इकोनॉमी के लिए फ्री में कैश ट्रांसफर हानिकारक, फिलीपींस-मैक्सिको-ब्राजील जैसे मॉडल की जरूरत; राज्यों ने बांट दिए 1.7 लाख करोड़

आज के समय में भारत की चुनावी राजनीति में कैश ट्रांसफर जीत का बड़ा हथियार बनता जा रहा है. मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार और दिल्ली इसके ताजा उदाहरण हैं. अलग-अलग राजनीतिक दल चुनाव से पहले महिलाओं और अन्य वर्गों को सीधे पैसे ट्रांसफर करने वाली योजनाएं ला रहे हैं. लेकिन अब इस बढ़ते ट्रेंड पर आर्थिक सर्वेक्षण ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं. सर्वे ने इस तेजी से बढ़ते चलन को लेकर साफ चेतावनी दी है.

इकोनॉमिक सर्वे

Economic Survey 2025-26: आज के समय में भारत की चुनावी राजनीति में कैश ट्रांसफर जीत का बड़ा हथियार बनता जा रहा है. मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार और दिल्ली इसके ताजा उदाहरण हैं. अलग-अलग राजनीतिक दल चुनाव से पहले महिलाओं और दूसरे वर्गों को सीधे पैसे ट्रांसफर करने वाली योजनाएं ला रहे हैं. लेकिन अब इस बढ़ते ट्रेंड पर आर्थिक सर्वेक्षण ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं. आर्थिक सर्वे में इसे अनकंडिशनल कैश ट्रांसफर कहा गया है. सर्वे के मुताबिक, यह आज कई राज्यों में कल्याणकारी नीति का अहम हिस्सा बन चुका है और चुनावी जीत का एक मजबूत हथियार भी. सर्वे ने इस तेजी से बढ़ते चलन को लेकर साफ चेतावनी दी है. उसके अनुसार, कैश ट्रांसफर या फ्रीबी अपने आप में पूरी तरह गलत नहीं हैं, लेकिन अगर ऐसी योजनाएं सिर्फ चुनावी फायदे के लिए, बिना किसी स्पष्ट लक्ष्य, समीक्षा या समय सीमा के चलाई जाती हैं, तो वे लंबे समय में राज्यों की वित्तीय सेहत को नुकसान पहुंचा सकती हैं.

इसके अलावा सर्वे में ये भी बताया गया है कि इस तरह बांटा गया पैसा अक्सर लोगों की इनकम को स्थायी रूप से बढ़ाने, रोजगार पैदा करने या कौशल विकास में मददगार साबित नहीं होता यानी यह पैसा आर्थिक रूप से प्रोडक्टिव नहीं बन पाता और लंबे समय की ग्रोथ में इसका योगदान सीमित रहता है.

इन मॉडलों को अपनाने की दी नजीर

बता दें, आर्थिक सर्वे कैश सपोर्ट के खिलाफ नहीं है, बल्कि इसके बेहतर डिजाइन की वकालत करता है. सर्वे में मेक्सिको की प्रोग्रेसा (Mexico’s Progresa) और ब्राजील की बोल्सा फामीलिया (Brazil’s Bolsa Família) जैसी योजनाओं का उदाहरण दिया गया है, जहां कैश ट्रांसफर को स्कूल में बच्चों की हाजिरी और हेल्थ चेक-अप जैसी शर्तों से जोड़ा गया है.

इसके अलावा, फिलीपींस की पंताविद पमिल्यांग पिलिपिनो प्रोग्राम (Pantawid Pamilyang Pilipino Program) का भी जिक्र किया गया है, जिसमें लाभ की समय-समय पर समीक्षा होती है और जरूरत पड़ने पर योजना से बाहर निकलने की व्यवस्था पहले से तय है. आर्थिक सर्वे का इशारा साफ है कि कैश ट्रांसफर अगर सही शर्तों और निगरानी के साथ हों, तो उनके नतीजे ज्यादा टिकाऊ हो सकते हैं.

क्या कहते हैं आंकड़े?

आर्थिक सर्वे के मुताबिक, FY26 में राज्यों का अनकंडिशनल कैश ट्रांसफर पर खर्च करीब 1.7 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. सर्वे साफ कहता है कि जब राज्यों के बजट पहले से दबाव में हैं और कर्ज लगातार बढ़ रहा है, तब इस तरह के खर्च को बहुत सोच-समझकर डिजाइन करना जरूरी है. ऐसा नहीं किया गया, तो इसका असर मीडियम टर्म ग्रोथ पर पड़ सकता है.

सर्वे यह भी बताता है कि FY23 से FY26 के बीच बिना शर्त कैश ट्रांसफर योजनाएं लागू करने वाले राज्यों की संख्या पांच गुना से ज्यादा बढ़ गई है. इसी दौरान करीब आधे राज्य रेवेन्यू डेफिसिट में भी हैं. हालिया रिसर्च के हवाले से आर्थिक सर्वे कहता है कि इन योजनाओं पर खर्च राज्यों के GSDP का 0.19 फीसदी से 1.25 फीसदी तक है. कुछ राज्यों में यह कुल बजट खर्च का 8.26 फीसदी तक पहुंच चुका है.

महिलाओं की इनकम में कितना अहम है यह पैसा

लाभार्थियों के लिए यह रकम छोटी नहीं है. महिला कैजुअल लेबर, यानी वे महिलाएं जो नियमित नौकरी में नहीं होतीं और दिहाड़ी या अस्थायी काम करती हैं, उनके लिए कैश ट्रांसफर उनकी मंथली इनकम का 11 से 24 फीसदी तक होता है. कुछ राज्यों में खुद का रोजगार करने वाली महिलाओं के लिए यह हिस्सा 87 फीसदी तक पहुंच जाता है. आर्थिक सर्वे में यह भी बताया गया है कि ग्रामीण आबादी के कम से कम आधे हिस्से के लिए ये ट्रांसफर उनकी मासिक प्रति व्यक्ति खपत का 40 से 50 फीसदी तक बन चुके हैं.

राज्यों की फिस्कल हालत पहले से ज्यादा तंग

आर्थिक सर्वे के मुताबिक, राज्यों का संयुक्त ग्रॉस फिस्कल डेफिसिट FY22 में GDP का 2.6 फीसदी था, जो FY25 में बढ़कर 3.2 फीसदी हो गया. राज्यों की कुल देनदारियां GDP के करीब 28.1 फीसदी तक पहुंच चुकी हैं. सैलरी, पेंशन, ब्याज भुगतान और सब्सिडी जैसे खर्च मिलकर राज्यों की रेवेन्यू रसीदों का करीब 62 फीसदी हिस्सा पहले ही खर्च हो जाते हैं. ऐसे में नए खर्च के लिए ज्यादा गुंजाइश नहीं बचती.

कर्नाटक की गृह लक्ष्मी योजना, मध्य प्रदेश की लाड़ली बहना, महाराष्ट्र की माझी लाडकी बहीण और बिहार की मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना इसके साफ उदाहरण हैं. अलग-अलग राजनीतिक दलों ने महिलाओं से सीधे जुड़ने के लिए इन योजनाओं का सहारा लिया है. महिलाओं की तरफ से इन योजनाओं को अच्छा रिस्पॉन्स मिला है, लेकिन इससे राज्यों के खजाने पर दबाव भी बढ़ा है.

ग्रोथ पर असर, लेकिन डिजाइन की कमजोरी

आर्थिक सर्वे मानता है कि कैश ट्रांसफर से महिलाओं को तुरंत राहत मिलती है और वे अपनी सेहत व पर्सनल जरूरतों पर खर्च कर पाती हैं. लेकिन सर्वे यह भी चेतावनी देता है कि अगर यह खर्च लगातार बढ़ता रहा, तो नुकसान तय है. अगर घाटा और नहीं बढ़ाया गया, तो जरूरी सामाजिक और भौतिक ढांचे पर होने वाला खर्च कटेगा और अगर घाटा बढ़ाया गया, तो इससे राज्यों की कुल वित्तीय हालत और बिगड़ेगी. सर्वे का कहना है कि कई योजनाओं में न तो खत्म होने की समयसीमा तय है और न ही नियमित समीक्षा का प्रावधान. इससे रेवेन्यू खर्च कठोर हो जाता है.

जब वित्तीय दबाव बढ़ता है, तो सबसे पहले कैपिटल एक्सपेंडिचर में कटौती होती है, जबकि आर्थिक सर्वे मानता है कि कैपिटल खर्च का असर ग्रोथ पर ज्यादा मजबूत और लंबे समय तक रहने वाला होता है. सर्वे यह भी संकेत देता है कि अगर इन योजनाओं को रोजगार और स्किल डेवलपमेंट से नहीं जोड़ा गया, तो महिलाओं की लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है.

आर्थिक सर्वे में NBER की एक बड़ी मेटा-एनालिसिस का भी जिक्र है. इसमें पाया गया कि कैश ट्रांसफर से खपत और अल्पकालिक आय में सुधार होता है, लेकिन बच्चों के पोषण, शिक्षा या गरीबी से स्थायी तौर पर बाहर निकलने जैसे नतीजे हर बार नहीं मिलते. इसके लिए मजबूत पब्लिक सर्विस और रोजगार के अवसर जरूरी होते हैं.

कैसे बेहतर बनाया जाए सिस्टम?

आर्थिक सर्वे का कहना है कि कैश सपोर्ट को कंडीशनल, रिव्यू-बेस्ड और समय-सीमित बनाया जा सकता है. इससे लंबे समय में बजट पर दबाव कम रहता है और ह्यूमन रिसोर्स भी मजबूत होते हैं. कुल मिलाकर, सर्वे का संदेश साफ है कि कैपिटल इन्वेस्टमेंट और ह्यूमन रिसोर्स पर खर्च के लिए फिस्कल स्पेस बचाए रखना, ओपन एंडेड वाली कैश ट्रांसफर योजनाओं के लगातार विस्तार से ज्यादा टिकाऊ फायदा देता है. ऐसे में यह बहस सिर्फ वेलफेयर बनाम ग्रोथ की नहीं है, बल्कि इस सवाल की है कि कहीं शार्ट टर्म राहत के नाम पर मध्यम अवधि की समावेशी तरक्की की नींव कमजोर तो नहीं हो रही.

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