वेस्ट एशिया तनाव से निवेशक डरे, पांच दिनों में ₹19 लाख करोड़ का हुआ नुकसान, सेंसेक्स-निफ्टी बेहाल!

वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखने लगा है. पिछले पांच कारोबारी दिनों में बाजार में तेज गिरावट के कारण निवेशकों की संपत्ति करीब ₹19 लाख करोड़ घट गई. कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और वैश्विक अनिश्चितता ने सेंसेक्स और निफ्टी दोनों पर दबाव बढ़ा दिया है.

निवेशकों के ₹19 लाख करोड़ डूबे Image Credit: AI Generated

वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब भारतीय शेयर बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है. पिछले पांच कारोबारी सत्रों में बाजार में भारी गिरावट के चलते निवेशकों की संपत्ति करीब ₹19 लाख करोड़ घट गई है. बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितता, कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और वैश्विक बाजारों में बढ़ती चिंता ने भारतीय इक्विटी बाजार की धारणा को कमजोर कर दिया है, जिससे प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में तेज गिरावट दर्ज की गई.

पांच दिनों में ₹19 लाख करोड़ की गिरावट

बीते एक सप्ताह में भारतीय शेयर बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला. इस दौरान बीएसई में लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैप लगभग ₹468.28 लाख करोड़ से घटकर ₹449.35 लाख करोड़ रह गया. यानी निवेशकों की संपत्ति में लगभग ₹19 लाख करोड़ की कमी आ गई.

इसी अवधि में BSE Sensex करीब 3,329 अंक टूट गया, जबकि Nifty 50 में लगभग 1,046 अंकों की गिरावट दर्ज की गई. दोनों प्रमुख सूचकांकों में करीब 4 प्रतिशत तक की कमजोरी आई है.

वेस्ट एशिया तनाव से बढ़ी बाजार की चिंता

शुक्रवार से घरेलू शेयर बाजार पर दबाव बढ़ना शुरू हुआ था और शनिवार को हालात और बिगड़ गए, जब अमेरिका और इजराइल की संयुक्त कार्रवाई में ईरान के महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाया गया. इसके बाद क्षेत्र में तनाव तेजी से बढ़ गया.

इस घटनाक्रम के बाद निवेशकों की चिंता इसलिए भी बढ़ गई क्योंकि खाड़ी क्षेत्र में किसी भी तरह का संकट आमतौर पर कच्चे तेल की कीमतों को ऊपर धकेल देता है. वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ने से बाजार में घबराहट का माहौल बन गया.

स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से आपूर्ति पर खतरा

तनाव के चलते Strait of Hormuz से गुजरने वाली शिपिंग गतिविधियों पर भी असर पड़ा है. यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और भारत के करीब 40 प्रतिशत कच्चे तेल के आयात इसी रास्ते से होकर गुजरते हैं. यदि यहां आपूर्ति बाधित होती है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर बड़ा असर पड़ सकता है.

तनाव बढ़ने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली है. ब्रेंट क्रूड की कीमत 85 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गई है, जबकि अमेरिकी कच्चा तेल करीब 8.5 प्रतिशत उछलकर 81 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. यह 2020 के बाद एक दिन में सबसे बड़ी तेजी मानी जा रही है.

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भारत जैसे देश के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है. तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई, रुपये की स्थिरता और कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बढ़ सकता है.

आगे क्या संभावना है?

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में शेयर बाजार की दिशा काफी हद तक वेस्ट एशिया के घटनाक्रम पर निर्भर करेगी. मार्केट एक्सपर्ट के मुताबिक, अनुसार निवेशक फिलहाल वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, कच्चे तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक जोखिमों पर नजर बनाए रखेंगे.