खोई शान पाने की कोशिश में टाटा मोटर्स, मंजिल के बीच अशोक लेलैंड, रतन टाटा के बाद बदली रणनीति करेगी कमाल?
टाटा मोटर्स ने खुद को पूरी तरह से कमर्शियल गाड़ियों के पावरहाउस के तौर पर फिर से बनाया है. अपने मुख्य बिजनेस पर ध्यान देने के वादे और फाइनेंस की चिंताओं के साथ यह ट्रक बनाने वाली यूरोपियन कंपनी इवेको को अपने में मिला रही है. इस कदम से जगुआर और लैंड रोवर के अधिग्रहण की यादें ताजा हो रही हैं.
जब से रतन टाटा का मन भारत की पहली स्वदेशी डिजाइन वाली कार इंडिका को बनाने में लगा, तब से टाटा मोटर्स ने अपने मुख्य आधार ट्रकों के बारे में शायद ही कभी बात की हो. लगभग तीन दशक बाद यह उम्मीद और घबराहट दोनों है. अपने मुख्य बिजनेस पर ध्यान देने के वादे और फाइनेंस की चिंताओं के साथ यह ट्रक बनाने वाली यूरोपियन कंपनी इवेको को अपने में मिला रही है. इस कदम से जगुआर और लैंड रोवर के अधिग्रहण की यादें ताजा हो रही हैं.
टाटा मोटर्स ने खुद को पूरी तरह से कमर्शियल गाड़ियों के पावरहाउस के तौर पर फिर से बनाया है. पैसेंजर गाड़ियों के बिजनेस को एक अलग एंटिटी बना दिया गया है और कमर्शियल व्हीकल की ब्रांच टाटा मोटर्स लिमिटेड के बैनर को वापस स्टॉक एक्सचेंज में ले गई है. टाटा मोटर्स एक बार फिर अपनी जानी-पहचानी जगह पर वापस आ गई है. अब सवाल ये है कि वह अपनी दूसरी पारी के साथ क्या करने की योजना बना रही है.
अपनाया है अलग रास्ता
लिस्टिंग सेरेमनी में टाटा संस के चेयरमैन एन.चंद्रशेखरन ने इस सफर को उस एहसास से जोड़ा जो उन्हें महामारी के आने से बहुत पहले हुआ था. कहा, ‘मुझे 7 से 8 साल पहले ही यह साफ हो गया था कि इस कंपनी को एक अलग रास्ता अपनाना होगा. टाटा मोटर्स का कमर्शियल गाड़ियों का बिजनेस हमेशा फायदेमंद रहा है, जबकि पैसेंजर गाड़ियों के कारोबार के साथ ऐसा नहीं रहा है. अलग होने से पहले हमें दोनों यूनिट्स को तैयार और मजबूत बनाना था.’ उन्होंने बताया कि कमर्शियल गाड़ियों से होने वाला मुनाफा लंबे समय से पैसेंजर गाड़ियों के कैपेक्स में जा रहा था और कहा कि आने वाले महीनों में 3.8 अरब यूरो का इवेको अधिग्रहण पूरा हो जाना चाहिए.
डीमर्जर का मकसद
उनके वार्षिक संदेश ने थीम को और मजबूती दी. डीमर्जर का मकसद रणनीति को बेहतर बनाना, अधिग्रहण में तेजी लाना, कस्टमर वैल्यू बनाना और लॉन्ग-टर्म शेयरहोल्डर रिटर्न को बेहतर बनाना है. फिर भी उन्होंने एक अधूरे काम की तरफ भी ध्यान दिलाया. छोटी कमर्शियल गाड़ियों और पिकअप में परफॉर्मेंस अभी भी उम्मीद से कम है, जिसे कंपनी ठीक करने के लिए तेजी से काम कर रही है.
मंजिल तक पहुंचा डीमर्जर
टाटा मोटर्स के डीमर्जर को लेकर जो उत्साह है और उसे नकारा भी नहीं जा सकता. लेकिन सच्चाई इससे भी अधिक सीधी है. यह बंटवारा वर्षों से हो रहा था. इस खास मौके से बहुत पहले कमर्शियल व्हीकल और पैसेंजर व्हीकल बिजनेस पहले से ही अलग-अलग जिंदगी जी रहे थे. वित्त वर्ष 19 से कंपनी ने अपने फाइनेंशियल्स बताने शुरू कर दिए थे. 2021 तक, घरेलू ऑपरेशन्स एक बिजनेस-यूनिट मॉडल में बदल गए, जिसमें कमर्शियल व्हीकल्स डिवीजन गिरीश वाघ के अंडर था. असल में कंपनी छह साल से इस डीमर्जर की रोड पर दौड़ रही थी, लेकिन मंजिल तक अब पहुंची है.
साफ लाइन ऑफ व्यू
लिस्टिंग अब निवेशकों को JLR या पैसेंजर कारों के नैरेटिव शोर के बिना भारत की सबसे बड़ी कमर्शियल व्हीकल्स फ्रैंचाइजी की एक साफ लाइन ऑफ व्यू देती है. लेकिन टाटा अशोक लेलैंड जैसा नहीं है. यह लगभग 39,000 करोड़ रुपये के नए एक्वायर्ड ग्लोबल पोर्टफोलियो के साथ आता है, जो लिस्टेड एंटिटी के 1,18,000 करोड़ रुपये की मार्केट वैल्यू का लगभग एक-तिहाई है. यह स्केल तुलना को मुश्किल बनाता है.
अशोक लेलैंड बनाम टाटा मोटर्स
फिर भी यह अंतर बहुत ज्यादा है. ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, देश की नंबर 2 कमर्शियल व्हीकल बनाने वाली कंपनी अशोक लेलैंड का मार्केट कैप 86,000 करोड़ रुपये है. टाटा का रेवेन्यू और प्रॉफिट लगभग इससे 80 फीसदी अधिक है, लेकिन उसकी मार्केट वैल्यू सिर्फ 37 फीसदी ज्यादा है. यही वैल्यूएशन गैप अब स्ट्रीट पर चल रही बहस के बीच में है.
डीमर्जर के बाद नुवामा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज ने 300 रुपये के टारगेट प्राइस के साथ ‘रिड्यूस’ रेटिंग दी. ब्रोकरेज के अनुसार, वित्त वर्ष 21-25 के दौरान टाटा मोटर्स लिमिटेड के घरेलू MHCV वॉल्यूम में 20 फीसदी की मजबूत कंपाउंडिंग एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) के बाद हम वित्त वर्ष 25–28E के दौरान 1 फीसदी CAGR का अनुमान लगाते हैं, जो ट्रांसपोर्टरों में उचित उपयोग के स्तर और रेलवे से अधिक कॉम्पिटिटिव इंटेंसिटी के कारण होगा.

सभी आंकड़े INR करोड़ में हैं. सोर्स-लेलैंड फाइनेंशियल्स: MOSL टाटा मोटर्स CV फाइनेंशियल्स: Elara Securities
घटता मार्केट शेयर सबसे बड़ी चिंता
दूसरी तरफ मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज में रिसर्च एनालिस्ट, अनिकेत म्हात्रे ने ‘न्यूट्रल’रेटिंग के साथ कुछ चुनौतियों की तरफ इशारा किया. टाटा मोटर्स कमर्शियल व्हीकल के कारोबार में सबसे बड़ी चिंता इसके मुख्य सेगमेंट में मार्केट शेयर का धीरे-धीरे कम होना रही है.
खास तौर पर चिंता की बात यह है कि लाइट कमर्शियल व्हीकल (LCV) गुड्स में मार्केट शेयर का नुकसान वित्त वर्ष 22 के 40 फीसदी के हाई से घटकर अब 27 फीसदी हो गया है और मौजूदा मार्केट लीडर महिंद्रा एंड महिंद्रा के साथ यह अंतर हर गुजरते साल के साथ बढ़ रहा है. किसी भी दिखने वाले ट्रिगर की कमी को देखते हुए, हम टाटा मोटर्स कमर्शियल बिजनेस को न्यूट्रल रेट करते हैं, जिसका टारगेट प्राइस 341 रुपये प्रति शेयर है.
अशोक लेलैंड का फोकस
दूसरी तरफ, अशोक लेलैंड शायद ही खाली बैठा हो. इस स्टॉक ने पिछले साल 29 फीसदी का रिटर्न दिया है. एनालिस्ट्स को एवरेज लगभग 6.5 फीसदी की मामूली बढ़त दिख रही है, लेकिन अपील कहीं और है. मोतीलाल ओसवाल के अनिकेत म्हात्रे अधिक कंस्ट्रक्टिव हैं. उन्होंने ‘बाय’ रेटिंग दी है और 165 रुपये का टारगेट दिया है. उनका कहना है किLCV की डिमांड में पहले से ही सुधार के संकेत दिख रहे हैं, हमें उम्मीद है कि हाल ही में GST रेट में कटौती की वजह से पूरे भारत में खपत में बढ़ोतरी के कारण आने वाले क्वार्टर में MHCV ट्रक की डिमांड में सुधार होगा.
पिछले कुछ साल में कंपनी ने नॉन-ट्रक सेगमेंट पर फोकस करके अपने बिजनेस साइक्लिकल को असरदार तरीके से कम किया है. मार्जिन बढ़ाने और कैपेक्स पर समझदारी से कंट्रोल करने पर इसके लगातार जोर से लंबे समय में रिटर्न बेहतर होने की उम्मीद है. इसके अलावा, नेट कैश की स्थिति अशोक लेलैंड को आने वाले साल में ग्रोथ के रास्तों में इन्वेस्ट करने में मदद करेगी.
टाटा मोटर्स भारत की मीडियम एंड हेवी कमर्शियल व्हीकल (MHCV) इंडस्ट्री में 46 फीसदी शेयर के साथ मार्केट लीडर है और वित्त वर्ष 25 में 29 फीसदी मार्केट शेयर के साथ LCV में दूसरी सबसे बड़ी कंपनी है.
दो कंपनियां… दो रास्ते और एक मार्केट, जो अभी भी रीकैलिब्रेट हो रहा है. डीमर्जर से टाटा मोटर्स को एक साफ-सुथरा स्टेज मिल है. यह देखना बाकी है कि परफॉर्मेंस स्पॉटलाइट से मैच करती है या नहीं.
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