अमेरिका के ग्रीनलैंड टैरिफ से यूरोप में बेचैनी, क्यों UK-जर्मनी पर हैं सबसे ज्यादा खतरा
अमेरिका की नई व्यापार नीति को लेकर यूरोप में बेचैनी बढ़ती दिख रही है. कुछ बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की अमेरिकी बाजार पर निर्भरता अब जोखिम बनती जा रही है, जबकि कुछ देशों ने समय रहते अपने निर्यात को विविध बनाया है. आने वाले फैसले यह तय कर सकते हैं कि किसे झटका लगेगा और कौन बचा रहेगा.
अमेरिका की तरफ से ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए सख्त संकेत अब सिर्फ कूटनीतिक बयान नहीं रह गए हैं, बल्कि उनका सीधा असर वैश्विक व्यापार पर दिखने लगा है. Donald Trump ने हाल ही में उन देशों पर टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है, जो अमेरिका की ग्रीनलैंड से जुड़ी रणनीति का विरोध कर रहे हैं. इस धमकी के बाद यह साफ होता जा रहा है कि यूरोप की कुछ बड़ी अर्थव्यवस्थाएं, खासकर ब्रिटेन और जर्मनी, अमेरिकी बाजार पर अपनी अधिक निर्भरता के कारण सबसे ज्यादा दबाव में आ सकती हैं.
अमेरिकी बाजार पर किसकी निर्भरता सबसे ज्यादा?
2024 में ब्रिटेन के कुल निर्यात का 14.1 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका गया, जबकि जर्मनी के लिए यह आंकड़ा 10.4 प्रतिशत रहा. यूरोप में यह सबसे ऊंचे स्तरों में से हैं. चिंता की बात यह है कि यह निर्भरता नई नहीं है. दो दशक पहले भी ब्रिटेन का करीब 15–16 प्रतिशत निर्यात अमेरिका पर टिका हुआ था और जर्मनी का हिस्सा भी करीब 10 प्रतिशत के आसपास था. यानी समय के साथ व्यापार संरचना में बहुत बड़ा बदलाव नहीं हुआ.
ट्रंप की टैरिफ चेतावनी से क्यों बढ़ी चिंता?
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर चेतावनी दी है कि डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, नीदरलैंड्स और फिनलैंड जैसे देशों पर 1 फरवरी से 10 प्रतिशत टैरिफ लगाया जाएगा, जो 1 जून से बढ़कर 25 प्रतिशत तक पहुंच सकता है. ऐसे में जिन देशों का निर्यात बड़ी मात्रा में अमेरिका पर निर्भर है, उनके लिए झटका ज्यादा तेज हो सकता है.
फ्रांस और नार्डिक देश की स्थिति कहां खड़ी है?
फ्रांस की अमेरिकी बाजार पर निर्भरता ब्रिटेन और जर्मनी से कम जरूर है, लेकिन नजरअंदाज करने लायक नहीं. 2024 में फ्रांस के कुल निर्यात का 8.6 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका गया. इसका मतलब यह है कि अगर टैरिफ बढ़ते हैं, तो फ्रांसीसी कंपनियों पर भी इसका असर पड़ेगा, खासकर उन सेक्टरों में जहां अमेरिका एक बड़ा खरीदार है.
इसके उलट नॉर्डिक देशों की तस्वीर अलग दिखती है. स्वीडन, फिनलैंड और नॉर्वे ने बीते 20 वर्षों में अपने निर्यात बाजारों में लगातार विविधता बढ़ाई है. स्वीडन का अमेरिका को होने वाला निर्यात 2000 के शुरुआती वर्षों में 11 प्रतिशत से ज्यादा था, जो अब 9 प्रतिशत से नीचे आ चुका है. नॉर्वे ने तो और तेज बदलाव किया है, 2002 में जहां उसका अमेरिकी एक्सपोजर करीब 9 प्रतिशत था, वहीं 2024 में यह घटकर 3.4 प्रतिशत रह गया.
उत्पाद आधारित जोखिम भी अहम
सिर्फ कुल निर्यात हिस्सेदारी ही नहीं, बल्कि उत्पादों की प्रकृति भी जोखिम तय करती है. फ्रांस के कई ऐसे उत्पाद हैं जिनमें अमेरिका वैश्विक मांग का एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा रखता है. उदाहरण के लिए, फ्रांस के टर्बाइन निर्यात का करीब आधा हिस्सा अमेरिका जाता है. ब्रिटेन में भी कुछ खास औद्योगिक उत्पाद ऐसे हैं, जिनका 40 प्रतिशत तक निर्यात अमेरिकी बाजार पर निर्भर है. ऐसे मामलों में कंपनियों के लिए अचानक वैकल्पिक बाजार ढूंढना मुश्किल हो जाता है.
| देश | वे निर्यात जिनमें अमेरिकी हिस्सेदारी वैश्विक व्यापार में 25% से ज्यादा | वे निर्यात जिनमें अमेरिकी हिस्सेदारी वैश्विक व्यापार में 33% से ज्यादा | अमेरिका को कुल निर्यात |
|---|---|---|---|
| डेनमार्क | 1.0 | 0.4 | 7.2 |
| फिनलैंड | 1.0 | 0.8 | 7.2 |
| फ्रांस | 5.7 | 5.0 | 55.5 |
| जर्मनी | 3.1 | 1.2 | 170.0 |
| नीदरलैंड्स | 1.8 | 0.7 | 38.0 |
| नॉर्वे | 0.6 | 0.6 | 5.8 |
| स्वीडन | 1.6 | 1.3 | 17.1 |
| यूनाइटेड किंगडम | 5.1 | 2.9 | 71.8 |
यह टेबल दिखाती है कि किन देशों के निर्यात में अमेरिकी बाजार की हिस्सेदारी बहुत ज्यादा केंद्रित है. ऐसे देशों पर अमेरिका की तरफ से टैरिफ बढ़ने का असर अपेक्षाकृत ज्यादा पड़ सकता है.
जर्मनी की स्थिति थोड़ी संतुलित
जर्मनी का कुल अमेरिकी निर्यात भले ही करीब 170 अरब डॉलर का हो, लेकिन जिन उत्पादों में अमेरिका वैश्विक मांग का 25 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा रखता है, उनकी कीमत करीब 3 अरब डॉलर ही है. इसका मतलब यह है कि लंबे समय में जर्मन कंपनियों के पास अपने निर्यात को दूसरे बाजारों की तरफ मोड़ने की गुंजाइश फ्रांस के मुकाबले ज्यादा हो सकती है.
यह भी पढ़ें: अगर ट्रंप ग्रीनलैंड खरीदना चाहें, तो कितना चुकाना होगा पैसा और अमेरिका पर कितना पड़ेगा बोझ
अमेरिका की टैरिफ चेतावनी ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिकी बाजार पर ज्यादा निर्भरता अब एक बड़ा जोखिम बन चुकी है. जहां नॉर्डिक देशों ने समय रहते अपने निर्यात को विविध बनाया, वहीं ब्रिटेन, जर्मनी और कुछ हद तक फ्रांस अब ज्यादा दबाव में नजर आ रहे हैं. अगर टैरिफ वाकई लागू होते हैं, तो इसका असर यूरोप की अर्थव्यवस्था में साफ तौर पर दिख सकता है.
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