SEBI का बड़ा प्रस्ताव, विदेशी निवेशकों के लिए कैश सेटलमेंट नियमों में ढील की तैयारी; 6 फरवरी तक मांगे सुझाव
SEBI ने विदेशी निवेशकों के लिए कैश सेटलमेंट नियमों में ढील देने का प्रस्ताव रखा है, जिससे भारतीय कैपिटल मार्केट में बड़ा ऑपरेशनल बदलाव संभव है. इस कदम का उद्देश्य FPI की फंडिंग लागत को कम करना और ट्रेडिंग प्रोसेस को अधिक एफिशिएंट बनाना है. SEBI ने इस प्रस्ताव पर पब्लिक कमेंट्स मांगे हैं और 6 फरवरी तक सुझाव आमंत्रित किए हैं.
SEBI ने विदेशी निवेशकों के लिए कैश सेटलमेंट नियमों में ढील देने का प्रस्ताव रखा है, जिससे भारतीय कैपिटल मार्केट में बड़ा ऑपरेशनल बदलाव देखने को मिल सकता है. इस कदम का उद्देश्य विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी FPI की फंडिंग लागत को कम करना और ट्रेडिंग प्रोसेस को ज्यादा एफिशिएंट बनाना है. खासतौर पर उन दिनों में, जब बाजार में भारी ट्रेडिंग वॉल्यूम होता है, जैसे इंडेक्स रीबैलेंसिंग के दौरान. यह प्रस्ताव विदेशी निवेशकों को राहत दे सकता है. SEBI ने 16 जनवरी को जारी कंसल्टेशन पेपर में मौजूदा सेटलमेंट सिस्टम में सुधार की जरूरत बताई है.
मौजूदा सेटलमेंट सिस्टम में क्या है दिक्कत
फिलहाल, कैश मार्केट में FPI को अपने सभी बाय और सेल ट्रांजैक्शंस कस्टोडियन लेवल पर ग्रॉस बेसिस पर सेटल करने होते हैं. इसका मतलब यह है कि अगर किसी निवेशक ने एक ही दिन में शेयर खरीदे भी हैं और बेचे भी हैं, तब भी उसे खरीद के लिए पूरी रकम अलग से लानी होती है और बिक्री के लिए सिक्योरिटीज की डिलीवरी अलग से देनी पड़ती है. हालांकि, कस्टोडियन बाद में क्लियरिंग कॉरपोरेशन के साथ नेट बेसिस पर सेटलमेंट करते हैं, लेकिन निवेशक के स्तर पर यह व्यवस्था अस्थायी लिक्विडिटी की जरूरत को काफी बढ़ा देती है.
विदेशी निवेशकों की बिकवाली और बढ़ता दबाव
SEBI का यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है, जब पिछले एक साल में विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली देखने को मिली है. 2025 की शुरुआत से अब तक FII भारतीय इक्विटी मार्केट से करीब 21 बिलियन डॉलर की निकासी कर चुके हैं. SEBI के मुताबिक, मौजूदा ग्रॉस सेटलमेंट सिस्टम के चलते FPI अक्सर कम से कम एक दिन के लिए अंडरइनवेस्टेड रह जाते हैं. इसके अलावा, उन्हें फॉरेक्स कन्वर्जन स्लिपेज और शॉर्ट-टर्म फंडिंग जैसे अतिरिक्त खर्च भी उठाने पड़ते हैं. इंडेक्स रीशफलिंग जैसे हाई-वॉल्यूम ट्रेडिंग डेज पर यह समस्या और ज्यादा गंभीर हो जाती है.
नेटिंग ऑफ फंड्स की अनुमति
SEBI ने अपने कंसल्टेशन पेपर में सुझाव दिया है कि कैश मार्केट में एक ही सेटलमेंट डे पर किए गए आउट्राइट बाय और आउट्राइट सेल ट्रांजैक्शंस के लिए “नेटिंग ऑफ फंड्स” की इजाजत दी जाए. इस व्यवस्था के तहत बिक्री से मिलने वाली रकम को खरीद की देनदारी के साथ एडजस्ट किया जा सकेगा.
यानी FPI को केवल नेट कैश अमाउंट ही फंड करना होगा. इससे फंडिंग लागत कम होगी और ऑपरेशनल एफिशिएंसी बेहतर होगी. हालांकि, अगर कोई निवेशक एक ही सिक्योरिटी को उसी सेटलमेंट साइकिल में खरीदता और बेचता है, तो ऐसे ट्रांजैक्शंस मौजूदा नियमों के अनुसार ग्रॉस बेसिस पर ही सेटल किए जाएंगे.
सेटलमेंट रिस्क और SEBI की तैयारी
SEBI ने माना है कि कस्टोडियंस, क्लियरिंग कॉरपोरेशंस और स्टॉक एक्सचेंजों के साथ हुई चर्चाओं में कुछ संभावित जोखिम सामने आए हैं. इनमें ट्रेड रिजेक्शन की संभावना, कस्टोडियंस के लिए सेटलमेंट रिस्क और पीक ट्रेडिंग डेज पर सिस्टम रेडीनेस जैसे मुद्दे शामिल हैं.
इसके जवाब में SEBI ने कहा है कि भारत का क्लियरिंग सिस्टम पहले से ही मजबूत सेफगार्ड्स से लैस है, जिनमें डिफॉल्ट वॉटरफॉल मैकेनिज्म और कोर सेटलमेंट गारंटी फंड शामिल हैं. प्रस्ताव के लागू होने पर कस्टोडियंस को अपने सिस्टम अपग्रेड करने होंगे, जबकि कस्टोडियन और क्लियरिंग कॉरपोरेशन के बीच सेटलमेंट मौजूदा तरह नेट बेसिस पर ही जारी रहेगा.
6 फरवरी तक मांगे गए सुझाव
SEBI ने इस प्रस्ताव पर पब्लिक कमेंट्स आमंत्रित किए हैं. मार्केट पार्टिसिपेंट्स और निवेशक 6 फरवरी तक अपनी राय दे सकते हैं. इन सुझावों के आधार पर SEBI अंतिम फैसला लेगा, जो आगे चलकर भारतीय कैपिटल मार्केट में विदेशी निवेशकों की भागीदारी को और आसान बना सकता है.
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