सोना -चांदी बेचने से पहले जरूर जान लें टैक्स नियम, नहीं तो होगा सीधा नुकसान; समय से पहले बेचा तो लगेगा टैक्स का झटका

सोना और चांदी में निवेश करते समय टैक्स नियम समझना बेहद जरूरी है. टैक्स इस बात पर निर्भर करता है कि निवेश किस तरह का है और कितने समय तक रखा गया है. तय अवधि से पहले बिक्री करने पर ज्यादा टैक्स देना पड़ सकता है.

सोना और चांदी पर टैक्स. Image Credit: freepik

Gold- Silver tax rules: भारत में सोना और चांदी केवल गहने नहीं बल्कि निवेश का भरोसेमंद जरिया भी माने जाते हैं. लेकिन बहुत से लोग इन्हें बेचते समय टैक्स के नियमों को नजरअंदाज कर देते हैं. सही समय पर बिक्री न करने से हजारों रुपये का अतिरिक्त टैक्स लग सकता है. टैक्स इस बात पर निर्भर करता है कि आपने सोना या चांदी कितने समय तक रखी और किस तरीके से निवेश किया. एक दिन का फर्क भी आपके फायदे को नुकसान में बदल सकता है. इसलिए निवेश से पहले और बेचने से पहले टैक्स नियम समझना बेहद जरूरी है.

क्या है सबसे अहम बात

सोना और चांदी पर टैक्स का फैसला होल्डिंग पीरियड से होता है. अगर फिजिकल या डिजिटल गोल्ड और सिल्वर 24 महीने से कम समय में बेचे जाते हैं तो मुनाफा शॉर्ट टर्म माना जाता है. ऐसे में टैक्स आपकी इनकम स्लैब के अनुसार लगता है.24 महीने से ज्यादा रखने पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन लगता है जिस पर कम दर से टैक्स देना होता है. यही नियम टैक्स बचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है.

ETF और म्यूचुअल फंड में नियम अलग

गोल्ड और सिल्वर ETF या म्यूचुअल फंड में होल्डिंग पीरियड 12 महीने का होता है. 12 महीने से पहले बेचने पर पूरा मुनाफा आपकी इनकम में जुड़ जाता है. 12 महीने से ज्यादा रखने पर फ्लैट टैक्स दर लागू होती है. बहुत से निवेशक इस फर्क को नहीं समझते और जल्दी रिडीम कर देते हैं. यही गलती टैक्स का बोझ बढ़ा देती है.

सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड में खास फायदा

सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड में निवेश करने वालों को दोहरा फायदा मिलता है. एक तो हर साल ब्याज मिलता है और दूसरा सोने की कीमत बढ़ने का लाभ. ब्याज पर टैक्स लगता है लेकिन 8 साल पूरे होने पर रिडेम्पशन पर कैपिटल गेन टैक्स नहीं देना पड़ता. अगर बॉन्ड पहले बेचा जाता है तो होल्डिंग के हिसाब से टैक्स तय होता है. लंबी अवधि के निवेशकों के लिए यह बेहतर विकल्प माना जाता है.

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बेचने से कैसे बढ़ता है टैक्स

अगर आपने सोना या चांदी तय अवधि से एक दिन पहले बेच दी तो वह शॉर्ट टर्म मानी जाएगी. ऐसे में कम टैक्स की जगह ज्यादा टैक्स देना पड़ सकता है. उदाहरण के तौर पर 2 लाख रुपये के मुनाफे पर टैक्स का अंतर कई हजार रुपये तक पहुंच सकता है. इसलिए बिक्री की तारीख तय करते समय बेहद सावधानी जरूरी है. सही योजना से आप आसानी से टैक्स बचा सकते हैं.