घर खरीदेंगे तो बनेंगे मालिक… या कर्ज के गुलाम? 1% नियम खोलेगा पूरा सच; जानें कब किराया सही, कब खरीद
कई लोग सोचते हैं कि EMI भरना किराए से बेहतर है, जबकि दूसरे मानते हैं कि किराए पर रहना ज्यादा लचीला और सुरक्षित विकल्प है. ऐसे में निवेशकों और घर खरीदारों के लिए एक आसान तरीका सामने आता है, जिसे ‘1% Rent vs Buy Rule’ कहा जाता है.
Rent vs Buy Rule: घर खरीदना या किराए पर लेना भारत के शहरी परिवारों के लिए सबसे बड़े वित्तीय फैसलों में से एक है. बढ़ती प्रॉपर्टी कीमतें, महंगे होम लोन और बदलती नौकरी की स्थितियां इस फैसले को और कठिन बना देती हैं. कई लोग सोचते हैं कि EMI भरना किराए से बेहतर है, जबकि दूसरे मानते हैं कि किराए पर रहना ज्यादा सुरक्षित विकल्प है. ऐसे में निवेशकों और घर खरीदारों के लिए एक आसान तरीका सामने आता है, जिसे ‘1% रेंट बनाम बाय नियम’ कहा जाता है.
यह नियम आपको यह समझने में मदद करता है कि कोई संपत्ति वित्तीय रूप से खरीदने लायक है या नहीं. इसके जरिए आप ओवरप्राइस्ड घरों से बच सकते हैं और बेहतर कैश फ्लो वाले विकल्प चुन सकते हैं. हालांकि यह नियम निवेश के नजरिए से ज्यादा उपयोगी है, रहने के लिए घर खरीदते समय भावनात्मक और पारिवारिक जरूरतें भी अहम होती हैं. स्कूल, ऑफिस की दूरी, पड़ोस और जीवनशैली जैसे कारक कई बार गणित से ऊपर हो जाते हैं. अब समझते हैं कि यह नियम क्या है और भारत में यह कितना उपयोगी है.
क्या है 1% नियम
1% नियम कहता है कि अगर किसी घर की मासिक किराया कीमत उसकी कुल खरीद कीमत का कम से कम 1% है, तो वह संपत्ति निवेश के लिहाज से बेहतर मानी जाती है. उदाहरण के लिए, अगर फ्लैट की कीमत 1 करोड़ रुपये है, तो उसका आदर्श मासिक किराया करीब 1 लाख रुपये होना चाहिए. अगर किराया इससे काफी कम है, तो खरीदारी आर्थिक रूप से कमजोर सौदा हो सकती है.
इसे कैसे इस्तेमाल करें
सबसे पहले उसी इलाके में समान घरों का औसत किराया देखें. फिर उसे घर की खरीद कीमत से तुलना करें. साथ ही मेंटेनेंस, प्रॉपर्टी टैक्स, होम लोन ब्याज, सोसाइटी चार्ज और स्टांप ड्यूटी जैसे खर्च भी जोड़ें. इन सबको मिलाकर ही सही फैसला लें. यह नियम भविष्य में घर की कीमत बढ़ने की संभावना को नहीं देखता. होम लोन पर मिलने वाले टैक्स बेनिफिट को भी शामिल नहीं करता. साथ ही आपकी व्यक्तिगत जरूरतें जैसे परिवार, नौकरी की स्थिरता या जीवनशैली इसमें नहीं आतीं.
भारत में यह नियम कितना लागू
भारत में Residential प्रॉपर्टी की औसत रेंटल यील्ड करीब 2 प्रतिशत है, जो विकसित देशों से काफी कम है. इसलिए यहां 1% नियम अक्सर लागू नहीं होता. महानगरों में घर बेहद महंगे हैं, लेकिन किराए कम रहते हैं. ऐसे में कई बार किराए पर रहना बेहतर साबित होता है. वहीं छोटे शहरों में किराया बेहतर मिलता है, जिससे खरीद का मामला मजबूत बनता है.
किराया vs खरीद में क्या चुनें
अगर आप लंबे समय तक एक ही शहर में रहेंगे और EMI और किराए का अंतर ज्यादा नहीं है, तो खरीद बेहतर विकल्प हो सकता है. घर खरीदने से संपत्ति बनती है और भविष्य में सुरक्षा मिलती है. दूसरी ओर, किराया आपको नौकरी बदलने, शहर बदलने और कम वित्तीय बोझ रखने की आजादी देता है.
ये भी पढ़ें- इन पांच कंपनियों पर रखें नजर, 59% तक पहुंचा प्रॉफिट मार्जिन, 5 साल में 3323% तक रिटर्न, कर्ज लगभग जीरो
Latest Stories
बैंक का लोन ऑफर कॉल, राहत या महंगा जाल; इंस्टेंट लोन सुनकर न हों खुश, हां कहने से पहले करें ये काम
बिहार सरकार बिजनेस के लिए दे रही ₹10 लाख तक लोन, जानें किसे मिलता है लाभ, कैसे करें आवेदन
50 लाख के होम लोन पर 10 लाख की बचत! जानें एक्स्ट्रा EMI से कैसे कम होता है ब्याज का बोझ, समझें पूरा गणित
