दुनिया में तेल संकट के बीच चीन क्यों है बेफिक्र! ‘टीपॉट रिफाइनरी’ कैसे बन गई सबसे बड़ी ताकत?
जहां दुनिया तेल संकट और बढ़ती कीमतों से जूझ रही है, वहीं एक देश अपेक्षाकृत शांत नजर आ रहा है. इसकी वजह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं, बल्कि सालों पहले बनाई गई रणनीति है, जो अब संकट के समय काम आ रही है.
दुनिया इस वक्त तेल को लेकर असमंजस में है. होरमुज स्ट्रेट पर बढ़ते तनाव ने सप्लाई चेन को झटका दिया है, कीमतें 100 डॉलर के पार पहुंच गई हैं और कई देशों में ईंधन को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है. लेकिन इसी माहौल में चीन दूसरों के मुकाबले शांत नजर आ रहा है. न तो वहां वैसी घबराहट दिख रही है, न ही तत्काल संकट के संकेत. यही सवाल सबसे बड़ा है: जब दुनिया भर में संकट के बादल मंडरा रहे हैं, तो चीन में धूप कैसे खिली है?
पहले से की गई तैयारी का असर
चीन की यह स्थिति कोई संयोग या एक दिन की तैयारी का परिणाम नहीं है. उसने पिछले कई वर्षों में चुपचाप तेल भंडारण पर खास ध्यान दिया. जब वैश्विक बाजार में तेल सस्ता था, तब चीन ने बड़े पैमाने पर खरीदारी कर अपने रणनीतिक भंडार को मजबूत किया. 2026 की शुरुआत तक चीन ने करीब 1.2 अरब बैरल का रणनीतिक तेल भंडार बना लिया था. यह स्टॉक इतना है कि चीन करीब 109 दिनों तक समुद्री आयात के बिना भी काम चला सकता है. यही वजह है कि आज जब सप्लाई पर दबाव है, तब भी चीन के पास अपनी जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त स्टॉक मौजूद है.
‘टीपॉट रिफाइनरी’ का खास रोल
इस पूरी कहानी में चीन की छोटी निजी रिफाइनरियों की अहम भूमिका रही है. इन्हें आम तौर पर ‘टीपॉट रिफाइनरी’ कहा जाता है. ये रिफाइनरी बड़ी सरकारी कंपनियों की तरह सख्त नियमों में बंधी नहीं होतीं. ये चीन की कुल तेल प्रोसेसिंग क्षमता का करीब 25% हिस्सा संभालती हैं.
यही वजह है कि जब बाकी देश प्रतिबंधों के वजह से दूरी बनाए हुए थे तब इन्होंने ईरान, रूस और वेनेजुएला जैसे देशों से सस्ता तेल खरीदा. कम कीमत पर खरीदा गया यही तेल आज चीन के लिए सुरक्षा कवच बना हुआ है.
अब धीरे-धीरे दिखने लगे संकेत
हालांकि यह स्थिति पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. Al Jazeera से बातचीत में क्रूड ऑयल मामले के जानकार म्यू श्यू ने कहा, जैसे-जैसे तेल महंगा हो रहा है, वैसे-वैसे इन छोटी रिफाइनरियों के लिए नया तेल खरीदना मुश्किल होता जा रहा है. उनका मुनाफा घट रहा है और कई जगहों पर खरीदारी धीमी हो गई है. मार्च 2026 में चीन का समुद्री तेल आयात घटकर 10.19 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया, जो फरवरी में 11.51 मिलियन बैरल प्रतिदिन था.
विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के महीनों में चीन के तेल आयात में कमी के संकेत मिले हैं और अगर यही स्थिति जारी रही, तो आने वाले समय में असर साफ दिख सकता है. इसी बीच रूस से चीन को जाने वाले तेल में 40.9% की बढ़ोतरी हुई है, जो यह दिखाता है कि चीन अब विकल्प तलाश रहा है.
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चीन ने अपनी रणनीति से मौजूदा संकट को कुछ हद तक टाल दिया है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है. अगर पश्चिम एशिया का तनाव लंबा खिंचता है, तो चीन को भी बढ़ती कीमतों और सप्लाई दबाव का सामना करना पड़ेगा.
फिलहाल चीन तूफान के बीच शांत दिख रहा है, लेकिन यह शांति कितनी देर टिकेगी, यह आने वाले समय में ही साफ होगा.
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