लेबर कोड से कंपनियों पर बढ़ेगा बोझ, 5-12 % तक बढ़ सकता है खर्च, MSME और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर होगा ज्यादा असर
नए लेबर कोड लागू होने से कंपनियों का सैलरी खर्च 5 से 12 फीसदी तक बढ़ सकता है. ग्रेच्युटी ओवरटाइम बोनस और लीव एनकैशमेंट अब नए वेज डेफिनेशन से जुड़ने वाले हैं जिससे MSME और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर ज्यादा असर पडे़गा. कई कम्पनियों को पे स्ट्रक्चर और हायरिंग मॉडल में बदलाव करना होगा.
Labor Code: नए लेबर कोड लागू होने के बाद देश की कंपनियों को सैलरी और मैनपावर पर ज्यादा खर्च करना पड़ेगा. ग्रेच्युटी ओवरटाइम बोनस और लीव एनकैशमेंट जैसे बेनेफिट अब नए वेज डेफिनेशन के आधार पर तय होंगे, जिससे कंपनियों का वेज बिल 5 से 10 फीसदी तक बढ़ सकता है. जिन कंपनियों में वेरीएबल पे और अलाउंसेस ज्यादा हैं, वहां लागत में और भी बढ़ोतरी संभव है. खासकर मैन्युफैक्चरिंग और MSME सेक्टर पर इसका असर ज्यादा माना जा रहा है. सरकार का कहना है कि कंप्लायंस बोझ कम होने से अतिरिक्त खर्च किसी हद तक संतुलित रह सकता है.
बढ़ेगा कंपनियों का सैलरी आउटगो
कई कंपनियां नए लेबर कोड के अनुसार अपनी HR और कंपेनसेशन पॉलिसी में बदलाव कर रही हैं. जानकारों का मानना है कि ऐसे मामलों में मैनपावर कॉस्ट में 5 से 10 फीसदी तक बढ़ोतरी सामान्य है. हालांकि प्रभाव की मात्रा इंडस्ट्री स्ट्रक्चर और पे डिजाइन पर निर्भर करेगी.
MSME और लेबर आधारित कंपनियों पर असर तेज
ग्रेच्युटी बोनस और ओवरटाइम जैसे बेनेफिट अब सीधे वेज डेफिनेशन से जुड़े होंगे, जिससे लेबर आधारित कंपनियों पर लागत का दबाव ज्यादा पड़ेगा. विशेष रूप से मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स MSME और वे कंपनियां जहां पे स्ट्रक्चर असंतुलित है, उन्हें अधिक खर्च वहन करना पड़ सकता है.
कर्मचारियों को मिलेगा लाभ
नए लेबर कोड में स्पष्ट है कि कंपनियां कर्मचारियों की वेज में कटौती नहीं कर सकतीं. यानी कर्मचारियों को इन बदलावों से फायदा होना तय है. हालांकि बढ़ोतरी कितनी होगी यह सर्विस पीरियड और पे स्ट्रक्चर पर निर्भर करेगा. कंपनियां अब कॉन्ट्रैक्ट और फिक्स्ड टर्म हायरिंग को संतुलित करने पर भी ध्यान दे रही हैं.
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ग्रेच्युटी में सबसे बड़ा बदलाव संभव
जानकारों का कहना है कि यदि कंपेनसेशन में 15 फीसदी तक पेमेंट इन काइंड शामिल है तो उसे भी वेज माना जाएगा. इससे ग्रेच्युटी कैलकुलेशन पर सर्वाधिक प्रभाव देखने को मिल सकता है. वेज बिल 5 से 12 फीसदी तक बढ़ सकता है और जहां अलाउंसेस या कॉन्ट्रैक्ट आधारित वर्कफोर्स ज्यादा है, वहां 10 से 15 फीसदी तक या उससे अधिक वृद्धि संभव है.
सरकार का तर्क
सरकार का मानना है कि नए कोड लागू होने के बाद कंप्लायंस बोझ कम होगा, जिससे ओवरटाइम हेल्थ चेकअप और अन्य खर्चों का असर काफी हद तक संतुलित किया जा सकेगा. सरकार का दावा है कि ये बदलाव कर्मचारियों के हित में हैं और लंबी अवधि में इंडस्ट्री को भी लाभ पहुंचाएंगे.
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