क्या अलॉटमेंट लेटर से बनता है कैपिटल एसेट? ITAT के एक फैसले से समझिए टैक्स की हर परत
अक्सर प्रॉपर्टी बुकिंग के समय बिल्डर सिर्फ अलॉटमेंट लेटर देता है और रजिस्टर्ड एग्रीमेंट सालों तक नहीं बनता. ऐसे में अगर सौदा रद्द हो जाए और बिल्डर ज्यादा पैसा लौटाए, तो क्या वह रकम कैपिटल गेन मानी जाएगी या अन्य स्रोतों से आय? ITAT के एक अहम फैसले ने इस उलझन को साफ किया है.
जब आप कोई प्रॉपर्टी बुक करते हैं, तो आमतौर पर बिल्डर आपको एक अलॉटमेंट लेटर जारी करता है. कई बार एग्रीमेंट टू सेल तुरंत नहीं बनता. कुछ मामलों में तो यह एग्रीमेंट कई साल बाद जाकर भी नहीं बन पाता. ऐसा भी हो सकता है कि किसी कारण से यह सौदा रद्द हो जाए और बिल्डर आपको आपकी दी हुई रकम से ज्यादा पैसा लौटा दे.
अब सवाल यह उठता है कि बिल्डर से मिला यह अतिरिक्त पैसा क्या टैक्स के दायरे में आएगा? अगर हां, तो इसे किस हेड में टैक्स किया जाएगा “Income from Other Sources” यानी अन्य स्रोतों से आय के तहत या “Capital Gains” यानी पूंजीगत लाभ के तहत?
इन सभी सवालों का जवाब आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) ने साल 2020 में अपने एक फैसले में दिया. आइए, उस फैसले के जरिए इन सवालों के जवाब समझते हैं.
केस के तथ्य
एक टैक्सपेयर, मुकेश सोहनराज वर्धन ने एक फ्लैट बुक किया था, जिसकी कुल कीमत 30 लाख रुपये थी. यह रकम उन्होंने 7 जनवरी 2005 को दो अलग-अलग चेक के जरिए चुकाई. इसके बाद बिल्डर ने 10 जनवरी 2005 को उन्हें एक अलॉटमेंट लेटर जारी किया.
हालांकि, इस फ्लैट के लिए कभी भी कोई औपचारिक एग्रीमेंट नहीं किया गया. बाद में 12 सितंबर 2011 को इस अलॉटमेंट लेटर के तहत मिले अधिकारों को सरेंडर कर दिया गया और बिल्डर ने टैक्सपेयर को 48.75 लाख रुपये का भुगतान किया.
टैक्सपेयर को जो अतिरिक्त रकम मिली (यानी 18.75 लाख रुपये), उसने उसे कैपिटल गेन माना और उस पर इनकम टैक्स एक्ट की धारा 54 के तहत छूट का दावा किया. उनका कहना था कि उन्होंने 101.95 लाख रुपये में एक रेजिडेंशियल फ्लैट खरीदा है.
असेसमेंट के दौरान विवाद
असेसमेंट के समय इनकम टैक्स ऑफिसर ने इस अतिरिक्त रकम को कैपिटल गेन मानने से इनकार कर दिया. ऑफिसर ने इसे “Income from Other Sources” के तहत टैक्स करार दिया. उनका तर्क था कि इस सौदे के लिए कभी कोई औपचारिक खरीद-बिक्री का एग्रीमेंट किया ही नहीं गया.
इसके बाद टैक्सपेयर ने Commissioner of Income Tax (Appeals) [CIT(A)] के पास अपील की. लेकिन CIT(A) ने भी टैक्सपेयर की अपील खारिज कर दी. उनका कहना था कि अलॉटमेंट लेटर के बाद जो एग्रीमेंट होना था, वह पेश नहीं किया गया.
CIT(A) ने अलॉटमेंट लेटर में कुछ कमियां भी बताईं और यह निष्कर्ष निकाला कि बिल्डर द्वारा जारी किया गया यह अलॉटमेंट लेटर वैध नहीं है. इसलिए, उनके अनुसार, इस अलॉटमेंट लेटर से कोई कैपिटल एसेट नहीं बनता.
मामला ITAT तक पहुंचा
आखिरकार यह मामला ITAT मुंबई के सामने पहुंचा. यहां ट्रिब्यूनल को यह तय करना था कि जब अलॉटमेंट लेटर के अनुसार कोई एग्रीमेंट कभी किया ही नहीं गया, तो क्या सिर्फ अलॉटमेंट लेटर के आधार पर ही कोई अधिकार पैदा होता है या नहीं.
ट्रिब्यूनल के निष्कर्ष
सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल ने कहा कि इनकम टैक्स एक्ट की धारा 2(14) में “Capital Asset” की जो परिभाषा दी गई है, उसमें किसी भी तरह के ऐसे अधिकार शामिल हो सकते हैं जो किसी अचल संपत्ति (Immovable Property) से जुड़े हों.
ट्रिब्यूनल के अनुसार, किसी अचल संपत्ति का कन्वेयंस पाने का अधिकार भी एक कैपिटल एसेट है. यानी अगर किसी व्यक्ति को भविष्य में किसी प्रॉपर्टी का मालिक बनने का अधिकार मिलता है, तो वह अधिकार भी कैपिटल एसेट माना जाएगा.
ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि अगर किसी कैपिटल एसेट के लिए अलग से होल्डिंग पीरियड तय नहीं किया गया है, तो वह एसेट 36 महीने (वर्तमान में 24 महीने) या उससे ज्यादा समय तक रखने पर लॉन्ग टर्म कैपिटल एसेट बन जाता है.
एक बार जब एसेट लॉन्ग टर्म कैपिटल एसेट बन जाता है, तो टैक्सपेयर को धारा 54 या 54F के तहत छूट का हक मिल जाता है, बशर्ते वह रकम किसी रेजिडेंशियल हाउस को खरीदने में निवेश की जाए.
इस मामले में टैक्सपेयर ने जो अतिरिक्त रकम मिली थी, उससे ज्यादा रकम नई प्रॉपर्टी में निवेश कर दी थी. इसलिए ट्रिब्यूनल ने यह तय करने की जरूरत ही नहीं समझी कि छूट धारा 54 के तहत मिलेगी या 54F के तहत.
पुराने फैसलों और सर्कुलर का हवाला
फैसला देते समय ITAT ने बॉम्बे हाईकोर्ट के एक पुराने केस- CIT v. Vijay Flexible Containers [(1990) 186 ITR 693 (Bom)]-को भी ध्यान में रखा.
ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि जब अलॉटमेंट लेटर को बैंक स्टेटमेंट के साथ देखा जाता है, तो यह साफ हो जाता है कि टैक्सपेयर ने फ्लैट बुक करने के लिए वाकई भुगतान किया था. इसलिए अलॉटमेंट लेटर में कोई ऐसी गंभीर कमी नहीं पाई गई, जिससे उसे पूरी तरह अमान्य माना जाए.
ट्रिब्यूनल का फैसला
ITAT ने साफ कहा कि भले ही बिल्डर ने फ्लैट का निर्माण शुरू न किया हो, फिर भी खरीदार को उस प्रॉपर्टी में एक अधिकार मिल जाता है. बिल्डर द्वारा निर्माण न करना, खरीदार के “फ्लैट पाने के अधिकार” को खत्म नहीं कर सकता.
ट्रिब्यूनल के अनुसार, फ्लैट के लिए एडवांस भुगतान करने और अलॉटमेंट लेटर मिलने से टैक्सपेयर ने प्रॉपर्टी में एक अधिकार हासिल कर लिया था, और प्रॉपर्टी में अधिकार अपने आप में एक कैपिटल एसेट है.
जब इस तरह के अधिकार को सरेंडर या रद्द किया जाता है, तो वह कैपिटल एसेट से जुड़े अधिकार का अंत (Extinguishment) माना जाएगा. यह इनकम टैक्स एक्ट के तहत “Transfer” की परिभाषा में आता है और इससे होने वाला लाभ कैपिटल गेन के रूप में टैक्स योग्य होता है.
ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि CBDT के सर्कुलर नंबर 471, दिनांक 15.10.1986 के अनुसार भी, अलॉटमेंट लेटर के जरिए हासिल की गई प्रॉपर्टी को टैक्स के उद्देश्य से कैपिटल एसेट माना गया है. इसलिए ट्रिब्यूनल ने निष्कर्ष निकाला कि किसी प्रॉपर्टी को हासिल करने का अधिकार भी एक कैपिटल एसेट होता है.
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निष्कर्ष
मेरी राय में, यह लेन-देन शायद स्टांप ड्यूटी की रकम भुगतान करने से बचने के इरादे से किया गया हो. लेकिन अगर अलॉटमेंट लेटर में कुछ कमियां हों, तब भी वह कानूनी अधिकार पैदा करता है, बशर्ते आप यह साबित कर सकें कि अलॉटमेंट के समय भुगतान किया गया था. इसलिए, किसी प्रॉपर्टी से जुड़े अलॉटमेंट लेटर के तहत हासिल किए गए अधिकार, कैपिटल एसेट की प्रकृति के अधिकार माने जाएंगे.
लेखक एक टैक्स और इंवेस्टमेंट एक्सपर्ट हैं. यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं. आप उन्हें jainbalwant@gmail.com पर या ट्विटर हैंडल @jainbalwant पर संपर्क कर सकते हैं.
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