सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड से कमाया ₹10 लाख तो ₹1.25 लाख कट जाएगा टैक्स, सरकार ने आपकी जेब पर चलाई कैंची
Budget 2026 में सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) को लेकर किए गए टैक्स बदलाव के बाद NSE में SGB की कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिली. सरकार ने सेकेंडरी मार्केट से खरीदे गए SGB पर कैपिटल गेन टैक्स छूट खत्म करने की बात कही, जिससे निवेशकों में चिंता बढ़ गई है. जानें क्या है सरकार का तर्क और इस नियम का असर.
SGB LTCG Tax Rule: सोमवार, 2 फरवरी यानी बजट 2026-27 के एक दिन बाद नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) में अलग-अलग अवधि वाले सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) की कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिली. कई बॉन्ड्स में यह गिरावट 10 फीसदी तक दर्ज की गई. बाजार में यह कमजोरी उस समय आई जब केंद्र सरकार ने बजट 2026 में सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड से जुड़े टैक्स नियमों में बड़ा बदलाव करने की बात कही. SGB को लेकर बजट भाषण में कही गई बात के बाद निवेशकों में अनिश्चितता बढ़ गई और सेकेंडरी मार्केट में बड़े स्तर पर बिकवाली का दबाव दिखाई दिया.
बजट में क्या बात आई सामने?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी को पेश किए गए बजट 2026 में घोषणा की कि सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड पर कैपिटल गेन टैक्स से छूट अब सभी निवेशकों को नहीं मिलेगी. सरकार के नए प्रस्ताव के अनुसार, टैक्स छूट का फायदा केवल उन्हीं निवेशकों को दिया जाएगा जिन्होंने सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड को सीधे भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI से उसके ओरिजनल इश्यू के समय खरीदा हो और उसे उसकी पूरी अवधि यानी मैच्योरिटी तक अपने पास रखा हो. यह नया नियम 1 अप्रैल 2026 के बाद खरीदे गए SGB पर लागू होगा.
नए नियम की खबर ने तोड़ा SGB!
इस बदलाव का सबसे बड़ा असर उन निवेशकों पर पड़ेगा जो सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड को स्टॉक एक्सचेंज के जरिये सेकेंडरी मार्केट से खरीदते हैं. अब अगर कोई निवेशक बाजार से SGB खरीदता है और उसे मैच्योरिटी तक होल्ड भी करता है, तो भी उसे उस पर होने वाले मुनाफे पर कैपिटल गेन टैक्स देना होगा. पहले के नियमों में ऐसी कोई शर्त नहीं थी और निवेशकों को पूरी टैक्स छूट मिलती थी.
पहले क्या था नियम?
पहले व्यवस्था काफी आसान और स्पष्ट थी. सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड चाहे RBI से खरीदा गया हो या बाद में स्टॉक एक्सचेंज से लिया गया हो, अगर निवेशक उसे मैच्योरिटी तक रखता था तो उस पर मिलने वाला पूरा रिटर्न टैक्स-फ्री होता था. इसी वजह से SGB को लंबे समय के लिए गोल्ड में निवेश का एक सुरक्षित और टैक्स-फ्रेंडली विकल्प माना जाता था.
एक समय, एक मैच्योरिटी; फिर भी अंतर
नए नियम के बाद एक अजीब स्थिति पैदा हो गई है. उदाहरण के तौर पर, अगर दो निवेशकों के पास बिल्कुल एक ही सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड है और दोनों उसे एक ही तारीख को मैच्योरिटी पर रिडीम करते हैं, तो भी टैक्स का असर अलग-अलग होगा. जिसने बॉन्ड को शुरुआती इश्यू में खरीदा था, उसे किसी तरह का कैपिटल गेन टैक्स नहीं देना होगा, जबकि जिसने वही बॉन्ड सेकेंडरी मार्केट से खरीदा है, उसे टैक्स चुकाना पड़ेगा. एक जैसे बॉन्ड और एक जैसी मैच्योरिटी के बावजूद टैक्स नियमों में यह अंतर निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन गया है. नीचे दिए एक उदाहरण से इसे आसानी से समझा जा सकता है:
| विवरण | राशि / स्थिति |
|---|---|
| निवेश का तरीका | सेकेंडरी मार्केट से SGB खरीद |
| कुल निवेश राशि | ₹5,00,000 |
| मैच्योरिटी पर बॉन्ड की वैल्यू | ₹15,00,000 |
| कुल कैपिटल गेन | ₹10,00,000 |
| 1 अप्रैल 2026 से पहले टैक्स स्थिति | कोई टैक्स नहीं |
| 1 अप्रैल 2026 के बाद टैक्स नियम | LTCG लागू |
| LTCG टैक्स दर | 12.5% |
| देय टैक्स राशि | ₹1,25,000 |
| निवेशक को वास्तविक नुकसान | टैक्स-फ्री रिटर्न खत्म |
इन निवेशकों को बड़ा झटका
आसान भाषा में समझें तो सरकार की ओर से पेश किए गए इस नियम से सेकेंडरी मार्केट में निवेश करने वाले निवेशकों को बड़ा झटका मिल सकता है. क्योंकि, लोग बड़े स्तर पर सेकडरी मार्केट में ही पैसा लगाकर बॉन्ड खरीदते हैं. 1 अप्रैल से लगने वाले LTCG से सेकेंडरी मार्केट के निवेशकों को नुकसान होने वाला है. इससे इतर, इस फैसले के बाद सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड और दूसरे गोल्ड निवेश विकल्पों के बीच का फर्क कम हो जाएगा. जब टैक्स फायदा नहीं मिलेगा, तो कई निवेशक गोल्ड ETF या फिजिकल गोल्ड को SGB के बराबर या उससे बेहतर विकल्प मान सकते हैं. इससे सेकेंडरी मार्केट में SGB की मांग और लिक्विडिटी पर भी असर पड़ सकता है.
क्या है सरकार का तर्क?
हालांकि सरकार का तर्क इससे अलग है. क्रिसिल इंटेलिजेंस के अनुसार, सरकार का उद्देश्य सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड पर टैक्स नियमों में एकरूपता और स्पष्टता लाना है. साथ ही यह बदलाव योजना के मूल उद्देश्य के अनुरूप है, जिसका मकसद निवेशकों को लंबे समय तक गोल्ड में निवेश के लिए प्रोत्साहित करना था, न कि बाजार में खरीद-फरोख्त के लिए. सरकार का मानना है कि टैक्स छूट को केवल ओरिजिनल इश्यू और मैच्योरिटी तक होल्ड करने की शर्त से जोड़ने से लंबी अवधि के निवेश को बढ़ावा मिलेगा. इससे सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड को एक लॉन्ग-टर्म सेविंग इंस्ट्रूमेंट के रूप में स्थापित किया जा सकेगा और इसके जरिए गोल्ड की फिजिकल मांग को भी नियंत्रित किया जा सकेगा.
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