शीशा, प्लास्टिक या तांबा? जानें कौन सी बोतल है सबसे सेफ
क्या आपने कभी सोचा है कि जिस बोतल से आप रोज पानी पीते हैं, वही आपकी सेहत पर असर डाल सकती है. सवाल सिर्फ पानी साफ है या नहीं, बल्कि उस बर्तन का भी है जिसमें पानी रखा जा रहा है. ऐसे में हमें याद रखना चाहिए कि सेहत सिर्फ कितना पानी पीने से नहीं बनती, बल्कि इस बात से भी बनती है कि हम पानी किस बोतल से पी रहे हैं.
ऑफिस, जिम या घर आजकल हर किसी के हाथ में एक री-यूजेबल पानी की बोतल जरूर दिख जाती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस बोतल से आप रोज पानी पीते हैं, वही आपकी सेहत पर असर डाल सकती है. अब सवाल सिर्फ पानी साफ है या नहीं, बल्कि उस बर्तन का भी है जिसमें पानी रखा जा रहा है. कॉपर यानी तांबे की पारंपरिक बोतलें हों, आधुनिक ग्लास बोतलें या फिर हर जगह इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक की बोतलें—तीनों का असर शरीर पर अलग-अलग पड़ता है. खास बात ये है कि बोतल का मटीरियल पानी के स्वाद, उसमें घुलने वाले केमिकल और यहां तक कि बैक्टीरिया पर भी असर डाल सकता है.
क्या है तांबे की बोतल की खासियत?
भारतीय घरों में तांबे के बर्तन में पानी रखने की परंपरा सालों पुरानी है. वैज्ञानिक रिसर्च भी मानती है कि तांबे की बोतल में करीब 16 घंटे रखा पानी ई.कोलाई, साल्मोनेला जैसे हानिकारक बैक्टीरिया को खत्म कर सकता है. इसे ‘कॉन्टैक्ट किलिंग’ कहा जाता है, जिसमें तांबे के आयन बैक्टीरिया की कोशिकाओं को नष्ट कर देते हैं. यही वजह है कि यात्रा के दौरान या जहां पानी की सफाई पर शक हो, वहां तांबे की बोतल उपयोगी मानी जाती है. आयुर्वेद में भी तांबे के पानी को पाचन सुधारने, इम्युनिटी बढ़ाने और सूजन कम करने से जोड़ा जाता है. न्यूट्रिशन साइंस भी मानता है कि तांबा शरीर के लिए जरूरी मिनरल है.
क्या कोई नुकसान भी है तांबे के बर्तन का ?
फायदे के साथ खतरे भी हैं. WHO की गाइडलाइंस के मुताबिक अगर पानी को 8 से 12 घंटे से ज्यादा तांबे की बोतल में रखा जाए, तो उसमें तांबे की मात्रा तय सीमा से ज्यादा हो सकती है.नींबू पानी जैसे खट्टे ड्रिंक इसमें और तेजी से तांबा घोल देते हैं. ज्यादा तांबा शरीर में जाने से उल्टी, पेट दर्द, मेटल जैसा स्वाद और लंबे समय में लिवर-किडनी पर असर पड़ सकता है. खासतौर पर गर्भवती महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और लिवर या किडनी की बीमारी वाले लोगों को तांबे की बोतल के इस्तेमाल में सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है.
शीशे की बोतल
शीशे की बोतल को हेल्थ के लिहाज से सबसे सुरक्षित ऑप्शन माना जाता है, क्योंकि यह पानी के साथ रिएक्ट नहीं करती और न ही कोई केमिकल छोड़ती है. BPA और फ्थेलेट्स जैसे नुकसानदायक तत्व इसमें नहीं होते और पानी का स्वाद भी वैसा ही रहता है. बोरोसिलिकेट ग्लास बोतलें तो गर्म और ठंडे दोनों तरह के ड्रिंक के लिए ठीक मानी जाती हैं.
हालांकि, कुछ स्टडीज में पाया गया कि ग्लास बोतलों में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा कभी-कभी प्लास्टिक बोतलों से भी ज्यादा हो सकती है. इसकी वजह अक्सर पेंटेड प्लास्टिक कैप्स होती हैं, जो बार-बार खोलने-बंद करने पर घिसकर छोटे प्लास्टिक कण छोड़ देती हैं.
प्लास्टिक की बोतल
प्लास्टिक बोतलें हल्की, सस्ती और हर जगह मिल जाती हैं, इसलिए लोग इन्हें खूब यूज करते हैं. लेकिन डॉक्टर और हेल्थ प्लेटफॉर्म्स बार-बार चेतावनी देते हैं कि इनमें मौजूद BPA जैसे केमिकल्स हार्मोनल गड़बड़ी, प्रेग्नेंसी में दिक्कत और विकास संबंधी समस्याओं से जुड़े हो सकते हैं. यहां तक कि BPA-फ्री प्लास्टिक भी समय के साथ खराब हो जाता है, बदबू पकड़ लेता है और पानी का स्वाद बदल सकता है. ऊपर से पर्यावरण को होने वाला नुकसान अलग—प्लास्टिक सैकड़ों साल में भी पूरी तरह नष्ट नहीं होता.
ऐसे में आखिर कौन-सी बोतल है सही?
अगर रोजमर्रा के इस्तेमाल की बात करें, तो ग्लास की बोतल सुरक्षित हैं, बशर्ते उसका ढक्कन प्लास्टिक का न हो. तांबे की बोतल को कभी-कभार, सीमित समय के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. वहीं प्लास्टिक बोतलें, खासकर डिस्पोजेबल वाली, लंबे समय तक इस्तेमाल से बचना ही बेहतर है. ऐसे में हमें याद रखना चाहिए कि सेहत सिर्फ कितना पानी पीने से नहीं बनती, बल्कि इस बात से भी बनती है कि हम पानी किस बोतल से पी रहे हैं.
इसे भी पढ़ें- UP-बिहार में कंपकंपाने वाली ठंड, 6 डिग्री तक गिरेगा पारा, अगले 48 घंटे में 3 राज्यों में बारिश का अलर्ट
Latest Stories
दिल्ली से बिहार तक शीतलहर का अलर्ट, पारा 5 डिग्री तक गिरेगा; इन राज्यों में बारिश की चेतावनी
OTT लवर्स के लिए खुशखबरी, Netflix, JioHotstar और Prime Video पर इस हफ्ते हॉरर रोमांस और एक्शन की भरमार, देखें लिस्ट
भारतीय सेना के पास अब शक्तिबाण, 500 KM दूर बैठे दुश्मन पर ड्रोन करेंगे हमला, SWARM और UAV बनेंगे ब्रह्मास्त्र
