जिस STT ने मचाई बवाल और तोड़ा मार्केट, अब निर्मला सीतारमण ने खोला राज; बताया क्यों जरूरी था यह फैसला
बजट 2026–27 में डेरिवेटिव ट्रेडिंग पर STT बढ़ाने के ऐलान के बाद शेयर बाजार में तेज गिरावट देखने को मिली. निफ्टी और सेंसेक्स दोनों दबाव में आ गए. सरकार का कहना है कि यह फैसला सट्टेबाजी रोकने, टैक्स कलेक्शन बढ़ाने और रिटेल निवेशकों को ज्यादा सुरक्षित निवेश की ओर मोड़ने के लिए लिया गया है.
Why STT Increases: केंद्रीय बजट 2026–27 में जैसे ही वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने डेरिवेटिव ट्रेडिंग पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) बढ़ाने का ऐलान किया और शेयर बाजार में हलचल तेज हो गई. बजट भाषण के दौरान STT में बढ़ोतरी की घोषणा के तुरंत बाद बाजार दबाव में आ गया और निवेशकों में बेचैनी साफ नजर आई. ट्रेडिंग सेशन के अंत में निफ्टी 50 करीब 495 अंक या 1.96 फीसदी गिरकर 24,825.45 पर बंद हुआ, जबकि बीएसई सेंसेक्स 1,546 अंक या 1.88 फीसदी टूटकर 80,722.94 के स्तर पर आ गया. वहीं, इंट्रा डे की बात करें तो सेंसेक्स दिन के हाई से तकरीबन 2827 अंक टूट गया था. वहीं, इस दौरान निफ्टी 869.15 अंक तक टूटा था.
क्यों बढ़ा STT?
वित्त मंत्री ने साफ किया कि फ्यूचर्स और ऑप्शंस (F&O) सेगमेंट में जरूरत से ज्यादा सट्टेबाजी को काबू में लाने के लिए STT बढ़ाया जा रहा है. नए प्रस्ताव के तहत फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स पर STT को 0.02 फीसदी से बढ़ाकर 0.05 फीसदी कर दिया गया है, यानी करीब 150 फीसदी की बढ़ोतरी. वहीं ऑप्शंस से जुड़े टैक्स में भी बड़ा बदलाव किया गया है. ऑप्शन प्रीमियम पर लगने वाला STT 0.10 फीसदी से बढ़ाकर 0.15 फीसदी कर दिया गया है, जबकि ऑप्शन एक्सरसाइज पर STT को 0.125 फीसदी से बढ़ाकर 0.15 फीसदी किया गया है. इन बदलावों का सीधा मतलब है कि अब F&O में ट्रेडिंग पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा महंगी हो गई है, खासकर उन निवेशकों के लिए जो रोजाना कई सौदे करते हैं.
क्या है STT और F&O ट्रेडिंग?
STT यानी सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स शेयर बाजार में होने वाले हर सौदे पर लगाया जाने वाला टैक्स है, चाहे निवेशक को मुनाफा हो या नुकसान. यह टैक्स इक्विटी शेयर, इक्विटी म्यूचुअल फंड और डेरिवेटिव्स यानी फ्यूचर्स और ऑप्शंस पर लागू होता है. भारत में STT की शुरुआत 1 अक्टूबर 2004 को की गई थी. इसका मकसद टैक्स कलेक्शन को आसान बनाना, शेयर बाजार में टैक्स चोरी रोकना और उस समय मौजूद लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स की जगह लेना था. हालांकि 2018 में LTCG टैक्स दोबारा लागू हो गया, लेकिन STT को बरकरार रखा गया.
वहीं F&O ट्रेडिंग में असली शेयरों की खरीद-बिक्री नहीं होती, बल्कि कॉन्ट्रैक्ट्स के जरिए भविष्य की कीमतों पर दांव लगाया जाता है. फ्यूचर्स में तय कीमत पर भविष्य में खरीद या बिक्री का समझौता होता है, जबकि ऑप्शंस में निवेशक को खरीदने या बेचने का अधिकार मिलता है, लेकिन मजबूरी नहीं होती. मुनाफे की संभावना ज्यादा होने के साथ-साथ इसमें रिस्क भी उतना ही ज्यादा होता है.
STT बढ़ने से ट्रेडर्स क्यों हैं परेशान?
STT में बढ़ोतरी का असर सबसे ज्यादा एक्टिव और हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडर्स पर पड़ने वाला है. अब हर सौदे की लागत बढ़ गई है. उदाहरण के तौर पर, पहले 1 लाख रुपये के फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट पर STT सिर्फ 20 रुपये लगता था, जो अब बढ़कर 50 रुपये हो गया है. एक-दो ट्रेड में फर्क कम लग सकता है, लेकिन जो निवेशक दिनभर में दर्जनों या सैकड़ों ट्रेड करते हैं, उनके लिए यह अतिरिक्त खर्च धीरे-धीरे मुनाफे को खा सकता है. इसके अलावा बजट में बायबैक से मिलने वाली रकम को भी सभी शेयरधारकों के लिए कैपिटल गेन के तौर पर टैक्स करने का ऐलान किया गया है, जिससे निवेशकों की कुल टैक्स देनदारी और बढ़ सकती है.
सरकार ने क्यों लिया यह फैसला?
STT बढ़ाने के पीछे सरकार ने तीन बड़े तर्क दिए हैं. पहला, जरूरत से ज्यादा सट्टेबाजी पर लगाम लगाना. सेबी के आंकड़ों के मुताबिक, F&O में ट्रेड करने वाले 10 में से 9 रिटेल निवेशकों को नुकसान होता है. ज्यादा टैक्स लगाने से बार-बार होने वाली शॉर्ट-टर्म ट्रेडिंग कम हो सकती है. दूसरा, तेजी से बढ़ रहे डेरिवेटिव सेगमेंट से टैक्स कलेक्शन बढ़ाना. तीसरा, रिटेल निवेशकों को हाई-रिस्क डेरिवेटिव्स से हटाकर कैश मार्केट यानी इक्विटी निवेश की ओर प्रोत्साहित करना.
मार्केट का संदेश क्या है?
बजट 2026 में STT बढ़ोतरी ने यह साफ संकेत दे दिया है कि सरकार बाजार में डिसिप्लिन चाहती है. हालांकि इसका तात्कालिक असर बाजार पर नकारात्मक दिखा, लेकिन सरकार का मानना है कि लंबे समय में इससे सट्टेबाजी घटेगी और निवेश ज्यादा स्थिर व टिकाऊ बनेगा. अब निवेशकों और ट्रेडर्स की नजर इस बात पर है कि आने वाले दिनों में बाजार इस फैसले के साथ कैसे तालमेल बैठाता है और क्या सरकार आगे चलकर कैपिटल मार्केट टैक्स स्ट्रक्चर में कोई संतुलन लाती है या नहीं.
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