मिडिल ईस्ट संकट के बीच US, रूस और अफ्रीका से तेल खरीदने की तैयारी में भारत, जानें कितने दिन का बचा है रिजर्व
ईरान से बढ़ते तनाव और हॉर्मुज स्ट्रेट में बाधित तेल आपूर्ति के खतरे के बीच भारत वैकल्पिक स्रोतों से कच्चा तेल खरीदने की तैयारी कर रहा है. अमेरिका, रूस और पश्चिम अफ्रीका से अतिरिक्त क्रूड आयात पर बातचीत जारी है, जबकि बढ़ती कीमतें देश की अर्थव्यवस्था और महंगाई पर असर डाल सकती हैं.
Middle East Tension and Alternate Oil Suppliers: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े सैन्य टकराव के लंबे समय तक खिंचने की आशंका के बीच भारत ने अपनी कच्चे तेल की आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए वैकल्पिक स्रोतों की तलाश तेज कर दी है. पीटीआई ने अपनी एक रिपोर्ट में सरकारी सूत्रों और ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों के हवाले से लिखा है कि भारतीय रिफाइनरियां अब अमेरिका, रूस और पश्चिम अफ्रीका जैसे क्षेत्रों से अतिरिक्त क्रूड ऑयल कार्गो की खरीद को लेकर बातचीत कर रही हैं, ताकि अगर खाड़ी क्षेत्र में संकट और गहरा हो जाए तो देश में ईंधन की आपूर्ति प्रभावित न हो.
88 फीसदी तेल आयात करता है भारत
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है और अपनी जरूरत का करीब 88 फीसदी तेल विदेशों से आयात करता है. फरवरी 2026 में भारत को मिलने वाले कुल क्रूड ऑयल में से लगभग आधा हिस्सा हॉर्मुज स्ट्रेट के रास्ते आया था. यह समुद्री मार्ग ईरान और ओमान के बीच स्थित एक बेहद अहम एनर्जी ट्रांजिट रूट है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है. लेकिन हाल ही में अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए सैन्य हमलों और उसके जवाब में ईरान की कार्रवाई के बाद इस इलाके में तनाव तेजी से बढ़ गया है. इसका असर यह हुआ कि इस रणनीतिक जलमार्ग से गुजरने वाले तेल टैंकरों की आवाजाही लगभग रुक सी गई है.
कहां से तेल खरीद की तैयारी में भारत?
स्थिति को देखते हुए भारत ने अब नॉन-स्ट्रेट यानी हॉर्मुज मार्ग से अलग सप्लाई स्रोतों पर जोर बढ़ा दिया है. तेल मंत्रालय से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक वर्ष 2025 में भारत को मिलने वाले कुल तेल का लगभग 60 फीसदी हिस्सा ऐसे स्रोतों से आता था जो इस जलमार्ग पर निर्भर नहीं थे, लेकिन मौजूदा संकट के बाद यह हिस्सा बढ़कर करीब 70 फीसदी तक पहुंच गया है. भारत अब पश्चिम अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और अमेरिका जैसे क्षेत्रों से ज्यादा तेल खरीदने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है.
अमेरिकी छूट से खुलेगा भारत का रास्ता
इस बीच अमेरिकी ट्रेजरी विभाग द्वारा जारी 30 दिन की विशेष छूट ने भारत के लिए एक और रास्ता खोल दिया है. इस छूट के तहत उन रूसी तेल कार्गो की बिक्री और डिलीवरी की अनुमति दी गई है जो 5 मार्च तक जहाजों पर लोड किए जा चुके थे, भले ही वे कुछ प्रतिबंधों के दायरे में क्यों न आते हों. यह छूट 5 अप्रैल तक प्रभावी रहेगी, जिससे पहले से समुद्र में मौजूद रूसी तेल के कार्गो को भारत तक पहुंचाने में कोई कानूनी अड़चन नहीं आएगी.
रूसी क्रूड का उठा सकता है फायदा
इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों के हवाले से पीटीआई ने लिखा कि इस समय समुद्र में करीब 120 मिलियन बैरल रूसी क्रूड ऑयल मौजूद है. इनमें से लगभग 15 मिलियन बैरल भारत के करीब अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में टैंकरों पर मौजूद है, जबकि करीब 7 मिलियन बैरल सिंगापुर के आसपास खड़े जहाजों में है. इस स्थिति को देखते हुए भारतीय रिफाइनरियों ने फिर से रूसी तेल खरीदना शुरू कर दिया है.
फिर से खरीदारी कर रहीं भारतीय कंपनियां
बताया जा रहा है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) और HPCL मित्तल एनर्जी लिमिटेड जैसी कंपनियों ने भी बाजार में वापसी करते हुए रूसी तेल के कार्गो सुरक्षित करने की कोशिशें शुरू कर दी हैं. इन कंपनियों ने पिछले साल अमेरिका द्वारा रूस की प्रमुख तेल कंपनियों रोसनेफ्ट और लुकोइल पर प्रतिबंध लगाने के बाद रूसी तेल की खरीद अस्थायी रूप से रोक दी थी.
भारत ने कभी बंद नहीं किया रूसी तेल की खरीद!
प्रतिबंधों से पहले रिलायंस इंडस्ट्रीज रूस से सबसे ज्यादा तेल खरीदने वाली कंपनियों में शामिल थी. कंपनी रोजाना 5 लाख बैरल से ज्यादा रूसी क्रूड आयात करती थी और रोसनेफ्ट के साथ उसका लंबी अवधि का सप्लाई समझौता भी था. हालांकि तेल मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि भारत ने रूस से तेल खरीद पूरी तरह कभी बंद नहीं की. फरवरी 2026 में भारत ने औसतन 1.04 मिलियन बैरल प्रतिदिन रूसी क्रूड आयात किया, हालांकि यह 2023 से 2025 के बीच देखे गए 1.6 से 1.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन के स्तर से कम है.
भारत के पास कितने दिन का रिजर्व?
सरकार का दावा है कि फिलहाल देश की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर कोई तत्काल संकट नहीं है. अधिकारियों के मुताबिक भारत के पास मौजूद क्रूड ऑयल और तैयार पेट्रोलियम उत्पादों का संयुक्त भंडार करीब 50 दिनों की मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त है. भारत के पास इस समय ऑनशोर स्टोरेज में लगभग 144 मिलियन बैरल क्रूड ऑयल मौजूद है, जो मौजूदा आयात स्तर के हिसाब से लगभग 30 दिनों की जरूरत पूरी कर सकता है. इसके अलावा भारत के स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व में भी इतनी क्षमता है कि वह करीब 9.5 दिन की नेट ऑयल इंपोर्ट की जरूरत पूरी कर सके. सरकारी तेल कंपनियों के पास मौजूद अतिरिक्त भंडारण क्षमता को जोड़ने पर देश के पास कुल मिलाकर लगभग 74 दिनों की नेट ऑयल इंपोर्ट के बराबर स्टोरेज क्षमता उपलब्ध है.
कच्चे तेल की संकट कर सकती है प्रभावित!
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही भारत वैकल्पिक स्रोतों से पर्याप्त कच्चा तेल हासिल कर ले, लेकिन इससे आर्थिक लागत बढ़ने की आशंका है. मिडिल ईस्ट संकट के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है. जहां पहले तेल की कीमत करीब 70 डॉलर प्रति बैरल थी, वहीं अब यह बढ़कर 92 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई है. इसके साथ ही एलएनजी (LNG) की कीमतें भी तेजी से बढ़ी हैं और अब यह लगभग 24-25 डॉलर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट तक पहुंच गई हैं, जो पहले के मुकाबले दोगुनी से भी ज्यादा है.
लोगों पर कितना और कैसे पड़ेगा असर?
ऊर्जा विश्लेषकों के अनुसार तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी भारत के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में 20 से 25 बेसिस पॉइंट तक का असर डाल सकती है. अगर सरकार कीमतों का बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डालती और टैक्स घटाकर राहत देती है, तो इसका असर राजकोषीय घाटे पर भी पड़ सकता है. इसके अलावा महंगे तेल से आयात बिल बढ़ने, चालू खाता घाटा बढ़ने और रुपये पर दबाव आने की भी आशंका है. फिलहाल भारत अपनी कुल तेल जरूरत का करीब आधा हिस्सा मिडिल ईस्ट के देशों- इराक, सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और कतर से आयात करता है. फरवरी 2026 में इन देशों से भारत को करीब 2.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन क्रूड ऑयल मिला, जो कुल आयात का लगभग 53 फीसदी था.
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