कौन सा असली हीरा, कौन सा लैब वाला? अब ‘डायमंड’ नाम पर नहीं चलेगा खेल, खरीदते समय चेक करें BIS का साइन
अब लैब में बनने वाले डायमंड्स को छुपाकर नहीं बेचा जा सकेगा. उन्हें हर जगह पूरे नाम के साथ बताना जरूरी होगा. यानी उन्हें अब ‘लैब में बना डायमंड’ या ‘लैब में तैयार किया गया डायमंड’कहा जाएगा. पहले अक्सर नेचुरल यानी असली डायमंड और लैब में बने डायमंड्स को एक जैसे नामों से बेचा जाता था, जिससे खरीदार को असली जानकारी नहीं मिल पाती थी. अब नए स्टैंडर्ड में यह फर्क बिल्कुल साफ कर दिया है.
Natural diamond Vs lab grown diamond: अगर आप डायमंड खरीदने की सोच रहे हैं तो अब पहले से ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने ऐसे नियम लागू कर दिए हैं जो यह तय करेंगे कि ज्वेलरी शॉप और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर किसे ‘डायमंड’ कहा जा सकता है और किसे नहीं. इस फैसले के पीछे सबसे बड़ा मकसद यह है कि कस्टमर कहीं भी भ्रम में न पड़ें और उन्हें अपनी खरीदारी के दौरान पूरी पारदर्शिता मिले.
काफी समय से जेम और ज्वेलरी इंडस्ट्री में यह शिकायत थी कि नेचरल डायमंड, लैब-ग्रोन डायमंड और उनके दूसरे ऑप्शन को अक्सर एक जैसे या मिलते-जुलते नामों से बेचा जाता था. यह समस्या खासकर ऑनलाइन बिक्री में ज्यादा थी, जहां ग्राहक नाम पढ़कर असली और लैब-ग्रोउन में फर्क ही नहीं समझ पाते थे. इसी गैप को भरने के लिए BIS अब नए स्टैंडर्ड लेकर आया है.
नए स्टैंडर्ड में क्या-क्या बदला?
BIS के नए नियमों का सबसे बड़ा असर इस बात पर पड़ा है कि अब किसे डायमंड कहा जाएगा और किसे नहीं. पहले अक्सर नेचुरल यानी असली डायमंड और लैब में बने डायमंड्स को एक जैसे नामों से बेचा जाता था, जिससे खरीदार को असली जानकारी नहीं मिल पाती थी. अब नए स्टैंडर्ड में यह फर्क बिल्कुल साफ कर दिया गया है. सबसे पहली और अहम बात यह है कि अब ‘डायमंड’ शब्द अकेले में सिर्फ नेचुरल डायमंड के लिए इस्तेमाल होगा. यानी अगर किसी ज्वेलर ने अपने बोर्ड या वेबसाइट पर केवल ‘डायमंड’ लिखा है, तो वह जमीन से निकला हुआ असली नेचरल डायमंड ही माना जाएगा. ज्वेलर चाहे तो इसके साथ ‘नेचुरल’, ‘रियल’ या ‘जेनुइन’ जैसे शब्द जोड़ सकता है, लेकिन यह जरूरी नहीं होगा.
दूसरी बड़ी बात यह है कि अब लैब में बनने वाले डायमंड्स को छुपाकर नहीं बेचा जा सकेगा. उन्हें हर जगह पूरे नाम के साथ बताना जरूरी होगा. यानी उन्हें अब ‘लैब में बना डायमंड’ या ‘लैब में तैयार किया गया डायमंड’कहा जाएगा. छोटे नाम जैसे LGD, lab-grown, lab-diamond या इसी तरह के शॉर्टकट शब्द अब मान्य नहीं हैं, क्योंकि ऐसे शब्दों से लोग अक्सर भ्रम में पड़ जाते थे. इन बदलावों का मकसद यही है कि ग्राहक जब डायमंड खरीदे तो उसे साफ-साफ पता रहे कि वह क्या लेने जा रहा है — असली, यानी प्रकृति से मिलने वाला डायमंड या फिर लैब में बनाया गया डायमंड. इस तरह न तो ग्राहक धोखे में पड़ेगा और न ही ज्वेलर्स पर गलत जानकारी देने के आरोप लगेंगे.
भ्रम फैलाने वाली भाषा पर भी लगाम
नए नियम केवल नामों तक सीमित नहीं हैं. लैब-ग्रोन डायमंड्स को बेचने के लिए अब ऐसी भाषा भी इस्तेमाल नहीं की जा सकेगी जिससे वे प्रकृति से आने वाले या ज्यादा ‘शुद्ध’ दिखें. यानी ‘नेचुरल’, ‘प्योर’, ‘अर्थ-फ्रेंडली’ और ‘cultured’ जैसे शब्द अब बैन की कैटेगरी में हैं. इसके अलावा ब्रांड नाम अकेले इस्तेमाल करके बिना ‘laboratory-grown’ लिखे बेचने को भी गलत माना जाएगा. इस तरह ग्राहक गलतफहमी में नहीं फंसेंगे.
इंडस्ट्री का क्या कहना है?
Natural Diamond Council (NDC) की मैनेजिंग डायरेक्टर रिचा सिंह का कहना है कि यह स्टैंडर्ड ग्राहकों में मौजूद कन्फ्यूजन दूर करेगा. उनके मुताबिक, डायमंड खरीदते समय ग्राहक को साफ-साफ पता होना चाहिए कि वो क्या खरीद रहा है, ईमानदारी से और बिना किसी भ्रम के. इससे एक तरफ ग्राहक का भरोसा बढ़ेगा तो दूसरी तरफ नेचरल डायमंड की वैल्यू भी सुरक्षित रहेगी.
ग्राहकों के लिए इसका फायदा क्या?
कुल मिलाकर ये नियम सिर्फ कागजी बदलाव नहीं हैं, बल्कि ऐसा सिस्टम बना रहे हैं जिससे ग्राहक गलतफहमी से बच सके. अब आप जब भी ऑनलाइन या ऑफलाइन डायमंड खरीदेंगे तो यह समझना आसान होगा कि सामने रखा हुआ डायमंड नेचुरल है या लैब-ग्रोउन. इससे आप सही कीमत चुकाएंगे और धोखे से बचेंगे. और यही इस नए नियम की सबसे बड़ी जीत है.
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