कभी चौथा अमीर देश था वेनेजुएला, अमेरिकियों के बराबर थी कमाई; कैसे बर्बाद हुआ ‘लैटिन अमेरिका का सऊदी अरब’?
अमेरिका की हालिया कार्रवाई के बाद वेनेजुएला एक बार फिर दुनिया की सुर्खियों में है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि कभी यह देश दुनिया के सबसे अमीर देशों में गिना जाता था. 1950-60 के दशक में वेनेजुएला के लोगों की कमाई अमेरिका के करीब थी और तेल की दौलत के कारण उसे ‘लैटिन अमेरिका का सऊदी अरब’ कहा जाता था. फिर ऐसा क्या हुआ कि वही देश महंगाई, भूख, पलायन और आर्थिक तबाही का प्रतीक बन गया?
How Venezuela Collapsed: पिछले दो दिनों से वेनेजुएला में जो रहा है उसकी खबर हर मीडिया चैनल, न्यूज वेबसाइट और अखबार में देखने-पढ़ने को मिल रहा है. वेनेजुएला में अमेरिका की एंट्री ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. लेकिन क्या आपको पता है कि कभी दुनिया के सबसे अपनी देशों में शुमार होने वाला वेनेजुएला आज दाने-दाने को मोहताज हो गया है. 1950 और 60 के दशक में हालात ऐसे थे कि वेनेजुएला के लोगों की इनकम अमेरिका के बराबर हुआ करती थी. तेल की अथाह दौलत ने इस देश को इतना समृद्ध बना दिया था कि उसे ‘लैटिन अमेरिका का सऊदी अरब’ कहा जाने लगा.
कितना अमीर हुआ करता था वेनेजुएला?
60 का ही वह दशक था जब वेनेजुएला की राजधानी काराकस की सड़कों पर लग्जरी कारें दौड़ती थीं, ऊंची इमारतें खड़ी थीं. लोगों के पास इतना पैसा हुआ करता था कि लोग वीकेंड पर शॉपिंग के लिए उड़कर मियामी जाया करते थे. उस वक्त अगर अमेरिका का एक नागरिक औसतन 100 रुपये कमाता था तब वेनेजुएला का नागरिक भी करीब 82 रुपये से 85 रुपये तक कमा लेता था. लेकिन वही देश आज हालात के ऐसे अंधेरे में डूब चुका है कि लोगों को खाने के लिए लाइन में लगना पड़ता है, लाखों लोग देश छोड़ चुके हैं और पूरी अर्थव्यवस्था ढह चुकी है.
इस कहानी के केंद्र में हैं निकोलस मादुरो- एक समय बस ड्राइवर रहे शख्स, जो सत्ता के शिखर तक पहुंचे और फिर ऐसे दौर के प्रतीक बन गए, जिसे वेनेजुएला की सबसे बड़ी त्रासदी माना जाता है. मादुरो की सत्ता तक की यात्रा जितनी असाधारण है, उनका शासन उतना ही विवादों और संकटों से भरा रहा.
बस ड्राइवर से राष्ट्रपति तक का सफर
निकोलस मादुरो का जन्म 13 नवंबर 1962 को कराकस में हुआ. उनके पिता ट्रेड यूनियन से जुड़े थे और मां एक गृहिणी थीं. बचपन से ही मादुरो का झुकाव राजनीति की ओर था. उन्होंने हाईस्कूल की पढ़ाई बीच में छोड़ दी और युवावस्था में बस चलाने लगे. यही नहीं, वे जल्द ही बस यूनियन के नेता बन गए. 1980 के दशक में वे क्यूबा गए, जहां उन्होंने वामपंथी विचारधारा की ट्रेनिंग ली. यहीं से उनकी पहचान एक कट्टर लेफ्टिस्ट नेता के रूप में बनने लगी.

1990 के दशक में उनकी मुलाकात ह्यूगो चावेज से हुई, जो आगे चलकर वेनेजुएला की राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा बने. चावेज ने सोशलिस्ट क्रांति की शुरुआत की और मादुरो उनके सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में शामिल हो गए. चावेज के राष्ट्रपति बनने के बाद मादुरो का राजनीतिक कद तेजी से बढ़ा- वे नेशनल असेंबली के अध्यक्ष बने, फिर विदेश मंत्री और आखिरकार उपराष्ट्रपति.
चावेज के उत्तराधिकारी और सत्ता पर पकड़
साल 2012 में कैंसर से जूझ रहे ह्यूगो चावेज ने देश को संबोधित करते हुए मादुरो को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया. कुछ ही महीनों बाद चावेज का निधन हो गया और 2013 के चुनाव में मादुरो बेहद कम अंतर से जीतकर राष्ट्रपति बने. यही वह मोड़ था, जहां से वेनेजुएला की तकदीर तेजी से बदलने लगी. मादुरो के शासन के शुरुआती वर्षों में ही आर्थिक संकट गहराने लगा.

तेल पर पूरी तरह निर्भर अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ने लगी. सरकार की लोकलुभावन नीतियां, भारी सब्सिडी और भ्रष्टाचार ने हालात और बिगाड़ दिए. जब वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें गिरीं, तो सरकार के पास न तो निवेश के पैसे बचे और न ही बुनियादी खर्च चलाने की क्षमता.
बर्बादी के तीन बड़े कारण
वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था के पतन के पीछे तीन मुख्य वजहें मानी जाती हैं. पहली, ‘डच डिजीज’- देश ने खेती, इंडस्ट्री और दूसरे सेक्टर को नजरअंदाज कर पूरी ताकत सिर्फ तेल निकालने में लगा दी. दूसरी, पॉपुलिस्ट नीतियां- तेल की कमाई को भविष्य में निवेश करने के बजाय मुफ्त योजनाओं में झोंक दिया गया. तीसरी, भ्रष्टाचार और ब्रेन ड्रेन- सरकारी तेल कंपनी PDVSA से अनुभवी इंजीनियरों को हटाकर राजनीतिक वफादारों को बैठाया गया, जिससे प्रोडक्शन गिरता चला गया और लाखों पढ़े-लिखे लोग देश छोड़कर चले गए.
नतीजा यह हुआ कि 2012 से 2020 के बीच वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था करीब 71 फीसदी सिकुड़ गई. महंगाई इतनी बढ़ी कि 2018 तक यह 1,30,000 फीसदी के पार पहुंच गई. लोगों को अंडे खरीदने के लिए नोटों से भरा झोला लेकर जाना पड़ता था. कभी रोजाना 35 लाख बैरल तेल निकालने वाला देश आज मुश्किल से 8 से 11 लाख बैरल पर सिमट गया.
सख्त शासन, विरोध और अंतरराष्ट्रीय अलगाव
मादुरो के शासन में राजनीतिक विरोध भी तेज हुआ. विपक्षी नेताओं को जेल में डाला गया, प्रदर्शनों को हिंसक तरीके से कुचला गया और सैकड़ों लोगों की जान गई. लाखों लोग बेहतर जिंदगी की तलाश में पड़ोसी देशों की ओर पैदल निकल पड़े. इसे दुनिया की सबसे बड़ी माइग्रेशन लहरों में से एक माना जाता है. इसी बीच अमेरिका और पश्चिमी देशों ने मादुरो सरकार पर सख्त प्रतिबंध लगाए. अमेरिका ने वेनेजुएला की संपत्तियां फ्रीज कर दीं और तेल व्यापार पर रोक लगा दी. मादुरो पर ड्रग तस्करी और मानवाधिकार उल्लंघन जैसे गंभीर आरोप लगे. अंतरराष्ट्रीय मंच पर वेनेजुएला लगभग अलग-थलग पड़ गया.

अमेरिका की कार्रवाई और नई अनिश्चितता
अब हालात एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर हैं. हालिया घटनाओं की बात करें तो अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई कर निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर लिया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने साफ कहा है कि वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन के बाद जब तक स्थिर व्यवस्था नहीं बनती, तब तक अमेरिका हालात पर नजर रखेगा. जानकारों का मानना है कि अगर वहां अमेरिका समर्थित सरकार बनती है और प्रतिबंध हटते हैं, तो वेनेजुएला का तेल एक बार फिर बड़े पैमाने पर वैश्विक बाजार में लौट सकता है.
भारत पर भी पड़ेगा असर
वेनेजुएला की इस उथल-पुथल का असर भारत तक पहुंच सकता है. दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार रखने वाले इस देश से भारत को सस्ता कच्चा तेल मिलने की संभावना बन सकती है. रिलायंस इंडस्ट्रीज और ONGC जैसी भारतीय कंपनियों के लिए भी रुके हुए निवेश और कारोबार दोबारा शुरू होने की उम्मीद जगी है. अगर ऐसा होता है, तो देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी राहत मिल सकती है.
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