वैश्विक तनाव का भारत पर असर! Crisil की चेतावनी- बासमती, उर्वरक, एयरलाइंस और हीरा उद्योग पर बढ़ सकता है दबाव

वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है. Crisil की रिपोर्ट के मुताबिक अगर यह संकट लंबा खिंचता है तो ऊर्जा कीमतों में तेजी से बासमती चावल, उर्वरक, हीरा उद्योग और एयरलाइन सेक्टर पर दबाव बढ़ सकता है, जबकि तेल और गैस के बढ़ते दाम महंगाई दर और व्यापार संतुलन को भी प्रभावित कर सकती है.

West Asia War Impact on India Image Credit: AI Generated

वेस्ट एशिया में बढ़ता तनाव अगर लंबे समय तक जारी रहता है तो इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था के कई अहम सेक्टरों पर पड़ सकता है. रेटिंग एजेंसी Crisil Ratings के अनुसार, इस क्षेत्र से जुड़े व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ने से भारत के बासमती चावल, उर्वरक, हीरा पॉलिशिंग, एयरलाइन और ट्रैवल सेक्टर जैसे उद्योग दबाव में आ सकते हैं. साथ ही कच्चे तेल और गैस की कीमतों में तेजी कई अन्य उद्योगों की लागत भी बढ़ा सकती है.

ऊर्जा कीमतों में तेजी से बढ़ेगा दबाव

वेस्ट एशिया दुनिया के ऊर्जा बाजार का एक बड़ा केंद्र है. यह क्षेत्र वैश्विक स्तर पर करीब 30 फीसदी कच्चे तेल और लगभग 20 फीसदी एलएनजी का उत्पादन करता है. इनका बड़ा हिस्सा Strait of Hormuz के रास्ते दुनिया भर में भेजा जाता है.

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है. देश लगभग 85 फीसदी कच्चा तेल और करीब आधा एलएनजी आयात करता है. इनमें से करीब 40-50 फीसदी कच्चे तेल और 50-60 फीसदी एलएनजी की आपूर्ति इसी समुद्री मार्ग से होकर आती है.

क्रिसिल रिपोर्ट के मुताबिक 1 मार्च 2026 से कई शिपिंग कंपनियों ने जोखिम बढ़ने के कारण इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों को रोक दिया है. अगर यह स्थिति लंबे समय तक रहती है तो वैश्विक बाजार में तेल और गैस की उपलब्धता और कीमतों पर असर पड़ सकता है.

तेल और गैस की कीमतों में तेज उछाल

तनाव बढ़ने के बाद ऊर्जा कीमतों में पहले ही तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है. ब्रेंट क्रूड की कीमत जनवरी-फरवरी 2026 में 66-67 डॉलर प्रति बैरल के औसत से बढ़कर अब 82-84 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है. इसी तरह एशियाई स्पॉट एलएनजी की कीमत भी करीब 10 डॉलर प्रति mmBtu से बढ़कर 24-25 डॉलर प्रति mmBtu तक पहुंच गई है.

क्रिसिल का कहना है कि यदि कीमतें और बढ़ती हैं तो भारत का चालू खाता घाटा बढ़ सकता है और महंगाई पर भी दबाव आ सकता है. ऊर्जा की लागत बढ़ने से कई कंपनियों के मुनाफे पर भी असर पड़ेगा.

इन सेक्टरों पर पड़ सकता है सबसे ज्यादा असर

वेस्ट एशिया भारत के लिए एक बड़ा व्यापारिक साझेदार भी है. चालू वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में भारत के कुल निर्यात का लगभग 15 फीसदी और आयात का करीब 20 फीसदी हिस्सा इसी क्षेत्र से जुड़ा रहा है.

बासमती चावल के निर्यात का करीब 70-72 फीसदी हिस्सा पश्चिम एशिया के देशों में जाता है. यदि तनाव बना रहता है तो शिपमेंट में देरी और भुगतान में देरी की संभावना बढ़ सकती है, जिससे निर्यातकों की वर्किंग कैपिटल पर दबाव पड़ सकता है.

उर्वरक सेक्टर भी प्रभावित हो सकता है क्योंकि भारत अपनी जरूरत का लगभग 30 फीसदी उर्वरक आयात करता है और इसमें से करीब 40 फीसदी आपूर्ति वेस्ट एशिया से आती है. इसके अलावा रॉक फॉस्फेट और फॉस्फोरिक एसिड जैसे कच्चे माल की आपूर्ति भी इसी क्षेत्र से होती है.

हीरा उद्योग के लिए भी यह क्षेत्र अहम है. भारत के हीरा निर्यात का करीब 18 फीसदी हिस्सा इजरायल और यूएई जैसे देशों को जाता है. हालांकि बेल्जियम और हांगकांग जैसे वैकल्पिक बाजार इस असर को कुछ हद तक कम कर सकते हैं.

एयरलाइन और ट्रैवल सेक्टर पर असर

भारतीय एयरलाइंस की करीब 10 फीसदी उड़ानें वेस्ट एशिया के हवाई क्षेत्र से होकर गुजरती हैं. अगर हवाई क्षेत्र में प्रतिबंध या कुछ एयरपोर्ट बंद होते हैं तो एयरलाइनों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ सकता है. इससे ईंधन लागत बढ़ सकती है.

ट्रैवल कंपनियों को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है क्योंकि लोग वेस्ट एशिया के लिए यात्रा टाल सकते हैं. हालांकि कुछ मांग दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे अन्य पर्यटन स्थलों की ओर शिफ्ट हो सकती है.

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कुछ सेक्टरों को हो सकता है फायदा

क्रिसिल के मुताबिक कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से अपस्ट्रीम ऑयल कंपनियों को फायदा हो सकता है क्योंकि उनकी लागत अपेक्षाकृत स्थिर रहती है. इसके अलावा शिपिंग कंपनियों को भी फायदा मिल सकता है क्योंकि जहाजों की उपलब्धता कम होने से चार्टर दरें बढ़ सकती हैं.

हालांकि एजेंसी का मानना है कि अभी ज्यादातर भारतीय कंपनियों की बैलेंस शीट मजबूत है, इसलिए तत्काल बड़ा असर नहीं दिखेगा. लेकिन अगर भू-राजनीतिक तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो सप्लाई चेन, ऊर्जा कीमतों और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है.