Zoho के फाउंडर श्रीधर वेम्बू ने दी चेतावनी, ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी हैं दिग्गज टेक फर्म, सरकार को रखना होगा ये ख्याल

Zoho के सह संस्थापक श्रीधर वेम्बू ने बिग टेक कंपनियों की तुलना ईस्ट इंडिया कंपनी से करते हुए कहा कि आज ये कंपनियां कई देशों से ज्यादा आर्थिक ताकत रखती हैं. अल्फाबेट द्वारा 32 बिलियन डॉलर का कर्ज 24 घंटे में जुटाने का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि टेक दिग्गजों की कैपिटल और वैश्विक पहुंच सरकारों जैसी शक्ति दे रही है.

श्रीधर वेम्बू ने बिग टेक कंपनियों की तुलना ईस्ट इंडिया कंपनी से की है.

Zoho के को-फाउंडर श्रीधर वेम्बू ने एक बार फिर ग्लोबल टेक कंपनियों की तुलना ईस्ट इंडिया कंपनी से की है. उनका कहना है कि आज की बिग टेक कंपनियां आर्थिक और रणनीतिक ताकत के मामले में कई देशों से भी आगे निकल चुकी हैं. हाल ही में अल्फाबेट के 32 बिलियन डॉलर के कर्ज जुटाने के प्लान का उदाहरण देते हुए अपनी बात एक्स पर कहीं है.

नई ईस्ट इंडिया कंपनी

श्रीधर वेम्बू ने सोशल मीडिया पर लिखा कि बिग टेक कंपनियों को समझने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी जैसा नजरिया अपनाना चाहिए. उनका कहना है कि ये कंपनियां सिर्फ बाजार की खिलाड़ी नहीं हैं बल्कि इनकी ताकत कई संप्रभु देशों के बराबर या उससे ज्यादा हो गई है.

अल्फाबेट के कर्ज जुटाने का उदाहरण

वेम्बू ने अल्फाबेट द्वारा 32 बिलियन डॉलर का कर्ज 24 घंटे में जुटाने का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी रकम जुटाने में सरकारों को ज्यादा समय लगता है. अल्फाबेट ने 100 साल के बांड भी जारी किए जबकि भारत के सॉवरेन बांड आमतौर पर 40 साल तक के होते हैं.

कंपनियों की लगातार बढ़ती ताकत

वेम्बू ने कहां है कि बिग टेक कंपनियों के पास कैपिटल, टेक्निक और वैश्विक पहुंच का ऐसा मेल है जो उन्हें असाधारण ताकत देता है. ये कंपनियां न सिर्फ बाजार को बल्कि नीतिगत माहौल को भी प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं.

फ्रांस का फैसला का उदाहरण

जनवरी में फ्रांस ने अमेरिकी प्लेटफार्म जैसे जूम और माइक्रोसॉफ्ट टीम्स की जगह घरेलू विकल्प अपनाने का फैसला किया. इस पर वेम्बू ने कहा कि यूरोप अब डिजिटल ताकत के सेंट्रालाइजेशन को समझ रहा है. उन्होंने देशों से अपनी डिजिटल स्ट्रक्चर पर अधिक कंट्रोल की अपील की है.

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जियोपॉलिटिक्स पर असर की चेतावनी

ईस्ट इंडिया कंपनी का उदाहरण देते हुए वेम्बू ने संकेत दिया कि बड़ी कंपनियां इतिहास की तरह आर्थिक और राजनीतिक समीकरण बदल सकती हैं. उनका कहना है कि अगर देशों ने समय रहते कदम नहीं उठाए तो डिजिटल क्षेत्र में निर्भरता नई तरह की चुनौती बन सकती है.