कभी नीम-नीम… कभी शहद-शहद! रूसी तेल के बदले अमेरिकी क्रूड की चुनौतियां, क्या गले से नीचे उतार पाएंगी ऑयल कंपनियां?
भारत और अमेरिका एक अंतरिम ट्रेड डील पर सहमत हो गए हैं. 50 फीसदी का टैरिफ घटकर 18 फीसदी पर आकर सिकुड़कर बैठ गया है. लेकिन इस समझौते की सबसे बड़ी शर्त तेल है. यह ऐसे समय हो रहा है जब रूसी तेल का इंपोर्ट कम हो रहा है और अमेरिकी तेल का भारतीय इंपोर्ट पहले से ही बढ़ रहा है.
भारतीय ज्यादातर पश्चिम एशिया के रेगिस्तानी देशों को ही अपनी गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाले तेल का स्रोत मानते थे. फिर आया साल 2022 और अपने साथ लाया एक जंग, रूस और यूक्रेन आमने-सामने आ गए और गोला-बारूद का बवंडर शुरू हो गया. यूक्रेन पर हमला करने के नतीजे के रूप में रूस को ताबड़तोड़ अमेरिकी प्रतिबंध झेलने पड़े. इसके बाद मॉस्को, नई दिल्ली के लिए एक प्रमुख कच्चे तेल सप्लायर के रूप में उभरा. फिर हमारी धारणा भी बदली कि गाड़ियों के इंजन के दिल को धड़काने वाले तेल का सोर्स कहीं और भी है. फिर महीने बीते-साल बीता लेकिन रूस और यूक्रेन के बीच शांति बहाल नहीं हो सकी. इस दौरान रूस ग्लोबल मार्केट से कम कीमत पर भारत को अपना कच्चा तेल सप्लाई करता रहा. भारतीय तेल कंपनियां इसका लाभ उठाती रहीं.
फिर एक बार साल बदला और अपने साथ लेकर आया अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप का शासन. ट्रंप ने आते ही टैरिफ नाम का एक हथियार इजाद किया और पूरी कारोबारी दुनिया की जड़ों पर चोट करना शुरू कर दिया. भारत पर थोड़ा अतिरिक्त किया़, क्योंकि भारत रूस से तेल खरीद रहा था. ट्रंप का मानना था कि भारत तेल खरीदकर रूस को यूक्रेन के खिलाफ जंग में मदद कर रहा है. फिर भारत पर 50 फीसदी का टैरिफ लगा. 25 फीसदी रेसिप्रोकल और 25 फीसदी रूस के तेल खरीदने के लिए दंड के रूप में. फिर एक नया साल आया 2026 का और साथ थोड़ी हलचल, अधिक अनिश्चितता और समझौते की हल्की रोशनी लाया. समझौते की रोशनी अब खिड़की से कमरे में दाखिल हो चुकी है. भारत और अमेरिका एक अंतरिम ट्रेड डील पर सहमत हो गए हैं. 50 फीसदी का टैरिफ घटकर 18 फीसदी पर आकर सिकुड़कर बैठ गया है. लेकिन इस समझौते की सबसे बड़ी शर्त ‘तेल’ है.
अमेरिका का दावा और भारत का रुख
शनिवार को अमेरिका ने भारत पर पिछले साल 27 अगस्त को लगाए गए 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ को वापस लेने की घोषणा की. यह फैसला तब लिया गया जब भारत रूसी तेल का इंपोर्ट ‘बंद’ करने, अमेरिकी तेल की खरीदारी बढ़ाने के लिए सहमत हुआ. ऐसा व्हाइट हाउस के एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर में बताया गया है. लेकिन दूसरी तरफ भारत की तरफ से कहा गया है कि 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना सरकार का मुख्य लक्ष्य है. इसी उद्देश्य से अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थितियों और बदलते वैश्विक हालात के अनुसार ऊर्जा आयात से जुड़े फैसले लिए जाते हैं. सरकार ने रूस से तेल की खरीद बंद करने और अमेरिका की तरफ इंपोर्ट शिफ्ट करने पर स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा है.
रूस से कम हुआ इंपोर्ट, अमेरिका से बढ़ा
यह ऐसे समय हो रहा है जब रूसी तेल का इंपोर्ट कम हो रहा है और अमेरिकी तेल का भारतीय इंपोर्ट पहले से ही बढ़ रहा है. ट्रेड डेटा से पता चला है कि इस साल अप्रैल से अक्टूबर के बीच भारत के तेल इंपोर्ट में अमेरिका का हिस्सा बढ़कर 7.48 फीसदी हो गया है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 4.43 फीसदी था. इसके उलट, इसी अवधि में रूस का हिस्सा 37.88 फीसदी से घटकर 32.18 फीसदी हो गया है.
टैंकर डेटा के अनुसार, पिछले कुछ महीनों में भारत का रूसी तेल आयात लगातार घटकर तीन साल के निचले स्तर पर आ गया है. यह रूस की टॉप तेल उत्पादक और निर्यातक कंपनियों रोसनेफ्ट और लुकऑयल पर अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद हुआ. कमोडिटी मार्केट एनालिटिक्स फर्म केप्लर के डेटा के अनुसार, जून 2025 में 2.09 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) के पीक से, भारत का रूसी तेल आयात जनवरी 2026 में घटकर 1.16 मिलियन bpd हो गया.

चुनौतियों की भरमार
मौजूदा हालात में रूस से तेल इंपोर्ट को पूरी तरह रोकना भारत के लिए एक मुमकिन ऑप्शन नहीं लगता. इसके अलावा इंडस्ट्री के एक्सपर्ट्स के मुताबिक, रूस से इंपोर्ट की मात्रा में काफी कमी करना और उसके हिसाब से अमेरिकी कच्चे तेल की सप्लाई बढ़ाना, इतना भी आसान नहीं है. इसमें टेक्निकल और कमर्शियल चुनौतियों की भरमार है.
इनक्रेड इक्विटीज में लीड एनालिस्ट (ऑयल एंड गैस), प्रत्यूष कमल कहते हैं, भारत का रूस से हटकर अमेरिका की तरफ क्रूड ऑयल के इंपोर्ट के लिए शिफ्ट होना फिलहाल फायदेमंद नजर नहीं ही आता है. क्योंकि हमें इस समय रूस से काफी सस्ता तेल मिल रहा है. अगर भाव के हिसाब से बात करें, तो रूस फिलहाल ग्लोबल मार्केट के मुकाबले 8-10 डॉलर प्रति बैरल कम पर तेल बेच रहा है. इस कीमत पर फिलहाल वो चीन को तेल का निर्यात कर रहा है. तो कमर्शियल रूप से भारत के लिए यह नुकसान होगा. दूसरी तरफ अमेरिका से तेल इंपोर्ट की कॉस्ट भी अधिक होगी.
प्रत्यूष कमल कहते हैं कि भारत फिलहाल अमेरिका से 6 से 8 अरब डॉलर का क्रूड सालाना आयात करता है. अगर भारत, रूस से हटकर अमेरिका की तरफ शिफ्ट भी करता है, तो अधिक से अधिक 12 अरब डॉलर तक इंपोर्ट के पहुंचने का अनुमान है.
वेनेजुएला से तेल के इंपोर्ट पर प्रत्यूष कहते हैं कि भारत की सभी रिफायनरी यहां के तेल को प्रोसेस करने के लिए फिलहाल मुफीद नहीं है. सिर्फ रिलायंस और एचपीसीएल के पास इस तरह के तेल को प्रोसेस करने की फैसिलिटी उपलब्ध है. अगर हमें वेनेजुएला से सस्ता तेल मिल भी जाएगा, जिसपर की अमेरिका का कंट्रोल होगा, तो भी यहां के मडी और हैवी तेल को प्रोसस करना हमारे लिए मुश्किल होगा. क्योंकि सभी ऑयल रिफाइनरियां अभी इसके लिए तैयार नहीं हैं.
रूसी तेल का आयात
भारतीय रिफाइनर पहले ही मार्च और अप्रैल के कुछ हिस्से के लिए रूसी तेल कार्गो बुक कर चुके हैं और उन्हें मना करना सच में कोई ऑप्शन नहीं है. इसलिए, अगर रूसी तेल की खरीद में भारी कटौती भी होती है, तो भी भारतीय रिफाइनरों को रूसी कच्चे तेल की खरीद कम करने के लिए ज्यादा समय चाहिए होगा. अगर वे सरकार की सलाह पर ऐसा करते भी हैं, तो एक रिफाइनर – नायरा एनर्जी – ऐसा करने की स्थिति में नहीं होगी.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, नायरा एनर्जी, जिसमें रूस की नेशनल ऑयल कंपनी रोसनेफ्ट एक बड़ी शेयरहोल्डर है, लगभग पूरी तरह से रूसी कच्चे तेल पर निर्भर है. ऐसा इसलिए है क्योंकि इस पर यूरोपियन यूनियन ने बैन लगा दिया है, जबकि रोसनेफ्ट पर EU के अलावा US ने भी बैन लगाया है. इन बैन के चलते, यह रिफाइनर, जो रोजाना 4,00,000 बैरल (bpd) कच्चे तेल को प्रोसेस करता है, रूस को छोड़कर ज्यादातर देशों से तेल हासिल नहीं कर पाया है. जब तक नायरा एनर्जी को दूसरे सोर्स से कच्चे तेल की स्थिर और लगातार सप्लाई नहीं मिल जाती, तब तक उसे रूसी तेल छोड़ने के लिए कहने का मतलब होगा रिफाइनरी को प्रभावी ढंग से बंद करना.
अमेरिकी क्रूड किस हद तक रूसी तेल की जगह ले सकता है?
इंडस्ट्री के जानकारों के अनुसार, भारत अमेरिका से अपने तेल इंपोर्ट बढ़ा रहा है – जो कच्चे तेल का उसका पांचवां सबसे बड़ा सोर्स है. अगर कीमत कॉम्पिटिटिव हो तो वह ऐसा करना जारी रख सकता है, क्योंकि अमेरिका से भारत में तेल शिपिंग की लागत फिलहाल पश्चिम एशिया से तेल लाने की लागत से दोगुनी से भी ज्यादा है.
दूसरा मुद्दा कच्चे तेल के ग्रेड और भारतीय रिफाइनरियों के साथ उनकी कम्पैटिबिलिटी होगी. ऐसा इसलिए है क्योंकि ऑपरेशनल और एफिशिएंसी के नजरिए से अलग-अलग कच्चे तेल के ग्रेड अलग-अलग पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के लिए उपयुक्त होते हैं. भारतीय रिफाइनरियां फिलहाल रूस और पश्चिम एशिया से आने वाले मीडियम-सोर कच्चे तेल की अधिक आदी हैं. हालांकि, उनमें लगभग सभी तरह के कच्चे तेल को प्रोसेस करने की क्षमता है. लेकिन तत्काल प्रभाव से ऐसा करना संभव तो नहीं होगा.

वेनेजुएला का तेल और भारत
अब थोड़ी चर्चा वेनेजुएसला की तेल की कर लेते है, क्योंकि अमेरिकी कंट्रोल के बाद से हेडलाइन में इसका क्रूड तो है ही.
व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने बुधवार को इस बात पर जोर दिया था कि इस डील में भारत अमेरिका से तेल की खरीद बढ़ाएगा और वेनेजुएला के विकल्पों पर भी विचार करेगा. उन्होंने इसे अमेरिकी मजदूरों के लिए जीत और यूक्रेन में रूस की युद्ध फंडिंग के लिए एक झटका बताया था.
राष्ट्रपति ट्रंप के इस दावे पर कि भारत रूसी तेल नहीं खरीदेगा, मीडिया के सवाल का जवाब देते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने गुरुवार को कहा था कि जहां तक भारत की एनर्जी सिक्योरिटी या एनर्जी सोर्सिंग का सवाल है, सरकार ने कई मौकों पर, जिसमें मैंने भी यहां कहा है, यह सार्वजनिक रूप से कहा है कि 1.4 अरब भारतीयों की एनर्जी सिक्योरिटी सुनिश्चित करना उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है.’
जैसवाल ने आगे कहा, ‘ऑब्जेक्टिव मार्केट की स्थितियों और बदलते इंटरनेशनल डायनामिक्स के हिसाब से एनर्जी सोर्सिंग में डायवर्सिफिकेशन लाना हमारी स्ट्रेटेजी के मूल में है. भारत के सभी फैसले इसी मकसद को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं और आगे भी लिए जाते रहेंगे.’
वेनेजुएला से तेल खरीदने के बारे में जैसवाल ने कहा, ‘वेनेजुएला एनर्जी के क्षेत्र में हमारा लंबे समय से पार्टनर रहा है, ट्रेड के मामले में भी और इन्वेस्टमेंट के मामले में भी. हम 2019-20 तक वेनेजुएला से एनर्जी या कच्चा तेल इंपोर्ट कर रहे थे और उसके बाद हमें इसे रोकना पड़ा. 2023-24 में हमने फिर से वेनेजुएला से तेल खरीदना शुरू किया, लेकिन फिर से रोकना पड़ा, जिसे प्रतिबंधों के फिर से लगाए जाने के कारण रोक दिया गया था.’
उन्होंने आगे कहा, ‘जैसा कि आप जानते हैं कि भारतीय PSU ने वेनेजुएला की नेशनल ऑयल कंपनी – PDVSA के साथ पार्टनरशिप की है और वे (हमारे PSU) 2008 से उस देश में मौजूद हैं. एनर्जी सिक्योरिटी के प्रति हमारे दृष्टिकोण के अनुरूप, भारत वेनेजुएला सहित किसी भी कच्चे तेल की सप्लाई के ऑप्शन के कमर्शियल फायदों का पता लगाने के लिए तैयार है.’

भारत ने इंपोर्ट को कैसे डाइवर्सिफाई किया है?
थ्योरी में भारत के कच्चे तेल के इंपोर्ट को डाइवर्सिफाई करना रणनीतिक नजरिए से सही है, क्योंकि यह एनर्जी सिक्योरिटी को बढ़ाता है और जियो-पॉलिटिकल गड़बड़ियों के प्रति कमजोरी को कम करता है.
पिछले दो साल में, भारत ने अपने सप्लायर बेस को लगभग 27 से बढ़ाकर 40 से ज्यादा देशों तक कर दिया है, जिसमें अमेरिका, ब्राजील, गुयाना और पश्चिम अफ्रीकी देशों से कच्चे तेल की सप्लाई शामिल है. यह पॉलिसी भारत को सिर्फ कुछ ही सोर्स पर कम निर्भर बनाती है. जैसे-जैसे भारतीय अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, उसकी एनर्जी की जरूरतें भी बढ़ रही हैं, लेकिन मौजूदा जियो-पॉलिटिकल माहौल में ब्रेंट तेल की कीमतें और कच्चे तेल की सप्लाई करने वाले देशों पर लगाए गए प्रतिबंध बहुत अनिश्चित हैं.
हालांकि, अमेरिकी शेल ऑयल क्वालिटी में हल्का होता है और अगर इसे ठीक से मिलाया जाए तो यह भारतीय रिफाइनरियों के लिए उपयुक्त है, लेकिन अमेरिका के पास रूस द्वारा सप्लाई की जाने वाली भारी मात्रा को पूरी तरह से बदलने की एक्सपोर्ट क्षमता नहीं है.
यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने से पहले, भारत का कच्चा तेल इंपोर्ट मुख्य रूप से मिडिल ईस्ट के देशों, खासकर सऊदी अरब, इराक और UAE से आता था. जब यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद भारी डिस्काउंट पर रूसी कच्चा तेल मिलने लगा, तो भारत ने इस मौके का फायदा उठाया, इंपोर्ट बढ़ाया, अपनी रिफाइनरियों में तेल को रिफाइन किया और बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स यूरोप को एक्सपोर्ट किए.
अब, अगर भारत ज्यादा अमेरिकी तेल खरीदता है, तो इससे ट्रेड डेफिसिट कम करने में मदद मिलेगी, लेकिन स्थिति थोड़ी मुश्किल है, क्योंकि ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन चाहता है कि भारत वेनेजुएला का तेल खरीदे, जिसे अभी अमेरिका कंट्रोल कर रहा है. लेकिन इस अमेरिकी मैनेजमेंट की अवधि और सीमा भी तय नहीं है.

रूसी कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए बेहतर क्यों है?
एक्सपर्ट्स का तर्क है कि रूसी तेल से पूरी तरह से दूर होना अव्यावहारिक और आर्थिक रूप से महंगा है. रूसी यूराल्स क्रूड, जो भारी और सल्फर से भरपूर है, भारतीय रिफाइनरियों के लिए उपयुक्त है जो ऐसे ग्रेड के लिए ऑप्टिमाइज्ड हैं, और लागत के मामले में फायदे देता है जो अमेरिकी या वेनेजुएला के विकल्प बिना अतिरिक्त प्रोसेसिंग खर्च के नहीं दे सकते.
दूसरी तरफ अमेरिकी शेल ऑयल मुख्य रूप से हल्के ग्रेड के होते हैं, जबकि रूस भारी, सल्फर से भरपूर यूराल्स क्रूड सप्लाई करता है, जिसका इस्तेमाल भारतीय रिफाइनरियां करती हैं. भारत को अमेरिकी तेल को दूसरे ग्रेड के साथ मिलाना होगा, जिससे लागत बढ़ेगी. इसलिए सीधा बदलाव संभव नहीं है.’
अमेरिकी एक्सपोर्ट पर कितना असर?
टैंकर मार्केट कंसल्टेंट और शिपिंग एंड ऑयल मार्केट का एनालिसिस करने वाले विजडम एंड बोट्स के अनुसार, अगर भारत रूस से पूरी तरह से संबंध तोड़ लेता है, तो उसे रूस से आने वाले लगभग 1.7 मिलियन bpd (2025 औसत) कच्चे तेल की जगह दूसरे सोर्स से तेल लेना होगा. ऐसा लगता है कि भारत शायद वेनेजुएला से कच्चा तेल खरीदेगा (शायद 150,000 bpd से ज्यादा) इसलिए इससे अमेरिकी एक्सपोर्ट पर कोई असर नहीं पड़ेगा.’
एनालिस्ट ने बताया कि चीन शायद रूस का बचा हुआ तेल खरीद ले, जिससे मॉस्को को तेल बेचने में मदद मिलेगी. असल में इससे अमेरिका के इस दावे को कोई मदद नहीं मिलेगी कि भारत को रूसी कच्चे तेल की बिक्री से यूक्रेन में युद्ध के लिए फंडिंग हो रही है. इसके अलावा, चीन शायद ‘शैडो फ्लीट’ टैंकरों का इस्तेमाल करेगा – जो पुराने, बिना रेगुलेशन वाले जहाज हैं जो पश्चिमी प्रतिबंधों से बचते हैं, जिससे ग्लोबल तेल-शिपिंग की दुनिया और भी जटिल और अप्रत्याशित हो जाएगी.
इस बीच, ऐसी खबरें आई हैं कि भारत को रूसी एक्सपोर्ट ऐसे कम जाने-माने ट्रेडर्स के पास चला गया है जिन्होंने पहले शायद ही कभी देश को सप्लाई किया हो. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रेडवुड ग्लोबल सप्लाई और विस्तुला डेल्टा जैसे UAE से जुड़े ट्रेडर्स ने अमेरिकी दबाव के बावजूद चुपचाप रूसी सप्लाई बनाए रखी है.
भारत-रूस की साझेदारी
संबंधों के मोर्चे पर, डायवर्सिफिकेशन से भारत-रूस संबंधों पर खास तनाव आने की संभावना नहीं है. मॉस्को, बयानों से यह समझता है कि नई दिल्ली को वाशिंगटन से किस तरह के जटिल दबाव का सामना करना पड़ रहा है, ऐसे दबाव जिनका सामना क्रेमलिन खुद लंबे समय से कर रहा है.
भारत-रूस साझेदारी रक्षा, उर्वरक और ऊर्जा निवेश सहित कई अलग-अलग क्षेत्रों में फैली हुई है. रूसी कच्चे तेल के इंपोर्ट में धीरे-धीरे कमी करना अमेरिका के साथ संबंधों को फिर से बेहतर बनाने का संकेत है. लेकिन सवाल अभी यही बना हुआ है कि यह अंतरिम ट्रेड डील की शर्त है. यानी अभी सिर्फ खिड़की खुली है, जब दरवाजे खुलेंगे तो फिर उसकी शर्तें क्या होंगी?
Latest Stories
रूस से तेल बिजनेस पर बड़ा अपडेट! भारत धीरे-धीरे घटाएगा खरीद, जानें रिफाइनरियों को क्या कहा जा रहा..
एक हफ्ते में ₹1.68 लाख से ₹1.48 लाख तक लुढ़क गया सोना, सिल्वर में निवेशकों ने गवांए 94,421 रुपये, क्या रही वजहें
ये हैं दुनिया के टॉप-5 हॉस्पिटल, जानें भारत के किन अस्पतालों को मिली कौन सी रैंकिंग; Brand Finance ने जारी की लिस्ट
Reliance ने ऑस्ट्रेलियाई FMCG बाजार में की एंट्री, Goodness Group में मेजॉरिटी हिस्सेदारी खरीदी
