ट्रंप टैरिफ को फुस्स करेंगे ये 3 बड़े फैसले, बजट में निकला तोड़! SEZ से लेकर टेक्सटाइल को बनाया अभेद्य

यूनियन बजट 2026–27 में सरकार ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त टैरिफ नीति से जूझ रहे भारतीय एक्सपोर्ट सेक्टर्स को राहत देने की कोशिश की है. SEZ को रियायत, टेक्सटाइल क्लस्टर्स का आधुनिकीकरण, लेबर-इंटेंसिव इंडस्ट्री के लिए ड्यूटी स्ट्रक्चर में ढील और कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग जैसी घोषणाएं बताती हैं कि यह बजट ग्लोबल ट्रेड दबाव से निपटने की एक रणनीतिक कोशिश है.

बजट और ट्रंप टैरिफ Image Credit: @Money9live

Trump Tariff and Budget 2026: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में यूनियन बजट 2026-27 पेश कर दिया है. बजट सामने आते ही यह साफ हो गया कि यह दस्तावेज सिर्फ देश की आय-व्यय की तस्वीर नहीं है, बल्कि बदलते वैश्विक हालात और खासतौर पर अमेरिका की सख्त व्यापार नीति के बीच भारत की आर्थिक रणनीति को भी दर्शाता है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भारत पर लगाए गए ऊंचे टैरिफ, भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर बनी अनिश्चितता और लगातार जारी 50 फीसदी तक की शुल्क दरों ने भारत के कई लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स को गंभीर दबाव में डाल दिया था.

ऐसे में बजट 2026 से उम्मीद की जा रही थी कि सरकार कोई ठोस रास्ता निकालेगी, जिससे इन झटकों का असर कम किया जा सके. बजट के ऐलानों को देखें तो यह उम्मीद कुछ हद तक पूरी होती नजर आती है.

ट्रंप टैरिफ से जन्मा SEZ समस्या

पिछले कुछ महीनों में अमेरिकी टैरिफ के कारण भारत के एक्सपोर्ट-आधारित इंडस्ट्री, खासकर टेक्सटाइल, अपैरल, लेदर, फुटवियर और सीफूड सेक्टर में संकट गहराता गया. अमेरिका पर निर्भर कई Special Economic Zones (SEZ) की यूनिट्स को ऑर्डर मिलना बंद हो गया, प्रोडक्शन ठप होने लगा और नौकरियों पर सीधा खतरा मंडराने लगा. हालात इतने गंभीर हो गए कि बीते पांच वर्षों में देश के सात SEZ में 466 यूनिट्स बंद हो चुकी हैं. सितंबर और अक्टूबर में लगातार दो महीनों तक भारत के वस्तु निर्यात में गिरावट दर्ज की गई, जिसने सरकार की चिंता और बढ़ा दी.

बजट में मिली राहत

इसी पृष्ठभूमि में बजट 2026 का सबसे अहम और रणनीतिक कदम Special Economic Zones को राहत देने के रूप में सामने आया. वित्त मंत्री ने एक विशेष, एकमुश्त प्रावधान की घोषणा की, जिसके तहत SEZ की पात्र मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स को घरेलू बाजार यानी Domestic Tariff Area में रियायती कस्टम ड्यूटी पर अपना माल बेचने की अनुमति दी जाएगी. इसका उद्देश्य उन यूनिट्स को सांस लेने का मौका देना है, जिनकी प्रोडक्शन कैपेसिटी ग्लोबल ट्रेड में आई रुकावटों की वजह से बेकार पड़ी थी.

सरकार ने यह भी साफ किया कि इस व्यवस्था को लागू करने के लिए जरूरी रेगुलेटरी बदलाव किए जाएंगे, ताकि घरेलू बाजार में काम कर रही यूनिट्स के साथ कंपटीशन का संतुलन बना रहे. भारत में फिलहाल 370 SEZ हैं, जहां 31 लाख से ज्यादा लोग रोजगार पा रहे हैं. ऐसे में यह फैसला लाखों नौकरियों को बचाने की दिशा में अहम माना जा रहा है.

ट्रंप टैरिफ ने टेक्सटाइल सेक्टर की भी तोड़ी कमर

बजट 2026 में टेक्सटाइल सेक्टर पर दिया गया खास फोकस भी ट्रंप टैरिफ के असर को कम करने की रणनीति का ही हिस्सा है. टेक्सटाइल और अपैरल इंडस्ट्री भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है, लेकिन यही सेक्टर अमेरिकी टैरिफ से सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ. कई एक्सपोर्टर्स को गर्मियों के ऑर्डर तक गंवाने पड़े. इसे देखते हुए सरकार ने टेक्सटाइल सेक्टर के लिए एक इंटीग्रेटेड प्रोग्राम का ऐलान किया है, जिसका मकसद पूरी सप्लाई चेन को आधुनिक बनाना है.

इसके तहत नेशनल फाइबर स्कीम के जरिए सिल्क, ऊन, जूट, मैन-मेड और नई पीढ़ी के फाइबर में आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा. साथ ही पारंपरिक टेक्सटाइल क्लस्टर्स को एडवांस्ड मशीनरी के लिए कैपिटल सपोर्ट, टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन और कॉमन टेस्टिंग व सर्टिफिकेशन सेंटर्स की सुविधा दी जाएगी. सरकार का मानना है कि इससे भारतीय टेक्सटाइल प्रोडक्शन ग्लोबल मार्केट में दोबारा मजबूती से मुकाबला कर पाएंगे.

कितना बड़ा है ये सेक्टर?

टेक्सटाइल सेक्टर का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि यह देश के औद्योगिक उत्पादन में 13 फीसदी, निर्यात में 12 फीसदी और GDP में करीब 2 फीसदी का योगदान देता है. इसके अलावा इस इंडस्ट्री की लगभग 80 फीसदी वैल्यू चेन MSME क्लस्टर्स में केंद्रित है, जहां रोजगार की संभावनाएं सबसे ज्यादा होती हैं. अमेरिकी टैरिफ के कारण अगर यह सेक्टर कमजोर पड़ता, तो इसका असर सीधे रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ता. बजट 2026 में किए गए प्रावधान इसी खतरे को कम करने की कोशिश हैं.

लेबर इंटेंसिव सेक्टर्स का ड्यूटी स्ट्रक्चर

सरकार ने लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स के लिए ड्यूटी स्ट्रक्चर को भी आसान बनाने की दिशा में कदम उठाए हैं. सीफूड एक्सपोर्ट के लिए ड्यूटी-फ्री इनपुट की सीमा को बढ़ाकर पिछले साल के एक्सपोर्ट टर्नओवर के 3 फीसदी तक कर दिया गया है. इसके अलावा जूते के अपर के एक्सपोर्ट को भी ड्यूटी-फ्री इनपुट की सुविधा दी गई है, जो पहले सिर्फ लेदर और सिंथेटिक फुटवियर तक सीमित थी. लेदर, टेक्सटाइल गारमेंट्स और फुटवियर एक्सपोर्टर्स के लिए एक्सपोर्ट पूरा करने की समय सीमा को 6 महीने से बढ़ाकर एक साल कर दिया गया है. इन फैसलों का मकसद साफ है- भारतीय एक्सपोर्टर्स की लागत घटाना और उन्हें ग्लोबल कंपटीशन में टिकाए रखना.

कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग का बजट करेगा कंपटीशन कम!

बजट 2026 में एक और अहम घोषणा कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग को लेकर की गई है. वैश्विक व्यापार में हाल के वर्षों में कंटेनर की कमी एक बड़ी समस्या बनकर उभरी है. रेड सी संकट और मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने इस कमजोरी को और उजागर कर दिया. भारत अब तक कंटेनर के लिए चीन पर काफी हद तक निर्भर रहा है, जो वैश्विक स्तर पर करीब 95 फीसदी कंटेनर बनाता है. इसे रणनीतिक जोखिम मानते हुए सरकार ने पांच साल के लिए 10,000 करोड़ रुपये की कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग स्कीम की घोषणा की है. इसका उद्देश्य भारत में एक प्रतिस्पर्धी कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम तैयार करना और सप्लाई चेन में आत्मनिर्भरता बढ़ाना है.

एक नजर में…

इन शॉर्ट बजट 2026 केवल घरेलू जरूरतों तक सीमित नहीं है. यह साफ तौर पर संकेत देता है कि सरकार ने ट्रंप की टैरिफ नीति और वैश्विक व्यापार में आई अस्थिरता से सबक लिया है. SEZ को राहत, टेक्सटाइल और MSME सेक्टर को सपोर्ट, एक्सपोर्टर्स की लागत कम करने के उपाय और कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग जैसी घोषणाएं यह बताती हैं कि भारत अब रक्षात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक तरीके से वैश्विक चुनौतियों का सामना करना चाहता है. हालांकि असली असर तब दिखेगा जब ये नीतियां जमीन पर तेजी से लागू होंगी, लेकिन इतना तय है कि बजट 2026 ने ट्रंप टैरिफ के प्रभाव को कम करने की दिशा में एक ठोस शुरुआत कर दी है.

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