फिर फूटेगा ट्रंप टैरिफ बम! जुलाई से बढ़ सकती है ट्रेड वॉर की गर्मी, US ट्रेजरी सेक्रेटरी ने दिया बड़ा हिंट
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दोबारा टैरिफ लागू कर सकते हैं, जिससे वैश्विक व्यापार और बाजारों में हलचल बढ़ सकती है. इस बात के संकेत खुद यूएस ट्रेजरी सेक्रेटरी ने दिया है. उनके मुताबिक सेक्शन 301 के तहत टैरिफ वापसी की तैयारी है, जिससे ट्रेड वॉर का खतरा फिर बढ़ सकता है.
Trump Tariff: पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के चलते जहां वैश्विक व्यापार पहले से ही हिला हुआ है. वहीं ट्रंप टैरिफ का बम एक बार फिर फूटने वाला है. दरअसल ट्रंप दोबारा टैरिफ लगा सकते हैं. इस बात का संकेत खुद अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी Scott Bessent ने संकेत दिए हैं. उनके मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप टैरिफ को दोबारा लागू करने के मूड में हैं.
स्कॉट बेसेंट ने संकेत दिए हैं कि जुलाई की शुरुआत तक पुराने स्तर पर टैरिफ दोबारा लागू किए जा सकते हैं. इससे ग्लोबल ट्रेड और बाजारों में हलचल तेज हो सकती है. दरअसल, पहले सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के टैरिफ को असंवैधानिक बताते हुए झटका दिया था, क्योंकि उन्हें इमरजेंसी पावर के तहत लागू किया गया था. लेकिन अब प्रशासन सेक्शन 301 जैसे दूसरे कानूनी रास्तों का इस्तेमाल कर इन टैरिफ को फिर से लागू करने की तैयारी में है.
वैश्विक बाजार में मचेगी हलचल
टैरिफ की वापसी का सीधा असर वैश्विक व्यापार पर पड़ सकता है, खासकर उन देशों पर जो अमेरिका को निर्यात करते हैं. इससे ट्रेड वॉर की स्थिति फिर बन सकती है, जिसका असर सप्लाई चेन, कीमतों और निवेश पर देखने को मिलेगा. खासतौर पर ऐसे समय में जब दुनिया पहले से ही भू-राजनीतिक तनाव और युद्ध जैसे हालात से जूझ रही है, यह कदम वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ा सकता है.
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मजबूत स्थिति में अमेरिकी इकोनॉमी
इस बीच अमेरिकी इकोनॉमी को लेकर भी बयान सामने आया है. Scott Bessent के मुताबिक, अमेरिका की अर्थव्यवस्था अभी मजबूत स्थिति में है और इस साल ग्रोथ 3% से 3.5% तक रह सकती है. हालांकि उन्होंने यह भी माना कि ईरान युद्ध के असर का पूरा प्रभाव अभी सामने आना बाकी है, जो आगे चलकर अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है.
महंगाई को लेकर भी स्थिति अच्छी नहीं है. कोर इंफ्लेशन (जिसमें फूड और एनर्जी शामिल नहीं होते) में गिरावट देखी जा रही है, लेकिन कुल महंगाई (CPI) में गैस कीमतों के कारण बढ़ोतरी हुई है. ऐसे में ब्याज दरों को लेकर भी बहस तेज हो गई है. बेंसेंट का मानना है कि फेडरल रिजर्व महंगाई को लेकर ज्यादा सतर्क है और अगर आंकड़े साफ होते हैं तो ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश बन सकती है.
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