सालों की मेहनत पर टैक्स की मार… NPS, EPF और सुपरएन्युएशन में छुपा TAX बोझ, क्या बजट 2026 देगा राहत
EPF, NPS और सुपरएन्युएशन जैसी योजनाओं में जमा पैसा सुरक्षित और टैक्स-फ्री रहेगा. लेकिन हकीकत इससे अलग है. असल में सरकार ने इन योजनाओं पर कई सीमाएं तय कर रखी हैं. अगर योगदान इन सीमाओं से ज्यादा हो जाए तो टैक्स लग सकता है. कई मामलों में एक ही पैसे पर बार-बार टैक्स लगता है.
Retirement savings TAX: रिटायरमेंट के लिए बचत करना हर नौकरीपेशा व्यक्ति की सबसे बड़ी वित्तीय प्राथमिकता होती है. लोग मानते हैं कि EPF, NPS और सुपरएन्युएशन जैसी योजनाओं में जमा पैसा सुरक्षित और टैक्स-फ्री रहेगा. लेकिन हकीकत इससे अलग है. इन स्कीम्स को अक्सर Exempt-Exempt-Exempt यानी EEE माना जाता है, जिसका मतलब है कि Contributions, interest, और withdrawals तीनों स्टेप में टैक्स नहीं लगता.
लेकिन असल में सरकार ने इन योजनाओं पर कई सीमाएं तय कर रखी हैं. अगर योगदान इन सीमाओं से ज्यादा हो जाए तो टैक्स लग सकता है. कई मामलों में एक ही पैसे पर बार-बार टैक्स लगता है, जबकि निवेशक उसे छू भी नहीं सकता. बढ़ती महंगाई और वेतन के बावजूद ये टैक्स छूट सीमाएं सालों से नहीं बढ़ाई गई हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बजट 2026 में सरकार इन नियमों को बदलेगी और आम नौकरीपेशा लोगों को राहत देगी.
पूरी तरह टैक्स-फ्री नहीं है आपका फंड
EEE का मतलब है कि Contributions, interest, और withdrawals तीनों टैक्स-फ्री होंगे. लेकिन यह सुविधा केवल एक तय सीमा तक ही मिलती है. EPF, NPS और सुपरएन्युएशन में कर्मचारी और employer के योगदान पर अलग-अलग नियम हैं. अगर यह सीमा पार हो जाए तो अतिरिक्त रकम पर टैक्स लगता है. इसका मतलब है कि ये योजनाएं पूरी तरह टैक्स-फ्री नहीं हैं.
कर्मचारी और employer योगदान पर अलग नियम
EPF में employer के योगदान पर सालाना 7.5 लाख रुपये तक टैक्स छूट है. इससे ज्यादा योगदान पर मिलने वाला ब्याज टैक्सेबल हो जाता है. कर्मचारी के अपने योगदान पर सेक्शन 80C के तहत 1.5 लाख रुपये तक छूट मिलती है. इससे ज्यादा पर ब्याज टैक्सेबल हो सकता है.
NPS में employer का योगदान 7.5 लाख रुपये तक टैक्स-फ्री है, लेकिन निकासी के समय केवल 60 फीसदी रकम टैक्स-फ्री मिलती है. बाकी रकम से एन्युटी खरीदनी पड़ती है और उस पर हर साल टैक्स लगता है. सुपरएन्युएशन में employer का 1.5 लाख रुपये तक का योगदान टैक्स-फ्री है. इससे ज्यादा पर रिटर्न टैक्सेबल होता है.
Employer योगदान– टैक्स नियम
| योजना | योगदान पर टैक्स | ब्याज/रिटर्न पर टैक्स | निकासी पर टैक्स |
|---|---|---|---|
| EPF | 12% बेसिक तक छूट, लेकिन कुल सीमा ₹7.5 लाख | ₹7.5 लाख से ऊपर के योगदान पर ब्याज टैक्सेबल | 5 साल बाद टैक्स-फ्री, पहले निकालें तो टैक्स |
| NPS | बेसिक+DA का 14% तक छूट (₹7.5 लाख सीमा) | ₹7.5 लाख से ऊपर के रिटर्न पर टैक्स | 60% टैक्स-फ्री, बाकी से एन्युटी खरीदनी पड़ती है (पेंशन टैक्सेबल) |
| सुपरएन्युएशन | ₹1.5 लाख तक टैक्स-फ्री (₹7.5 लाख सीमा में) | अतिरिक्त पर रिटर्न टैक्सेबल | 1/3 टैक्स-फ्री, बाकी से एन्युटी (पेंशन टैक्सेबल) |
कर्मचारी योगदान- टैक्स नियम
| योजना | योगदान पर टैक्स | ब्याज/रिटर्न पर टैक्स | निकासी पर टैक्स |
|---|---|---|---|
| EPF | ₹1.5 लाख तक 80C छूट (VPF भी शामिल) | ₹2.5 लाख से ऊपर के योगदान पर ब्याज टैक्स (सरकारी में ₹5 लाख सीमा) | 5 साल बाद टैक्स-फ्री |
| NPS | कुल ₹2 लाख तक छूट (₹1.5 लाख + ₹50,000) | जमा रहते समय रिटर्न टैक्स-फ्री | 60% टैक्स-फ्री, बाकी से एन्युटी (पेंशन टैक्सेबल) |
| सुपरएन्युएशन | ₹1.5 लाख तक 80C छूट | मान्यता प्राप्त फंड में रिटर्न टैक्स-फ्री | 1/3 टैक्स-फ्री, बाकी पर पेंशन टैक्स |
एक ही पैसे पर तीन बार टैक्स
अगर तय सीमा से ज्यादा योगदान किया गया तो तीन तरह से टैक्स लग सकता है. पहला, ज्यादा योगदान पर तुरंत टैक्स.
दूसरा, उस पर मिलने वाले ब्याज पर हर साल टैक्स. तीसरा, रिटायरमेंट के बाद पेंशन पर भी टैक्स. ET कि रिपोर्ट के हवाले से Tax2win के CEO अभिषेक सोनी के मुताबिक यह व्यवस्था NPS को असल में EEE नहीं बल्कि EET बना देती है, क्योंकि अंत में पेंशन टैक्सेबल होती है.
पुरानी टैक्स सीमाएं अब Irrelevant
7.5 लाख रुपये की employer सीमा और 2.5 लाख रुपये की EPF कर्मचारी सीमा कई साल पहले तय की गई थी. महंगाई और बढ़ती सैलरी के कारण ये सीमाएं अब बहुत कम लगती हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि आज के समय में इन्हें कम से कम 10 लाख और 3.5 लाख रुपये होना चाहिए था.
क्या बजट 2026 में मिलेगा समाधान
वित्तीय सलाहकारों का मानना है कि सरकार को इन सीमाओं को बढ़ाना चाहिए. साथ ही NPS निकासी नियमों को और उदार बनाना चाहिए. तब तक नौकरीपेशा लोगों को अपने रिटायरमेंट निवेश को अलग-अलग योजनाओं में बांटना होगा ताकि टैक्स का बोझ कम हो सके. रिटायरमेंट सेविंग्स पर मौजूदा टैक्स नियम आम मध्यमवर्ग पर भारी पड़ रहे हैं. अगर बजट 2026 में सुधार नहीं हुआ तो लोगों को लंबी अवधि की बचत में दिक्कत होती रहेगी.
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