रूस के यू-टर्न से बढ़ेगी डॉलर की वैल्यू? इस फैसले से ढह सकता है सोने का भाव, जानें क्यों सहमे निवेशक

रिकॉर्ड ऊंचाई छूने के बाद सोने की कीमतों में गिरावट का दौर शुरू हो गया है. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में रूस के फिर से डॉलर आधारित व्यापार प्रणाली अपनाने की संभावना जताई गई है, जिससे डि-डॉलराइजेशन की कोशिशों और सोने की मांग पर असर पड़ सकता है. जानें क्या है पूरा मामला विस्तार में.

सोना और रूस का यू-टर्न Image Credit: @AI

Gold Price May Fall amid Russia U-Turn: 2025 में शानदार तेजी दिखाने के बाद सोने की कीमतों में अब कमजोरी के संकेत नजर आने लगे हैं. जनवरी 2026 में नई ऊंचाई छूने के बाद MCX पर सोना अपने रिकॉर्ड स्तर से काफी नीचे आ चुका है. इसी बीच ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट ने बाजार की चिंताओं को और बढ़ा दिया है, जिसमें दावा किया गया है कि रूस फिर से अमेरिकी डॉलर में व्यापारिक लेनदेन की ओर लौटने पर विचार कर रहा है. अगर ऐसा होता है तो सोने की हालिया तेजी को बड़ा झटका लग सकता है.

MCX पर कहां है सोना?

मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर सोना जनवरी में लगभग 1,80,779 रुपये प्रति 10 ग्राम के हाई पर पहुंचा था, लेकिन पिछले सप्ताह शुक्रवार, 13 फरवरी को यह गिरकर करीब 1,56,200 रुपये पर बंद हुआ, यानी अपने उच्चतम स्तर से लगभग 13.5 फीसदी नीचे. अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कमजोरी दिखी, जहां COMEX पर गोल्ड अपने रिकॉर्ड हाई से करीब 10 फीसदी से ज्यादा नीचे आ चुका है.

रिपोर्ट के किस बात ने बढ़ाई टेंशन?

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, क्रेमलिन के एक इंटरनल डॉक्यूमेंट में रूस और अमेरिका के बीच संभावित आर्थिक सहयोग की संभावना जताई गई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि रूस अमेरिकी डॉलर बेस्ड ट्रेड पेमेंट सिस्टम में वापसी पर विचार कर सकता है. यह कदम BRICS देशों की उस रणनीति के विपरीत माना जा रहा है, जिसमें वे डॉलर पर निर्भरता कम कर सोने और स्थानीय मुद्राओं को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे थे.

कैसे फीकी पड़ सकती है सोने की चमक?

BRICS ग्रुप में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं. ये ग्रुप पिछले कुछ वर्षों से सोने का भंडार बढ़ाकर डॉलर आधारित व्यापार व्यवस्था से दूरी बनाने की दिशा में काम कर रहा है. वैश्विक व्यापार में इन देशों की हिस्सेदारी लगभग 30 फीसदी तक पहुंच चुकी है, इसलिए इनके मौद्रिक फैसलों का वैश्विक असर पड़ता है. अगर रूस वास्तव में डॉलर की ओर लौटता है, तो डि-डॉलराइजेशन की पूरी प्रक्रिया कमजोर पड़ सकती है और इससे सोने की मांग घटने की आशंका है. रूस और चीन इस रणनीति में अग्रणी रहे हैं.

दोनों देश बड़े पैमाने पर सोने का प्रोडक्शन और भंडारण करते रहे हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार से भी खरीद जारी है. हाल के वर्षों में BRICS देशों के केंद्रीय बैंकों ने वैश्विक सोना खरीद का बड़ा हिस्सा अपने नाम किया है. लेकिन अगर डॉलर फिर से प्रमुख माध्यम बनता है, तो सोना एक वैकल्पिक सुरक्षित संपत्ति के रूप में अपनी चमक खो सकता है. हालिया आर्थिक संकेतकों ने भी सोने पर दबाव बढ़ाया है. मजबूत अमेरिकी श्रम आंकड़ों और महंगाई के संकेतों के कारण फेडरल रिजर्व की ओर से जल्द ब्याज दर कटौती की उम्मीदें कम हुई हैं. इससे डॉलर को सपोर्ट मिला है और सोने की आकर्षण क्षमता घट सकती है.

क्या है एक्सपर्ट्स की राय?

कोटक सिक्योरिटीज की AVP कमोडिटी रिसर्च कायनात चैनवाला के अनुसार, हाल के दिनों में सोना और चांदी दोनों में तेज गिरावट देखी गई. उन्होंने कहा कि मजबूत अमेरिकी रोजगार आंकड़ों के बाद फेड की नीतियों में ढील की उम्मीद कमजोर हुई, जिससे बुलियन पर दबाव बढ़ा. साथ ही रूस-यूक्रेन तनाव में नरमी और अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ता की संभावनाओं ने सुरक्षित निवेश की मांग घटा दी. हालांकि हालिया गिरावट के बाद कीमतों में कुछ रिकवरी आई है, लेकिन आगे की दिशा काफी हद तक अमेरिकी महंगाई के आंकड़ों और फेड के रुख पर निर्भर करेगी.

संभव है और गिरावट?

अगर मुद्रास्फीति ऊंची बनी रहती है और श्रम बाजार मजबूत रहता है, तो ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं, जिससे सोने पर दबाव बना रह सकता है. इससे इतर, अगर जियो पॉलिटिकिल टेंशन कम होता है, डॉलर मजबूत रहता है और वैश्विक केंद्रीय बैंक सोने की खरीद धीमी करते हैं, तो आने वाले समय में सोने की कीमतों में और गिरावट संभव है. हालांकि अनिश्चितता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, इसलिए बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है. फिलहाल संकेत यही हैं कि रिकॉर्ड तेजी के बाद सोना एक कठिन दौर में प्रवेश कर सकता है.

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