ETF निवेशकों के लिए होने वाला है बड़ा बदलाव, Sebi ने T-1 NAV को लेकर दिया नया प्रस्ताव; 6 मार्च तक मांगे सुझाव

ETF निवेशकों के लिए Sebi ने बड़ा बदलाव प्रस्तावित किया है. रेगुलेटर ने ETF के लिए T-2 day NAV की जगह T-1 NAV को बेस प्राइस बनाने का सुझाव दिया है, ताकि बाजार की मौजूदा स्थिति के साथ कीमतों का बेहतर तालमेल बन सके. Sebi का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था से प्राइस मिसमैच और ट्रेडिंग दिक्कतें पैदा हो रही हैं. Sebi ने इन प्रस्तावों पर 6 मार्च तक सुझाव मांगे हैं.

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Sebi ETF proposal: भारत के कैपिटल मार्केट रेगुलेटर सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया ने ETF निवेश से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव करने का प्रस्ताव रखा है. Sebi ने एक्सचेंज ट्रेडेड फंड यानी ETF के लिए बेस प्राइस तय करने के मौजूदा सिस्टम में बदलाव का सुझाव दिया है. अभी तक ETF के लिए T-2 day NAV को आधार बनाया जाता है, लेकिन रेगुलेटर का मानना है कि यह व्यवस्था बाजार की मौजूदा स्थितियों के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रही है, खासकर तब जब बाजार में तेज वोलैटिलिटी रहती है. इसी वजह से Sebi ने T-1 NAV को बेस प्राइस के रूप में अपनाने का सुझाव दिया है.

क्यों जरूरी है T-2 day NAV से T-1 NAV में बदलाव

Sebi ने शुक्रवार को जारी कंसल्टेशन पेपर में कहा है कि मौजूदा टी-2 फ्रेमवर्क से स्ट्रक्चरल इनएफिशिएंसीज पैदा हो रही हैं. ETF का NAV अक्सर T-1 और T-2 के बीच बदल जाता है, लेकिन जब दो दिन पुराना डेटा इस्तेमाल किया जाता है, तो ETF की मार्केट प्राइस और अंडरलाइंग एसेट के बीच अंतर पैदा हो जाता है. इसका सीधा असर निवेशकों की एंट्री और एग्जिट प्राइसिंग पर पड़ता है, जिससे ट्रेडिंग एक्सपीरियंस प्रभावित होता है.

Sebi ने सुझाए तीन विकल्प

इस समस्या को दूर करने के लिए Sebi ने T-1 डे डेटा को बेस प्राइस बनाने का प्रस्ताव रखा है. इसके लिए तीन विकल्प सामने रखे गए हैं. पहला विकल्प T-1 दिन का क्लोजिंग ट्रेडेड प्राइस है, जो आखिरी 30 मिनट के वेटेड एवरेज प्राइस पर आधारित होगा. दूसरा विकल्प T-1 दिन के आखिरी 30 मिनट का एवरेज आई-एनएवी है. तीसरा विकल्प T-1 दिन का क्लोजिंग NAV है, जहां ऑपरेशनल फीजिबिलिटी संभव हो.

ETF प्राइस बैंड पर भी सवाल

Sebi ने ETF पर लागू यूनिफॉर्म प्राइस बैंड को लेकर भी चिंता जताई है. फिलहाल इक्विटी, डेट, गोल्ड और सिल्वर ETF पर प्लस-माइनस 20 फीसदी का प्राइस बैंड लागू है, जबकि ओवरनाइट ETF पर प्लस-माइनस 5 फीसदी का बैंड होता है. ये लिमिट्स T-2 day NAV के आधार पर तय की जाती हैं, जबकि स्टॉक्स और इंडाइसेज के लिए T-1 क्लोजिंग प्राइस को आधार बनाया जाता है.

Sebi के एनालिसिस के मुताबिक, अप्रैल से दिसंबर 2025 के दौरान 99.8 फीसदी इक्विटी और डेट ETF में सिंगल डे मूवमेंट 10 फीसदी के भीतर रहा. कमोडिटी ETF में 98 फीसदी से ज्यादा मूवमेंट 9 फीसदी के अंदर दर्ज किए गए, जबकि ओवरनाइट ETF ज्यादातर 5 फीसदी की रेंज में ही ट्रेड हुए. ऐसे में Sebi का मानना है कि सभी ETF पर 20 फीसदी का फ्लैट बैंड जरूरत से ज्यादा चौड़ा है.

वोलैटिलिटी और ऑपरेशनल रिस्क पर फोकस

Sebi ने यह भी बताया कि जनवरी 2026 में मेटल्स में आई तेज वोलैटिलिटी के दौरान मौजूदा प्राइस बैंड ETF प्राइस और अंडरलाइंग एसेट के बीच सही अलाइनमेंट नहीं बना पाए. इसके अलावा T-2 day NAV में डिविडेंड और बोनस जैसी कॉरपोरेट एक्शंस को मैन्युअली एडजस्ट करना पड़ता है, जिससे ऑपरेशनल एरर्स का रिस्क बढ़ जाता है. T-1 रेफरेंस अपनाने से इस तरह की मैन्युअल इंटरवेंशन कम हो सकती है.

निवेशकों से मांगे गए सुझाव

Sebi ने मार्केट पार्टिसिपेंट्स और इन्वेस्टर्स से इन प्रस्तावों पर 6 मार्च तक कमेंट्स मांगे हैं. अगर ये बदलाव लागू होते हैं, तो ETF ट्रेडिंग ज्यादा एफिशिएंट, ट्रांसपेरेंट और मार्केट-लिंक्ड हो सकती है. इससे रिटेल और इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स दोनों को बेहतर प्राइसिंग और स्मूदर ट्रेडिंग एक्सपीरियंस मिलने की उम्मीद है.

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