अगर ट्रंप ग्रीनलैंड खरीदना चाहें, तो कितना चुकाना होगा पैसा और अमेरिका पर कितना पड़ेगा बोझ
एक भू-राजनीतिक मुद्दा इन दिनों वैश्विक चर्चा में है, जिसने देशों के बीच तनाव बढ़ा दिया है. सवाल यह है कि किसी जगह की कीमत कैसे तय होती है. सिर्फ आर्थिक आंकड़ों से या उसकी रणनीतिक और संसाधन क्षमता से. इसी बहस ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बेचैनी पैदा की है.
Greenland Valuvation: अगर दुनिया के सबसे बड़े द्वीप पर ‘For Sale’ का बैनर लग जाए, तो उसकी कीमत क्या होगी? यही सवाल इस वक्त वैश्विक राजनीति के केंद्र में है. Donald Trump खुले तौर पर कह चुके हैं कि अमेरिका को ग्रीनलैंड चाहिए. अब यह बहस सिर्फ कूटनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रही. तमाम मीडिया रिपोर्ट्स के मुकाबले अमेरिकी प्रशासन के भीतर ग्रीनलैंड को खरीदने को लेकर आंतरिक आकलन किए जा चुके हैं. अब यह अनुमान लगना शुरु हो गया है कि अगर यह सौदा कभी हुआ, तो अमेरिका को सैकड़ों अरब डॉलर चुकाने पड़ सकते हैं. ऐसे में सबके मन में सवाल साफ है ग्रीनलैंड की कीमत आखिर कितनी है, और ट्रंप इसके लिए इतना जोर क्यों लगा रहे हैं?
क्यों बढ़ रही है अमेरिका की दिलचस्पी
ग्रीनलैंड कोई स्वतंत्र देश नहीं है, बल्कि यह Denmark के अधीन एक अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है. डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों की सरकारें साफ कर चुकी हैं कि यह इलाका बिक्री के लिए नहीं है. इसके बावजूद ट्रंप का रुख आक्रामक बना हुआ है.
अमेरिका की दिलचस्पी दो अहम कारणों से है. पहला, ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति. यह उत्तर अमेरिका और यूरोप के बीच स्थित है और यहां मौजूद पिटुफिक स्पेस बेस अमेरिका की मिसाइल चेतावनी और अंतरिक्ष निगरानी प्रणाली का अहम हिस्सा है. ट्रंप का तर्क है कि अगर अमेरिका ने कदम नहीं उठाया, तो Russia या China इस इलाके में अपना प्रभाव बढ़ा सकते हैं.
आर्थिक रूप से कितना मजबूत है ग्रीनलैंड?
अगर सिर्फ अर्थव्यवस्था की बात करें, तो ग्रीनलैंड बेहद छोटा बाजार है. यहां की आबादी करीब 56 हजार है और अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से मछली उद्योग पर निर्भर है. World Bank के मुताबिक ग्रीनलैंड की जीडीपी करीब 3.5 से 4 अरब डॉलर के बीच है. डेनमार्क हर साल वहां लगभग 3.9 अरब डेनिश क्रोनर की आर्थिक मदद देता है. ऐसे में सिर्फ जीडीपी के आधार पर ग्रीनलैंड की कीमत तय करना बेमानी लगता है.
बर्फ के नीचे छिपे दुर्लभ खनिज
ग्रीनलैंड की असली कीमत उसके प्राकृतिक संसाधनों में छिपी है. US Geological Survey का अनुमान है कि यहां करीब 15 लाख टन दुर्लभ खनिज मौजूद हैं. वहीं GEUS के अनुसार यह आंकड़ा 3.61 करोड़ टन तक हो सकता है. इन खनिजों का इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहन, मोबाइल फोन, पवन टरबाइन और आधुनिक हथियार प्रणालियों में होता है. इस वक्त यूरोप और अमेरिका दोनों ही चीन पर निर्भर हैं, जो वैश्विक दुर्लभ खनिज उत्पादन का बड़ा हिस्सा नियंत्रित करता है.
तेल और गैस का भी खेल
ग्रीनलैंड सिर्फ खनिजों तक सीमित नहीं है. पुराने आकलनों के मुताबिक, इसके आसपास के समुद्री इलाकों में 17.5 अरब बैरल तेल और 148 ट्रिलियन क्यूबिक फीट प्राकृतिक गैस हो सकती है. हालांकि 2021 में नए तेल ड्रिलिंग पर रोक लगा दी गई थी, लेकिन रणनीतिक नजरिए से ये आंकड़े अमेरिका के लिए बेहद आकर्षक हैं.
ग्रीनलैंड का वैल्यूएशन इतना अलग-अलग क्यों?
ग्रीनलैंड की कीमत को लेकर अनुमानों में भारी अंतर है. अमेरिकी थिंक टैंक American Action Forum के मुताबिक, व्यावहारिक रूप से निकाले जा सकने वाले संसाधनों की कीमत करीब 186 अरब डॉलर है. The Economist प्राइवेट सेक्टर की जीडीपी और संभावित टैक्स रेवेन्यू के हावले से आंकड़ा 50 अरब डॉलर मानते है. Financial Times के अनुसार यह आंकड़ा 1.1 ट्रिलियन डॉलर तक जा सकता है, जबकि The New York Times ने 12.5 से 77 अरब डॉलर के बीच का अनुमान दिया है.
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हालांकि NBC न्यूज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी नीति से जुड़े जानकारों ने कहा है कि ग्रीनलैंड को खरीदने की संभावित कीमत करीब 700 अरब डॉलर तक हो सकती है. ये यह रकम अमेरिका के सालाना रक्षा बजट के आधे से भी ज्यादा बैठती है. यह आकलन अमेरिकी विद्वानों और पूर्व अधिकारियों ने मिलकर किया है.
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