चुनावी राजनीति में महिलाएं बन चुकी हैं तुरूप का इक्का; बजट में कैश इंसेंटिव से लेकर बिजनेस वुमेन बनने का खुल सकता है रास्ता

1 फरवरी को पेश होने वाले बजट की ओर महिलाओं की निगाहें हैं. उम्मीद है कि बजट में नीतियों का फोकस अब केवल योजनाओं तक सीमित नहीं, बल्कि महिलाओं की रोजमर्रा की चुनौतियों और उनकी भूमिका को बदलने की दिशा में होगा. बजट के जरिए कुछ ऐसे संकेत मिल सकते हैं, जो महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को नई दिशा दे दें.

बजट से उम्मीदें Image Credit: Money9 Live

Women in Budget 2026: भारत की चुनावी राजनीति में महिलाएं अब सिर्फ वोटर नहीं रहीं, बल्कि सत्ता संतुलन तय करने वाली तुरूप का इक्का बन चुकी हैं. यही वजह है कि बजट 2026-27 से पहले सरकार की नजर महिलाओं पर टिकी है. सब्सिडी और स्कीम के अलावा, ध्यान इस बात पर भी है कि क्या बजट महिलाओं की जिंदगी से जुड़ी अन्य चुनौतियों को भी हल कर पाएगा. अगर ऐसा हुआ, तो कैश इंसेंटिव, सस्ता लोन और रोजगार के जरिए करोड़ों महिलाएं घर की चारदीवारी से निकलकर आर्थिक ताकत बन सकती हैं.

भारत में महिलाओं का योगदान जीडीपी में करीब 18 फीसदी है. इसकी वजह यह नहीं कि महिलाएं काम नहीं करतीं, बल्कि इसलिए कि उनका बड़ा हिस्सा बिना वेतन के काम में लगा है. PLFS के आंकड़े बताते हैं कि करीब 40 फीसदी महिलाएं श्रम बल में हैं, जबकि 60 फीसदी महिलाएं घरेलू और देखभाल की जिम्मेदारियों के कारण बाहर काम नहीं कर पातीं. ऐसे में महिलाओं के मुद्दे पर ध्यान देने वालो का मानना है कि अगर सरकार समय बचाने जैसी योजनाओं पर ध्यान दें तो स्थिति और बेहतर हो सकती है.

बजट में महिलाओं का समय बचाना क्यों जरूरी

टाइम यूज सर्वे के मुताबिक महिलाओं का बिना वेतन वाला घरेलू काम लगातार बढ़ रहा है. ऐसे में मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि बजट में सिर्फ योजनाएं बढ़ाना काफी नहीं, जरूरी है कि योजनाएं महिलाओं का समय बचाएं. उदाहरण के तौर पर, प्रधानमंत्री आवास योजना में घर महिलाओं के नाम होना अच्छी बात है, लेकिन अगर उस घर में पानी, शौचालय, बिजली और साफ ईंधन नहीं है, तो महिला का समय नहीं बचेगा. बजट में ऐसे “पूरा महिला-अनुकूल घर” को प्राथमिकता मिलने की उम्मीद की जा रही है.

महिलाओं के कामकाजी बनने में सबसे बड़ी रुकावट बच्चों की देखभाल है. क्रेच, आंगनवाड़ी और पोषण योजनाएं अलग-अलग चलती हैं, जिससे कई जगह सुविधाएं अधूरी रह जाती हैं. बजट में अगर इन सभी को जोड़कर केयर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया जाए, तो महिलाओं के लिए नौकरी करना आसान हो सकता है.

नौकरी और मनरेगा से महिलाओं को ताकत

सरकार की रोजगार योजनाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना भी बड़ा राजनीतिक दांव हो सकता है. नई रोजगार प्रोत्साहन योजनाओं में महिलाओं के लिए खास कोटा, वेतन सब्सिडी और सामाजिक सुरक्षा दी जा सकती है. ग्रामीण इलाकों में मनरेगा में पहले से ही 50 फीसदी से ज्यादा महिलाएं हैं. अगर बजट में इसके लिए ज्यादा फंड आया, तो यह महिलाओं के लिए स्थायी सहारा बन सकता है.

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बिजनेस वुमेन बनने का रास्ता

महिलाओं के पास छोटे कारोबार हैं, लेकिन उन्हें बड़ा करने के लिए पैसा और तकनीक नहीं मिलती. मुद्रा योजना में महिलाओं को लोन तो मिलता है, लेकिन ज्यादातर बहुत छोटे स्तर का. बजट में अगर सस्ता और बड़ा लोन, डिजिटल ट्रेनिंग और बाजार तक पहुंच का इंतजाम हुआ, तो लाखों महिलाएं खुद का बिजनेस खड़ा कर सकती हैं.