जनवरी में भी नहीं थमी विदेशी बिकवाली, शेयर मार्केट से ₹22,530 करोड़ की निकासी, आगे किधर जाएगा बाजार?

नए साल की शुरुआत में ही भारतीय बाजारों के सामने वैश्विक दबाव बढ़ता दिख रहा है. विदेशी पूंजी की चाल, रुपये की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय संकेत निवेशकों की रणनीति को प्रभावित कर रहे हैं. आने वाले दिनों में बाजार की दिशा तय करने में वैश्विक ब्याज दरें, डॉलर की मजबूती और घरेलू संकेत अहम भूमिका निभा सकते हैं.

FPIs Outflow Image Credit: FreePik

FPIs Outflow January: नए साल की शुरुआत भारतीय शेयर बाजार के लिए राहत लेकर नहीं आई है. जनवरी के पहले पखवाड़े में ही विदेशी निवेशकों ने जिस तरह से शेयरों से पैसा निकाला है, उसने बाजार की चाल और रुपये की मजबूती दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं. अमेरिका में बढ़ती ब्याज दरें, मजबूत डॉलर और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक यानी FPI लगातार भारतीय बाजार से दूरी बना रहे हैं. इसका असर न सिर्फ शेयरों पर दिख रहा है, बल्कि रुपये की कमजोरी भी इसी दबाव की कहानी कह रही है.

जनवरी में ₹22,530 करोड़ की बिकवाली

NSDL के आंकड़ों के मुताबिक, 1 से 16 जनवरी के बीच विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी बाजार से ₹22,530 करोड़ की निकासी की है. डॉलर के लिहाज से यह रकम करीब 2.5 अरब डॉलर बैठती है. यह सिलसिला अचानक शुरू नहीं हुआ है, बल्कि पिछले साल से चली आ रही बिकवाली का ही विस्तार है. साल 2025 में विदेशी निवेशकों ने कुल ₹1.66 लाख करोड़ से ज्यादा का पैसा भारतीय शेयर बाजार से निकाला था.

क्यों दूर हो रहे हैं विदेशी निवेशक

बाजार जानकारों का मानना है कि इसके पीछे कई वैश्विक कारण एक साथ काम कर रहे हैं. अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़ने से वहां निवेश पर मिलने वाला रिटर्न ज्यादा आकर्षक हो गया है. इसके साथ ही डॉलर की मजबूती ने उभरते बाजारों से पूंजी को विकसित देशों की ओर मोड़ दिया है. सेंट्रिसिटी वेल्थटेक के इक्विटी हेड सचिन जसूजा के मुताबिक, बेहतर रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न के कारण निवेशक अब विकसित बाजारों को प्राथमिकता दे रहे हैं.

व्यापार और भू-राजनीति की चिंता

मॉर्निंगस्टार इंडिया के रिसर्च हेड हिमांशु श्रीवास्तव का कहना है कि अमेरिका से जुड़े व्यापारिक और भू-राजनीतिक जोखिम भी उभरते बाजारों की धारणा को कमजोर कर रहे हैं. संभावित अमेरिकी टैरिफ और वैश्विक व्यापार तनाव निवेशकों को सतर्क बना रहे हैं. इसी बीच भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर बनी अनिश्चितता भी विदेशी निवेशकों के मनोबल पर असर डाल रही है.

रुपये की कमजोरी ने बढ़ाया दबाव

विदेशी बिकवाली का एक बड़ा असर रुपये पर भी पड़ा है. साल 2025 में अब तक रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 5 फीसदी कमजोर हो चुका है. हाल में यह 90.44 रुपये प्रति डॉलर के स्तर तक फिसल गया. भले ही शेयर सूचकांक बहुत ज्यादा नहीं गिरे हों, लेकिन रुपये की कमजोरी ने डॉलर में रिटर्न को नुकसान पहुंचाया है, जिससे विदेशी निवेशकों पर और दबाव बना है.

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आगे बाजार का रुख क्या होगा

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वी.के. विजयकुमार का मानना है कि जब तक कोई ठोस सकारात्मक संकेत नहीं मिलते, तब तक विदेशी बिकवाली जारी रह सकती है. उन्होंने यह भी कहा कि 2025 में बाजार पर हावी रहा एआई आधारित निवेश ट्रेंड 2026 की शुरुआत में भी दिख रहा है, हालांकि साल के दूसरे हिस्से में इसमें बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. फिलहाल, निवेशकों की नजर वैश्विक संकेतों और रुपये की चाल पर टिकी हुई है.