डॉलर ने खींच लिया GST कटौती का फायदा, साबुन-तेल से लेकर घरेलू समान होंगे महंगे, 5 फीसदी तक बढ़ सकते हैं दाम

देश की एफएमसीजी कंपनियां रोजमर्रा के उत्पादों के दाम 2 से 5 फीसदी तक बढ़ा रही हैं. GST कट के बाद महीनों तक कीमतें स्थिर रहीं, लेकिन अब कच्चे माल की महंगाई और रुपये की कमजोरी से लागत बढ़ गई है. क्रूड ऑयल, नारियल तेल और आयातित सामान महंगे हुए हैं. इससे कंपनियों के मार्जिन पर दबाव है.

क्रूड ऑयल, नारियल तेल और आयातित सामान महंगे हुए हैं. Image Credit: Getty image

FMCG Price Hike: देश में रोजमर्रा के उपयोग की चीजें फिर महंगी होने लगी हैं. FMCG कंपनियां इस तिमाही में 2 से 5 फीसदी तक कीमत बढ़ा रही हैं. GST कट के बाद कई महीनों तक कंपनियों ने दाम स्थिर रखे थे. लेकिन अब लागत बढ़ने से मुनाफे पर दबाव आ गया है. कच्चे माल की महंगाई और रुपये की कमजोरी मुख्य कारण बनकर उभरे हैं. बाजार में नए रेट वाले पैक पहुंचने शुरू हो चुके हैं.

कच्चे माल की बढ़ती कीमतें

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस बढ़ोतरी के पीछे सबसे बड़ी वजह कमोडिटी की बढ़ती कीमतें हैं. क्रूड ऑयल में तेजी से उससे जुड़े कई कच्चे माल महंगे हुए हैं. साबुन और डिटर्जेंट बनाने में इस्तेमाल होने वाले केमिकल की लागत बढ़ गई है. नारियल तेल की कीमत पिछले 1 साल में लगभग दोगुनी हो चुकी है. इन सबका सीधा असर प्रोडक्शन कॉस्ट पर पड़ रहा है. कंपनियों के लिए पुराने दाम पर बिक्री करना मुश्किल हो गया है.

रुपये की कमजोरी से बढ़ा आयात खर्च

रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है. इससे आयात होने वाले कच्चे माल की कीमत बढ़ गई है. ओट्स और बादाम जैसे कई खाने वाले समान विदेश से आते हैं. रुपये की गिरावट से इनकी लागत और बढ़ गई है. कंपनियों का कहना है कि आयात खर्च में बढ़ोतरी से मार्जिन घट रहा है. इसलिए चुनिंदा पैक पर कीमत बढ़ाना जरूरी हो गया है.

GST कट के बाद टला था दाम बढ़ाना

सितंबर में GST दर घटने के बाद कंपनियों ने टैक्स का फायदा ग्राहकों को दिया था. एंटी प्रॉफिटियरिंग नियमों के कारण कंपनियां कीमत बढ़ाने से बचती रहीं. उन्होंने कई महीनों तक लागत का दबाव खुद झेला. लेकिन अब हालात बदल गए हैं. कंपनियों का कहना है कि लगातार बढ़ती लागत को अनदेखा नहीं किया जा सकता.

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मुनाफे पर दबाव और मार्जिन की चुनौती

हालांकि बिक्री में वृद्धि दर्ज की गई है, लेकिन मार्जिन उतना नहीं बढ़ा. इनकम बढ़ने के बावजूद कच्चे माल की लागत ने मुनाफे को सीमित रखा है. रिपोर्ट बताती हैं कि कंपनियां बैलेंस बनाने की कोशिश कर रही हैं. इसी वजह से 2 से 5 फीसदी तक की कीमत बढ़ोतरी की जा रही है. आगे कमोडिटी बाजार की चाल के अनुसार दाम ऊपर नीचे हो सकते हैं.