मोदी सरकार में किसान की जेब कितनी भरी? बजट से सिंचाई, MSP और लागत घटाने की मांग
मोदी सरकार के दौर में किसानों की आमदनी को लेकर इकोनॉमिक सर्वे ने अहम संकेत दिए हैं. आंकड़े बताते हैं कि खेती के साथ-साथ जुड़े सेक्टरों से कमाई बढ़ी है. अब नजर 1 फरवरी के बजट पर है, जहां एक्सपर्ट मानते हैं कि कुछ नीतिगत फैसले किसानों की आय की दिशा तय करेंगे.
भारत में किसान की कमाई हमेशा से राजनीति और नीति दोनों का बड़ा मुद्दा रही है. करीब एक दशक पहले सरकार ने किसानों की आमदनी दोगुनी करने का लक्ष्य रखा था. अब Economic Survey 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि इस दिशा में ठोस बढ़त हुई है. हालांकि, स्वतंत्र रिपोर्टों में किसानों की आय दोगुनी होने के सरकारी दावे पर सवाल उठाए गए हैं. इन रिपोर्टों के मुताबिक तय लक्ष्य करीब 25 फीसदी तक चूक गया और राज्यों के बीच आय में बड़ा अंतर रहा. सवाल यह है कि जमीन पर किसान की जेब कितनी भरी और 1 फरवरी को आने वाला बजट उसके लिए क्या राहत ला सकता है.
मोदी सरकार में किसानों की आमदनी का हाल
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2015-16 से 2022-23 के बीच किसानों की औसत आय में 100 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के सर्वे के अनुसार ग्रामीण इलाकों में एक कृषि परिवार की औसत मासिक आय करीब 10,218 रुपये रही. इस आय में खेती के साथ-साथ पशुपालन, मत्स्य पालन और बागवानी जैसे क्षेत्रों का योगदान लगातार बढ़ा है.
हालांकि Siraj Hussain, सीमा बाठला, अंजनी कुमार और नवनीत कुमार के एक पॉलिसी पेपर में कहा गया है कि भारत में किसानों की आय के नियमित और सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. किसानों की आमदनी का विस्तृत आकलन मुख्य रूप से NSS की सिचुएशन असेसमेंट सर्वे पर ही निर्भर करता है.
पेपर के अनुसार कृषि परिवारों की औसत मासिक आय 2002-03 में 5,592 रुपये थी, जो 2012-13 में बढ़कर 8,011 रुपये और 2018-19 में 9,284 रुपये तक पहुंची. हालांकि आय वृद्धि की रफ्तार समय के साथ धीमी पड़ी. 2002 से 2012 के बीच वास्तविक आय सालाना 3.7 फीसदी बढ़ी, जबकि 2012 से 2018 के दौरान यह घटकर 2.5 फीसदी रह गई. औसतन 18 वर्षों में वृद्धि दर 3.2 फीसदी रही, जो सरकार के 10 फीसदी सालाना वृद्धि के दावे से काफी कम है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि फसल से होने वाली आय का हिस्सा घटा है और कुल आय में पशुपालन की हिस्सेदारी बढ़ी है.
इकोनॉमिक सर्वे क्या कहता है
29 जनवरी को जारी इकोनॉमिक सर्वे बताता है कि पिछले पांच साल में कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों की औसत सालाना वृद्धि दर करीब 4.4 फीसदी रही. इस दौरान असली रफ्तार allied sectors ने दिखाई. पशुधन क्षेत्र में GVA लगभग 195 फीसदी बढ़ा, जबकि मत्स्य पालन में उत्पादन 140 फीसदी से ज्यादा बढ़ा. सर्वे का साफ संकेत है कि किसान की कमाई अब सिर्फ फसल पर निर्भर नहीं रही.
खाद्यान्न उत्पादन 2024-25 में बढ़कर करीब 3,577 लाख टन तक पहुंच गया. इससे भी अहम बात यह है कि बागवानी उत्पादन 362 मिलियन टन के पार निकल गया, जो अनाज से ज्यादा है. फल-सब्जी और दूध जैसे उत्पाद किसानों के लिए नई और स्थिर आमदनी का जरिया बन रहे हैं.
सरकारी स्कीम से मुनाफा कितना?
सरकार का कहना है कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, फसल बीमा योजना, न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी, कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर फंड और एफपीओ जैसे कदमों ने किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद की है. इसके साथ ही कृषि बजट भी 2013-14 के करीब 22 हजार करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 1.27 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया है.
Organisation for Economic Co-operation and Development और ICRIER की एक स्टडी के मुताबिक भारत में जटिल नियम, बाजार हस्तक्षेप और व्यापार प्रतिबंध किसानों को नुकसान पहुंचाते हैं. इन वजहों से किसानों को अपनी फसलों के दाम वैश्विक स्तर की तुलना में कम मिलते हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि भले ही सरकार भारी सब्सिडी देती हो, जो कुछ हद तक नुकसान की भरपाई करती है, लेकिन कुल मिलाकर नीतिगत हस्तक्षेप किसानों की कुल आय को हर साल औसतन छह फीसदी से ज्यादा घटा देता है. अध्ययन का यह भी कहना है कि किसानों की आय दोगुनी होने का दावा नॉमिनल आधार पर किया गया है, जबकि महंगाई को इसमें शामिल नहीं किया गया. अगर महंगाई का असर जोड़ा जाए तो किसानों की वास्तविक आय इससे कहीं कम नजर आती है.
बजट से एक्सपर्ट की उम्मीदें
Crisil Intelligence के डायरेक्टर Pushan Sharma का कहना है कि जलवायु बदलाव खेती के लिए सबसे बड़ा जोखिम बनता जा रहा है, इसलिए सिंचाई और जलवायु-लचीली तकनीकों पर खर्च बढ़ना चाहिए. साथ ही उनका मानना है कि उर्वरकों के असंतुलित इस्तेमाल से लागत और जमीन दोनों को नुकसान हो रहा है, इसलिए जैविक और संतुलित पोषण वाली योजनाओं को ज्यादा फंड मिलना चाहिए. बाजार के मोर्चे पर वे MSP और PM-AASHA जैसी योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन पर जोर देते हैं, ताकि किसानों को सही दाम मिल सके और उनकी आय स्थिर रह सके.
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