सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम NavIC नहीं कर रहा काम, जानें- भारत के लिए रणनीतिक रूप से ये कितना महत्वपूर्ण

नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम के ठीक से काम करने के लिए कम से कम चार ऐसे सैटेलाइटों की जरूरत होती है जिनमें एटॉमिक घड़ियां काम कर रही हों. 1999 के कारगिल युद्ध के बाद भारत ने NavIC बनाना शुरू किया, जिस दौरान अमेरिका ने GPS डेटा शेयर करने से मना कर दिया था.

सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम Image Credit: AI

भारत का सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम, नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन (NavIC), पूरी तरह से काम नहीं कर रहा है. ऐसे में सबसे बड़ी चिंताओं में से एक यह है कि देश इसका इस्तेमाल सुरक्षा और रणनीतिक उद्देश्यों के लिए नहीं कर पाएगा. ऐसा एक्सपर्ट्स का कहना है. न्यूज एजेंसी पीटीआई के अनुसार, यह बड़ी रुकावट तब आई जब 10 मार्च को इंडियन रीजनल नेविगेशनल सैटेलाइट सिस्टम-1F (IRNSS-1F) में लगी आखिरी एटॉमिक घड़ी ने काम करना बंद कर दिया. इसके बाद इस समूह के केवल तीन सैटेलाइट ही ऐसे बचे जो पोजीशन, नेविगेशन और टाइमिंग (PNT) सेवाएं देने में सक्षम हैं.

कैसे काम करता है नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम?

नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम के ठीक से काम करने के लिए कम से कम चार ऐसे सैटेलाइटों की जरूरत होती है जिनमें एटॉमिक घड़ियां काम कर रही हों. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की पूर्व वैज्ञानिक अनन्या रे ने PTI को दिए एक इंटरव्यू में बताया, ‘NavIC जैसे सिस्टम में दो तरह के सिग्नल होते हैं. आम लोगों के लिए एक ओपन सिग्नल और सेना के लिए एक खास (restricted) सिग्नल, जो सटीकता को लगभग 10 गुना बढ़ा देता है.’ अलग-अलग देशों की सेनाएं लॉजिस्टिक्स, मैपिंग और ऑपरेशनल प्लानिंग के लिए इस सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल करती हैं. ऐसे में किसी विदेशी नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम पर निर्भर रहना सुरक्षा के लिहाज से दिक्कतें खड़ी कर सकता है, खासकर युद्ध के समय.

युद्ध के दौरान खतरा

रे ने कहा, ‘अगर आप किसी युद्ध में हैं और किसी और के सिस्टम का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो वे सिग्नलों में गड़बड़ी कर सकते हैं या आपको धोखा दे सकते हैं, जिससे आपको लगेगा कि आप गलत जगह पर हैं. किसी दूसरे देश के सैटेलाइट पर निर्भर रहना एक ऐसी निर्भरता है जो आपके कंट्रोल से बाहर है और युद्ध के दौरान जानलेवा साबित हो सकती है.’

भारत ने कब की थी शुरुआत

1999 के कारगिल युद्ध के बाद भारत ने NavIC बनाना शुरू किया, जिस दौरान अमेरिका ने GPS डेटा शेयर करने से मना कर दिया था. NavIC के लिए पहली पीढ़ी के सैटेलाइट, जिन्हें इंडियन रीजनल नेविगेशनल सैटेलाइट सिस्टम (IRNSS) सीरीज़ के नाम से जाना जाता है, 2013 और 2018 के बीच लॉन्च किए गए थे. हालांकि, सैटेलाइट के इस समूह को जल्द ही दिक्कतों का सामना करना पड़ा, क्योंकि IRNSS सीरीज के कई सैटेलाइट में लगे एटॉमिक क्लॉक बार-बार काम करना बंद कर रहे थे.

एटॉमिक क्लॉक

एटॉमिक क्लॉक ऐसे नेविगेशन सैटेलाइट की जान होते हैं, क्योंकि वे PNT टेक्नोलॉजी के लिए जरूरी बहुत सटीक टाइमिंग देते हैं. केंद्र सरकार के पूर्व सचिव EAS सरमा ने PTI को बताया, ‘आमतौर पर इनमें से हर सैटेलाइट में बैकअप के लिए तीन या चार एटॉमिक क्लॉक होते हैं. इसलिए, अगर एक खराब हो जाता है, तो दूसरे पर स्विच किया जा सकता है. IRNSS-1F के मामले में, उसके सभी एटॉमिक क्लॉक ने काम करना बंद कर दिया है.’

हालात और खराब तब हुए, जब 31 अगस्त, 2017 को ISRO ने IRNSS-1A की जगह IRNSS-1H को लॉन्च करने की कोशिश की, लेकिन यह मिशन सैटेलाइट को उसकी तय कक्षा में स्थापित करने में नाकाम रहा. इसके बाद, ISRO ने NavIC के लिए दूसरी पीढ़ी के सैटेलाइट लॉन्च करना शुरू किया, जिन्हें NVS सीरीज के नाम से जाना जाता है. जहां 2023 में NVS-01 को उसकी तय कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया गया, वहीं 2025 में NVS-02 का लॉन्च असफल रहा. इससे NVS-03, NVS-04 और NVS-05 के लॉन्च में देरी हुई है, और अब NavIC सिस्टम में सिर्फ IRNSS 1-B, IRNSS 1-L और NVS-01 ही बचे हैं, जो फिलहाल नेविगेशन सेवाएं देने में सक्षम हैं.

बंट गया है सरकार का ध्यान

शर्मा ने सुझाव दिया कि ISRO और सरकार का ध्यान गगनयान और Axiom Mission 4 जैसे मिशनों की ओर बंट गया है, जिसमें शुभ्रांशु शुक्ला इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन गए थे, ऐसा करने वाले वे पहले भारतीय थे. शर्मा ने कहा, ‘भारत GPS जैसी विदेशी नेविगेशन प्रणालियों पर निर्भर रहने का जोखिम नहीं उठा सकता. हमारी प्राथमिकता रणनीतिक उपयोग होनी चाहिए, उसके बाद अन्य उद्देश्य होना चाहिए.

यह भी पढ़ें: कैबिनेट ने 28840 करोड़ रुपये के बजट के साथ UDAN 2.0 स्कीम को दी मंजूरी, 100 नए एयरपोर्ट बनाने की योजना