिसमें मेनबोर्ड IPO और SME IPO शामिल हैं. मेनबोर्ड IPO बड़ी और स्थापित कंपनियों के लिए होता है, जो NSE और BSE जैसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होती हैं और कड़े नियमों का पालन करती हैं. वहीं SME IPO छोटे और मध्यम कारोबारों के लिए बनाया गया है, जहां पूंजी की जरूरत कम होती है और नियम अपेक्षाकृत आसान होते हैं. SME कंपनियां NSE के SME और BSE के SME प्लेटफॉर्म पर लिस्ट होती हैं.

IPO के लिए SEBI के जरूरी नियम

SEBI ने IPO लाने के लिए कुछ सख्त नियम बनाए हैं, ताकि सिर्फ मजबूत और भरोसेमंद कंपनियां ही पैसा जुटा सकें.

  • Paid-up capital: कंपनी के पास कम से कम 1 करोड़ रुपये की पूंजी होना जरूरी है. मतलब कंपनी में मालिकों या निवेशकों ने कम से कम 1 करोड़ रुपये असली पैसा लगाया हो.
  • Net Tangible Assets: पिछले 3 साल में हर साल कम से कम 3 करोड़ रुपये के एसेट होने चाहिए और इनमें से 50% से ज्यादा कैश नहीं होना चाहिए.
  • Profit: पिछले 5 साल में से कम से कम 3 साल कंपनी प्रॉफिट में होनी चाहिए.
  • Net Worth: कंपनी का नेट वर्थ लगातार पॉजिटिव होना चाहिए.
  • Name Change Rule: अगर कंपनी ने नाम बदला है, तो 50 फीसदी कमाई उसी नए बिजनेस से होनी चाहिए.
  • Issue Size: IPO का साइज कंपनी के नेट वर्थ से 5 गुना से ज्यादा नहीं होना चाहिए.
  • Promoter Holding: प्रमोटर्स को IPO के बाद भी कुछ समय तक शेयर रखना जरूरी होता है. मेनबोर्ड सेगमेंट में लॉक-इन पीरियड 3 साल और SME सेगमेंट में 1 साल होता है.

मेनबोर्ड IPO

मेनबोर्ड IPO में नियम थोड़े सख्त होते हैं. अगर कोई कंपनी मेनबोर्ड सेगमेंट में लिस्ट होना चाहती है, तो उसका Paid-up capital IPO से पहले और बाद में कम से कम 10 करोड़ रुपये होना चाहिए. IPO का साइज कम से कम 10 करोड़ रुपये होना चाहिए और कंपनी की मार्केट कैप कम से कम 25 करोड़ रुपये होनी चाहिए.

SME IPO

SME IPO छोटे बिजनेस के लिए आसान रास्ता है. IPO के बाद कंपनी का Paid-up capital 25 करोड़ रुपये से ज्यादा नहीं होना चाहिए. कंपनी का नेट वर्थ पॉजिटिव होना चाहिए. कुछ मामलों में कैश प्रॉफिट जरूरी नहीं होता है. SME IPO में इश्यू को सफल बनाने के लिए Underwriter जरूरी होता है, जो कम से कम 15% हिस्से की जिम्मेदारी लेता है, ताकि IPO पूरा हो सके. इसके साथ ही कंपनी को लिस्टिंग के बाद कम से कम 3 साल तक market maker रखना होता है, जो बाजार में शेयरों की लगातार खरीद-बिक्री सुनिश्चित करता है, जिससे निवेशकों को आसानी से शेयर खरीदने और बेचने का मौका मिलता रहे.

स्टेप बाय स्टेप प्रोसेस

जब कोई कंपनी पब्लिक होना चाहती है, तो उसे SEBI और स्टॉक एक्सचेंज के नियमों का पालन करना पड़ता है. यह पूरी प्रक्रिया कई चरणों में होती है और बिना एक्सपर्ट की मदद के IPO लाना मुश्किल होता है.

  • IPO की तैयारी की जांच: कंपनी पहले अपनी पूरी तैयारी जांचती है. फाइनेंशियल, मैनेजमेंट और ग्रोथ प्लान सही होना चाहिए. कंपनी को प्राइवेट से पब्लिक बनना पड़ता है.
  • मर्चेंट बैंकर और एडवाइजर नियुक्त करना: कंपनी एक्सपर्ट्स को हायर करती है. इसमें Merchant Banker, CA (Auditor) और Legal Advisor शामिल होते हैं. ये लोग IPO की पूरी प्रक्रिया संभालते हैं और सही समय पर IPO लाने में मदद करते हैं.
  • DRHP तैयार करना: DRHP एक बड़ा डॉक्यूमेंट होता है, जिसमें कंपनी की पूरी जानकारी होती है, जैसे कंपनी का बिजनेस, फाइनेंशियल और रिस्क. यह डॉक्यूमेंट SEBI को भेजा जाता है.
  • SEBI Approval: SEBI DRHP की जांच करता है. मंजूरी मिलने के बाद फाइनल प्रॉस्पेक्टस फाइल होता है, जिसमें IPO की कीमत भी तय होती है.
  • Investor Outreach: कंपनी निवेशकों को प्रेजेंटेशन देती है और IPO में पैसा लगाने के लिए उन्हें समझाती है. इससे IPO में इंटरेस्ट बढ़ता है.
  • IPO Launch: फिर कंपनी अपना IPO लॉन्च करती है और इसमें सब्सक्रिप्शन की तारीख तय होती है. इस दौरान निवेशक शेयर में निवेश करते हैं. इसके बाद अलॉटमेंट की प्रक्रिया होती है और शेयर लिस्ट हो जाता है.

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