म्यूचुअल फंड-शेयर बाजार से लेकर हर जगह कटेगी जेब, चुपके से बढ़ गया टैक्स, क्या आपको मालूम है?

Budget 2026 में मिडिल क्लास को कोई सीधी टैक्स राहत नहीं मिली, लेकिन निवेश और बचत से जुड़े कई नियम सख्त हो गए. STT बढ़ने से ट्रेडिंग महंगी हुई, Sovereign Gold Bond का टैक्स-फ्री भरोसा टूटा और म्यूचुअल फंड इनकम पर टैक्स प्लानिंग के रास्ते बंद हो गए.

Budget 2026 middle class impact Image Credit: AI Generated

Budget 2026 middle class impact: बजट 2026 से मिडिल क्लास को बहुत राहत की उम्मीद तो पहले ही नहीं थी लेकिन उनके टैक्स का बोझ बढ़ जाएगा इसकी भी कल्पना उन्होंने नहीं की थी. बजट 2026 में ऐसे कई फैसले शामिल रहें जो पहले से सुस्त इकॉनमी में, रोजमर्रा के निवेश, बचत और टैक्स प्लानिंग को महंगा बना देते हैं और आम आदमी की जेब को ढीला.

सरकार ने विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर, कनेक्टिविटी और ग्लोबल इन्वेस्टमेंट के बड़े रोडमैप जरूर दिखाए. लेकिन अगर बजट को मिडिल क्लास की नजर से देखा जाए तो उनके हिस्से में न तो इनकम टैक्स स्लैब में कोई बदलाव, न ही स्टैंडर्ड डिडक्शन में राहत, और न ही महंगाई के दबाव को कम करने वाली कोई सीधी नीति नजर आई.

सरकार का फोकस ज्यादातर ग्रोथ, कैपेक्स और लॉन्ग टर्म स्ट्रैटेजी पर रहा. लेकिन जिन घरों की मासिक सैलरी पहले ही ईएमआई, स्कूल फीस और मेडिकल खर्चों में बंट चुकी है, उनके लिए बजट 2026 कोई बड़ा सुकून लेकर नहीं आया. ऊपर से उल्टे सरकार ने चुपचाप मिडिल क्लास की जेब पर कैंची चला दी है. यानी जो कमाई हो रही थी उस पर अब पहले से ज्यादा टैक्स चुकाना होगा.

STT बढ़ा, ट्रेडिंग और महंगी हुई

जब फाइनेंस मिनिस्टर ने बजट पढ़ना शुरू किया तो पहले से टूटी कमर के साथ हांफ रहे शेयर बाजार ने ऐसे रिएक्ट किया जैसे उसे हथौड़ा मार दिया गया हो. अंत में सेंसेक्स 1,546 अंकों की गिरावट के साथ 80,722 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 495 अंक टूटकर 24,825 के नीचे क्लोज हुआ.

बाजार को उम्मीद थी कि सरकार, कैपिटल मार्केट रिफॉर्म, एफडीआई, फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स के फ्लो को बढ़ाने के लिए अधिक इंसेंटिव और बाजार को दुरुस्त करने के लिए पॉलिसी में चेंज करेगी. लेकिन बजट में ऐसा कुछ नहीं हुआ बल्कि उल्टा चोट निवेशकों पर कर दी गई.

शेयर मार्केट को बजट की जिस घोषणा से सबसे अधिक झटका लगा, वो सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स यानी STT रहा. डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग पर STT बढ़ा दिया गया. फ्यूचर्स पर यह टैक्स 0.02% से बढ़कर 0.05% और ऑप्शंस पर 0.1% से 0.15% हो गया.

ये आंकड़े सुनने में छोटे लग सकते हैं, लेकिन भारत में F&O ट्रेडिंग का स्केल इतना बड़ा है कि इसका असर सीधा ट्रेडर्स की जेब पर पड़ेगा. क्योंकि भारत में ताबड़तोड़ F&O ट्रेडिंग होती है. दुनिया भर का 80% एफएनओ ट्रेड इंडियन मार्केट्स में होता है, ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि लोगों को इसकी एक तरह की लत लगी हुई है. जिस एफएनओ का वॉल्यूम मार्च 2019 में 200 करोड़ था वह मार्च 2024 में करीबन 9000 करोड़ रुपये पर पहुंच गया.

अब सरकार का तर्क है कि देश में करीब एक करोड़ लोग F&O ट्रेडिंग कर चुके हैं और उनमें से 93% को भारी नुकसान (1.1 लाख प्रति व्यक्ति औसत) हुआ. ऐसे में टैक्स बढ़ाकर सट्टेबाजी को हतोत्साहित करने की कोशिश बताई जा रही है. लेकिन इस फैसले से बड़े के साथ-साथ छोटे निवेशक भी बुरी तरह प्रभावित होंगे. आगे टेबल में देखिए निवेशकों पर कैसे टैक्स का बोझ बढ़ जाएगा.

Old STT Vs New STT (1 लॉट निफ्टी फ्यूचर्स सेल ट्रेड के आधार पर) – NIFTY Feb Fut, 24791.80×65 QTY)

चार्ज का नामपहले (पुरानी दर)अब (नई दर 1 अप्रैल 2026 से)
ब्रोकरेज20 रुपये20 रुपये
एक्सचेंज ट्रांजैक्शन चार्ज27.88 रुपये27.88 रुपये
जीएसटी7.11 रुपये7.11 रुपये
सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स STT322.29 रुपये805.73 रुपये
सेबी टर्नओवर चार्ज1.61 रुपये1.61 रुपये
स्टांप ड्यूटी0 रुपये0 रुपये
कुल चार्ज380.50 रुपये863.94 रुपये

सोने से मोह, फिर बोझ और अब SGB में नियमों की सख्ती

सरकार ने साल 2015 में जब सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) की शुरुआत की थी, तो उसका सबसे बड़ा आकर्षण यही था कि सोने के निवेश पर सरकार रिटर्न की गारंटी देगी, सलाना ब्याज मिलेगा और ऊपर से कि मैच्योरिटी पर पूरा रिटर्न टैक्स-फ्री रहेगा. यही वजह रही कि कुछ ही वर्षों में SGB जबरदस्त तरीके से लोकप्रिय हो गया और इसे गोल्ड में निवेश का सबसे सुरक्षित और टैक्स-फ्रेंडली विकल्प माना जाने लगा.

लेकिन जैसे-जैसे सोने के दाम चढ़ते गए, SGB सरकार के लिए बोझ बनने लगा. आखिरी बार 2024 में जारी हुई SGB की किस्त के समय सोने का भाव करीब ₹6,263 प्रति ग्राम था. उसके बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में गोल्ड प्राइस तेजी से बढ़े. फरवरी 2025 के बजट के बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने साफ कर दिया कि अब SGB की नई किस्तें जारी नहीं की जाएंगी.

वजह भले औपचारिक तौर पर न कही गई हो, लेकिन अर्थशास्त्र समझने वाले जानते हैं कि बढ़ते गोल्ड प्राइस के साथ SGB सरकार के खजाने पर भारी पड़ता जा रहा था. पुराने सब्सक्रिप्शन तो जारी रहेंगे, लेकिन मैच्योरिटी पर सरकार को मौजूदा ऊंचे भाव पर भुगतान करना होगा, जो कई गुना ज्यादा है.

अब इसी पृष्ठभूमि में बजट 2026 में SGB से जुड़ा नया नियम सामने आया है. सरकार ने ऐलान किया है कि सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड पर कैपिटल गेन टैक्स से छूट अब सभी निवेशकों को नहीं मिलेगी. यह फायदा सिर्फ उन्हीं लोगों को मिलेगा, जिन्होंने बॉन्ड को उसके ओरिजनल इश्यू के समय सीधे RBI से खरीदा हो और उसे मैच्योरिटी तक होल्ड किया हो. यह नियम 1 अप्रैल 2026 के बाद खरीदे गए SGB पर लागू होगा. यानी सेकेंडरी मार्केट से खरीदे गए SGB अब टैक्स-फ्री नहीं रहेंगे.

इस बदलाव का सबसे बड़ा झटका उन निवेशकों को लगेगा, जो स्टॉक एक्सचेंज के जरिए SGB खरीदते हैं. अब भले ही निवेशक बॉन्ड को मैच्योरिटी तक अपने पास रखे, उसे होने वाले मुनाफे पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स देना होगा.

दबी आवाज में निवेशक और बाजार से जुड़े लोग यही कह रहे हैं कि यह बदलाव सरकार पर बढ़ते बोझ को कम करने की कोशिश है. सोने के बढ़ते दाम के बीच SGB सरकार के लिए घाटे का सौदा बन चुका था, और नए इश्यू बंद करने के बाद अब सेकेंडरी मार्केट पर टैक्स लगाकर उस बोझ को और सीमित किया जा रहा है.

म्यूचुअल फंड और डिविडेंड पर टैक्स प्लानिंग खत्म

बजट 2026 में म्यूचुअल फंड और डिविडेंड इनकम से जुड़े टैक्स नियमों में भी एक बड़ा बदलाव किया गया है. अब निवेश से होने वाली इस आय पर ब्याज खर्च की कोई भी कटौती नहीं मिलेगी. यानी अगर किसी निवेशक ने लोन लेकर शेयर या म्यूचुअल फंड में पैसा लगाया है, तो उस लोन पर दिए गए ब्याज का फायदा अब टैक्स में नहीं मिलेगा.

अब तक व्यवस्था अलग थी. पुराने नियमों के मुताबिक, डिविडेंड या म्यूचुअल फंड से होने वाली आय पर ब्याज खर्च की कटौती दी जाती थी, हालांकि यह छूट सीमित थी. निवेशक अपनी कुल डिविडेंड या म्यूचुअल फंड इनकम के अधिकतम 20 फीसदी तक ब्याज खर्च को टैक्स से घटा सकता था.

उदाहरण के तौर पर, मान लीजिए किसी निवेशक को म्यूचुअल फंड या शेयर से एक साल में ₹1 लाख का डिविडेंड मिला. इस निवेश के लिए उसने लोन लिया था और उस पर ₹25 हजार का ब्याज चुकाया. पुराने नियम में वह ₹20 हजार तक ब्याज खर्च को अपनी इनकम से घटा सकता था. ऐसे में उसकी टैक्सेबल इनकम ₹1 लाख की जगह ₹80 हजार मानी जाती थी, और टैक्स भी उसी कम रकम पर लगता था.

लेकिन बजट 2026 के बाद यह सुविधा पूरी तरह खत्म कर दी गई है. नए नियम 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगे. इसके बाद चाहे निवेश उधार के पैसों से किया गया हो और ब्याज कितना भी दिया गया हो, डिविडेंड या म्यूचुअल फंड इनकम से कोई भी ब्याज खर्च घटाने की इजाजत नहीं मिलेगी. ऊपर दिए गए उदाहरण में अब निवेशक की पूरी ₹1 लाख की इनकम टैक्स के दायरे में आएगी.

इस बदलाव का सीधा असर उन निवेशकों पर पड़ेगा जो लोन लेकर शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं. अब उन्हें अपनी पूरी इनकम पर टैक्स देना होगा, जिससे टैक्स बोझ बढ़ेगा और निवेश की पुरानी टैक्स प्लानिंग रणनीतियों पर फिर से सोचने की जरूरत पड़ेगी.

बजट को कितना समझ पाएं आप, इस क्विज से जानें

उदाहरण के तौर पर, मान लीजिए किसी निवेशक को म्यूचुअल फंड या शेयर से एक साल में ₹1 लाख का डिविडेंड मिला. इस निवेश के लिए उसने लोन लिया था और उस पर ₹25 हजार का ब्याज चुकाया. पुराने नियम में वह ₹20 हजार तक ब्याज खर्च को अपनी इनकम से घटा सकता था. ऐसे में उसकी टैक्सेबल इनकम ₹1 लाख की जगह ₹80 हजार मानी जाती थी, और टैक्स भी उसी कम रकम पर लगता था.

लेकिन बजट 2026 के बाद यह सुविधा पूरी तरह खत्म कर दी गई है. नए नियम 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगे. इसके बाद चाहे निवेश उधार के पैसों से किया गया हो और ब्याज कितना भी दिया गया हो, डिविडेंड या म्यूचुअल फंड इनकम से कोई भी ब्याज खर्च घटाने की इजाजत नहीं मिलेगी. ऊपर दिए गए उदाहरण में अब निवेशक की पूरी ₹1 लाख की इनकम टैक्स के दायरे में आएगी.

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ऑडिट में देरी अब भारी पड़ेगी

बजट 2026 में अनुपालन से जुड़े नियम भी सख्त कर दिए गए हैं. अब टैक्स ऑडिट रिपोर्ट या इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करने में देरी करना आपके लिए बहुत महंगी साबित हो सकती है.

टैक्स ऑडिट में एक दिन की भी देरी होने पर ₹75,000 का जुर्माना और एक महीने की देरी पर ₹1.5 लाख तक का फाइन लगाया जाएगा. छोटे कारोबारियों और प्रोफेशनल्स के लिए यह नियम अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकता है, खासकर तब जब पहले से ही कंप्लायंस का बोझ बढ़ता जा रहा है.